नोटबंदी के दौरान भाजपा नेताओं ने जमकर किया कालाधन सफेद

जाहिद खान
‘‘नवंबर, 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी की घोषणा किए जाने के बाद चलन से बाहर किए गए 500 और 1000 रुपये के सबसे ज्यादा नोट गुजरात के एक सहकारी बैंक में जमा कराए गए थे’’ यह सनसनीखेज खुलासा हाल ही में एक सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जरिये प्राप्त जानकारी से हुआ है। जानकारी के मुताबिक नोटबंदी घोषित होने के अगले पांच दिनों के भीतर यानी 14 नवंबर, 2016 तक ‘अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक’ (एडीसीबी) में 745.59 करोड़ रुपये मूल्य के चलन से बाहर किए गए नोट जमा कराए गए थे। यह राशि किसी भी सहकारी बैंक में जमा हुई सर्वाधिक राशि है। चैंकाने वाली बात यह भी है कि इस बैंक के निदेशक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह हैं। बैंक की वेबसाइट के मुताबिक अमित शाह अब भी इस बैंक के निदेशक हैं और इस पद पर कई सालों से हैं। साल 2000 में वे इस बैंक के अध्यक्ष भी थे। आरटीआई जानकारी के मुताबिक एडीसीबी के बाद सबसे ज्यादा प्रतिबंधित नोट राजकोट जिला सहकारी बैंक में जमा हुए थे। इस बैंक के तार भी बीजेपी नेता से जुड़े हुए हैं। उस वक्त गुजरात सरकार के कैबिनेट मंत्री जयेशभाई विट्ठलभाई रडाड़िया इस बैंक के अध्यक्ष थे। नोटबंदी के दौरान इस बैंक ने 693.19 करोड़ रुपये मूल्य के चलन से बाहर किए नोट स्वीकार किए थे। खास बात यह भी है कि राजकोट को गुजरात में बीजेपी की राजनीति का केंद्र माना जाता है।
गौरतलब है कि सहकारी बैंकों में जमा कराए गए प्रतिबंधित नोटों को लेकर एक आरटीआई मुंबई के एक आरटीआई कार्यकर्ता मनोरंजन एस रॉय ने राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) में लगाई थी। नाबार्ड, जो इन बैंकों की सर्वोच्च अपीलीय इकाई है, जब उसने ये जानकारी दी, तब यह होश उड़ाने वाली बात सामने निकलकर आई। वरना, ये काला कारनामा यूं ही बैंक की फाइलों में दफन रहता। एक तरफ अहमदाबाद और राजकोट के जिला सहकारी बैंक दोनों में मिलकर 1438.78 करोड़ रूपए जमा हुए, तो प्रदेश के सबसे बड़े सहकारी बैंक-‘गुजरात सहकारी बैंक लिमिटेड’ में इन दोनों सहकारी बैंकों के मुकाबले बेहद कम 1.11 करोड़ रुपये जमा हुए थे। तुलनात्मक रूप से देखें, तो यह रकम ना के बराबर है। अहमदाबाद और राजकोट के जिला सहकारी बैंकों में जमा की गई इतनी बड़ी रकम चुगली करती है कि इसमें कहीं न कहीं बड़ा घोटाला है। इन सहकारी बैंकों में काले धन को चुपचाप जमाकर सफेद किया गया है। आरटीआई के जवाब में एक और भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। वह यह है कि देश भर के सार्वजनिक क्षेत्र के 7 बैंक, 32 राज्य सहकारी बैंक, 370 जिला सहकारी बैंक और करीब 3 दर्जन डाकघरों में नोटबंदी के बाद कुल 07.91 लाख करोड़ रुपये के पुराने नोट जमा हुए थे, जो रिजर्व बैंक द्वारा जमा हुए कुल 15.28 लाख करोड़ रुपये के पुराने नोट के आधे यानी 52 फीसदी से भी ज्यादा है। यानी सबसे ज्यादा गड़बड़ी इन्हीं बैंकों में हुई है। सहकारी बैंको का ताल्लुक सीधे-सीधे राजनेताओं से है। देश के तमाम राज्यों के अंदर इन बैंकों के प्रबंधन में ज्यादातर सत्ताघारी पार्टी के लोग शामिल हैं। नोटबंदी को इन नेताओं ने नोटबदली का धंधा बना लिया।
8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 500 और 1000 के नोटों को बंद करने का फैसला लिया था और जनता को बैंकों में अपने पास जमा पुराने नोट बदलवाने के लिए 30 दिसंबर 2016 तक यानी 50 दिनों की मियाद दी गई थी। ये नोट हटते ही देश में आर्थिक इमरजेंसी के हालात बन गए थे। देखते ही देखते देश की 87 फीसदी यानी 15 लाख करोड़ रुपए की मुद्रा, भारतीय अर्थव्यवस्था से बाहर हो गई थी। सरकार द्वारा अचानक थोपे गए इस फैसले से सभी प्रभावित हुए। नोटबंदी से हो रही दिक्कतों की वजह से देश में 150 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। बावजूद इसके मोदी सरकार और सत्ताधारी पार्टी बीजेपी नोटबंदी के अपने इस कदम को, एक ‘क्रांतिकारी’ कदम बतलाती रही। सरकार की दलीलें थीं कि भ्रष्टाचार, काले धन और सीमा पार से होने वाली नकली नोटों की तस्करी पर लगाम लगाने के मद्देनजर उसने बड़े नोट बदलने का फैसला लिया है। यह बात अलग है कि सरकार के इस कदम से न तो भ्रष्टाचार खत्म हुआ और ना ही काले धन पर कोई रोक लगी। आरबीआई ने खुद ये बात मानी कि नोटबंदी के दौरान देश में प्रचलन में रहे 15. 44 लाख करोड़ रुपए के प्रतिबंधित नोट में से 15.28 लाख करोड़ रुपए प्रणाली में वापस लौट आए हैं। यानी नकली नोट और काला धन पकड़ने के उसके सारे दावे झूठे निकले। उल्टे नोटबंदी की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था जो कोमा में गई, उससे अभी तक नहीं उबर पाई है। अपने आर्थिक सर्वे में खुद सरकार ने इस बात को स्वीकारा है कि नोटबंदी की वजह से देश की जीडीपी में तकरीबन 2 फीसदी की गिरावट आई है।
जब पूरा देश नोटबंदी के कारण बैंकों के बाहर कतार में खड़ा था, तब एक वर्ग ऐसा भी था, जिसने पिछले दरवाजे से अपना सारा काला धन रातों-रात जमा कर सफेद कर लिया। इस गोरखधंधे में प्राइवेट बैंक और सहकारी बैंक दोनों ही शामिल थे। खास तौर से बीजेपी शासित राज्यों में यह खबरें सामने निकलकर आईं कि सहकारी बैंकों के जरिए बड़े पैमाने पर चलन से बाहर किए गए नोट जमा कराए जा रहे हैं। मीडिया में आई इन खबरों के बाद, केन्द्र सरकार जागी और उसने नोटबंदी के शुरुआती पांच दिन बीत जाने के बाद सहकारी बैंकों को प्रतिबंधित नोट स्वीकार करने से मना कर दिया। लेकिन तब तक सफेदपोशों ने अपना पूरा काला धन, जमा कर दिया। कहने को मोदी सरकार बार-बार यह कहती है कि बैंकों में किसने कितने पैसे जमा किए ?, उसे सब मालूम है। बैंकों में लगे सीसीटीवी कैमरों में वे लोग कैद हैं और समय आने पर वह उन पर कड़ी कार्यवाही करेगी। काले धन रखने वाला कोई छोड़ा नहीं जाएगा।  नोटबंदी को दो साल होने को आए, लेकिन देश में एक भी वाकिया सामने नहीं आया है, जिसमें सरकार, या संबंधित महकमों ने ऐसे लोगों पर कोई कार्यवाही की हो।
अहमदाबाद और राजकोट के जिला सहकारी बैंकों में सिर्फ पांच दिन के अंदर 1438.78 करोड़ रूपए जमा होना, कोई सामान्य बात नहीं है। जिसे यूं ही खारिज कर दिया जाए। कहीं न कहीं एक बड़ी गड़बड या घोटाला़ है, जो जांच के बाद ही सामने आएगा। इस जानकारी के सामने आने के बाद, सरकार या संबंधित महकमे कोई कार्यवाही करते और जांच की अनुशंशा करते, इसके उलट ‘राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक’ यानी नाबार्ड सफाई दे रहा है कि अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। इस बैंक में एक लाख साठ हजार खाता धारक हैं। हर खाते में औसत 46000 से कुछ अधिक जमा हुए हैं। यानी उसके मुताबिक पांच दिन के अंदर सौ फीसदी खाताधारकों ने अपने पुराने नोट जमा कर दिए। बैंकों ने इतने सारे नोट आसानी से गिन भी लिए। बैंक का हर खाताधारक इतना सक्षम है कि उसने 46000 से अधिक रकम जमा की। साफ दिख रहा है कि नाबार्ड इस घोटाले पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है। नाबार्ड से यह सवाल पूछा जा सकता है कि यदि किसी ने दस खाते में बीस करोड़ जमा किए, तो उसका हिसाब वह सभी एक लाख साठ हजार खाते के औसत से देगा या उन दस खातों की जांच के बाद देगा। यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो, तो सच सामने आने में देर नहीं लगेगी। मालूम चल जाएगा कि किसने इन खातों में अपना काला धन सफेद किया है ?
पहली ही नजर में देखें, तो अहमदाबाद और राजकोट के जिला सहकारी बैंकों का मामला, एक बड़े घोटाले की तरफ इशारा करता है। इन बैंकों में कुछ लोगों ने हेराफेरी कर अपने काले धन को सफेद किया है। काले धन को सफेद करने वालों में निश्चित तौर पर रसूखदार लोग शामिल हैं। मोदी सरकार, नोटबंदी को यदि अपना अच्छा कदम मानती है और इस फैसले में वह बिल्कुल पाक-साफ है, तो वह इस तरह के मामलों की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराती ? जांच से वह क्यों कतराती है। या फिर दाल में कुछ काला है, जिसे छिपाने के लिए वह तरह-तरह के जतन करती रहती है। सूचना के अधिकार के तहत जब भी किसी आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा नोटबंदी के फैसले से जुड़ी जानकारियां मांगी जाती है, तो यह कहकर उनकी मांग ठुकरा दी जाती है कि ‘‘नोटबंदी से जुड़ी कोई भी जानकारी देना सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत सूचना के दायरे में नहीं आता है। इस बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। नोटबंदी के फैसले और बैठकों से जुड़ा ब्यौरा देने से देश के आर्थिक हितों पर बुरा असर पड़ सकता है।’’ सरकार नोटबंदी के फैसले और बैठकों से जुड़ा ब्यौरा नहीं दे सकती, लेकिन इतना काम तो कर ही सकती है कि बैंकों में किसका कितना पैसा जमा हुआ और उस पैसे में कितना काला धन है ?, इसकी व्यापक और निष्पक्ष जांच कराए। ताकि आर्थिक अपराधी देश के सामने आएं और उनसे टैक्स वसूला जा सके।