एएसआई के कत्ल का गुनाहगार अवैध बस माफिया या दिल्ली पुलिस का भ्रष्टाचार

आईएनएन भारत डेस्क
दिल्ली में चल रहे अवैध बस माफिया की एक बस की चपेट में आकर 25 जून को दिल्ली पुलिस के एक एएसआई ओमपाल सिंह को अपनी जान गंवानी पड़ गई। दिल्ली पुलिस बेशक इसे एक बस दुर्घटना का नाम दे परंतु पुलिस एएसआई ओमपाल सिंह बस दुर्घटना नही दिल्ली पुलिस के बेशर्म भ्रष्टाचार का शिकार होकर अकाल मौत के मुंह में चले गये हैं। यह दिल्ली पुलिस के भ्रष्टाचार द्वारा अपने ही एक कर्मठ एएसआई की हत्या का मामला है।

एएसआई ओमपाल सिंह मेरठ के मवाता गांव के रहने वाले थे और अक्टूबर 2018 में पुलिस से सेवानिवृत होने वाले थे। ओमपाल सिंह की इच्छा अपने बेटे को एक आईपीएस अधिकारी बनते देखने की थी जो वह अब कभी भी नही देख पायेंगे। दिल्ली में सैंकड़ों की संख्या में चल रही यूपी नंबर की अवैध बसों में से एक शास्त्री पार्क लालबत्ती के पास एएसआई ओमपाल सिंह का गला काटते हुए निकल गई।

असल में यह बसें ना केवल दिल्ली के पर्यावरण के लिए खतरा है बल्कि इनका अवैध संचालन एक खास तरह की गिरोह बाजी का भी आधार बनाता है। यहां तक कहा जाता है कि यूपी में इनके अवैध रूटों के बंटवारे को लेकर कईं बार गोलीबारी तक भी हो चुकी है। इसके अलावा यह अवैध बसें और इनका अवैध संचालन अनेकों दुघटनाओें का कारण भी बनते रहे हैं। ऐसी ही एक दुर्घटना आगरा-लखनउ राजमार्ग पर मैनपुरी के पास पिछली 13 जून को हो गयी थी जिसमें बताया जाता है कि 20 से अधिक लोगों की जाने गयी हैं और लगभग 17 लोग घायल हुए। बताया जाता है कि यूपी सरकार ने मृतकों को 2-2 लाख के मुआवजे की भी घोषणा की थी।

सरकार केन्द्र की हो अथवा यूपी की दुर्घटना में मरने वालों को मुआवजा तो घोषित कर सकती है। परंतु इनके अवैध संचालन पर रोक नही लगा सकती है। वास्तव में इस बस माफिया के पीछे विभिन्न दलों के कईं बड़े नेताओं का हाथ एवं निवेश बताया जाता है। अब ऐसी स्थिति में सरकार किसी भी दल की रहे इनका बेलगाम अवैध कारोबार बदस्तूर जारी रहता है। लोग जिये या मरें। मैनपुरी के पास दुर्घटनाग्रस्त बस के आपरेटर का नाम कोई मान चतुर्वेदी बताया जाता है और दिल्ली में भी इस आपरेटर के कईं ठिकाने हैं जहां से वह अपनी अवैध बसों के अवैध रूट चलाता है। वैसे सूत्रों का कहना है कि मैनपुरी की इतनी बडी दुर्घटना के बाद इस आपरेटर के अवैध बस संचालन पर कुछ लगाम लगी है परंतु जानकारों की माने तो यह केवल कुछ दिनों का तमाशा भर है। मामला ठंडा पडते ही यह बसे फिर से चलने लगेंगी।

अब बात ओमपाल सिंह की। जिस बस से ओमपाल सिंह की जान गई है वह भी दिल्ली में चल रहे अवैध बसों के इसी जखीरे का हिस्सा थी। जिसने ओमपाल की जिंदगी को बेवक्त लील लिया और उनके परिवार को संकट में डाल दिया। इन अवैध तरीके से चल रही बसों के खिलाफ पुलिस उपायुक्त, यातायात से लेकर दिल्ली के उप राज्यपाल तक सभी को विभिन्न लोगों द्वारा शिकायते दी जा चुकी हैं। परंतु दिल्ली पुलिस इन बसों को जब्त करने की अपेक्षा इनके हल्के फुल्के चालान काटकर ही औपचारिकता पूरी कर देती है। यह सब पुलिस अधिकारियों और बस माफिया के बीच आपसी समझदारी से होता है कि कितने का चालान काटा जाये और कितने साहब की जेब में ठूसे जाएं। यदि इन बसों और इनके अवैध संचालन पर रोक लगी होती तो शायद आज एएसआई ओमपाल अपने परिवार के साथ होते। दिल्ली में ऐसी अवैध बसों की संख्या 600 से 800 के बीच मानी जाती है। इनमें यूपी, हरियाणा और राजस्थान नंबर की बसें होती हैं।

यह बसें अनुबंध पर चलने वाली आॅल इण्डिया परमिट की बसें नही हैं बल्कि यह बसें दिल्ली के विभिन्न हिस्सों से एक दो सवारियों को आवाज लगाकर चलने वाली बसें हैं। आवाज लगाकर इस प्रकार सवारियां बैठाना अथवा कुछ निश्चित जगहों से बस स्टेंड की तरह सवारियां लादने का अर्थ है, अवैध तरीके से बगैर किसी रूट परमिट के सरकारी यातायात सेवा के सामानांतर परिवहन प्रणाली का संचालन करना और सीधे देश के राजस्व को चूना लगाना। जिसमें बगैर परमिट के बस संचालन का मामला, सरकारी परिवहन सेवा के सामनान्तर परिवहन प्रणाली का संचालन करने का मामला और अवैध पार्किंग के साथ ही दिल्ली में बगैर पर्यावरण सेस चुकाये दाखिल होने का मामला बनता है। जिसमें कड़ी सजा और बड़े जुर्माने का प्रावधान है परंतु दिल्ली पुलिस के काबिल अधिकारी केवल 500 से 1000 रूपये तक का चालान काटकर इस अवैध माफिया के सारे गुनाहों को माफ कर देते हैं। और यह बेखौफ बस माफिया कानून से बेपरवाह मासूमों की जान की कीमत पर अपना कारोबार चलाता है। अबकी बार इसका शिकार उसी दिल्ली पुलिस का एक एएसआई बना है जिसकी शह पर इस बस माफिया का सारा कारोबार चलता है।

(अगली कडी में जानिये किस प्रकार चलता है यह सारा कारोबार)