अवैध निर्माण, अतिक्रमण रोक पर कोर्ट और जनता को बेवकूफ बना रहे हैं नगर निगम और डीडीए

आईएनएन भारत डेस्क
दिल्ली के प्रदूषण में अवैध निर्माण और अतिक्रमण की 33 प्रतिशत के लगभग हिस्सेदारी है और न्यायपालिका इस मामले पर बेहद सख्त हैं परंतु वहीं दिल्ली नगर निगम और डीडीए मिलकर न्यायपालिका से लेकर शहर की जनता तक की आंखों में धूल झौंक रहे हैं। यहां तक कि इस मामले में नगर निगम और डीडीए दोनों के असली प्रशासक माने जाने वाले उप-राज्यपाल और उप राज्यपाल सचिवालय भी संदेह के घेरे में हैं।

हाल ही में डीडीए ने अवैध निर्माण पर रोक को लेकर एक स्पेशल टाॅस्क फोर्स-एसटीएफ- का गठन किया है और ऐसा दिखाने की कोशिश की है कि मानों डीडीए, केन्द्र सरकार और उप राज्यपाल अवैध निर्माण पर बेहद सख्त हैं परंतु जमीन पर हालात इसके एकदम विपरीत हैं। एसटीएफ बनने के बाद भी अवैध निर्माण पर तिल भर का भी फर्क नही पड़ा है। यहां तक कि एसटीएफ के विज्ञापन पर लाखों करोड़ों रूपये फूंक दिये गये परंतु इन विज्ञापनों में दिल्ली के तीनों नगर निगमों के नोडल अधिकारियों की जो सूची दी गई है उनमें से अधिकतर ऐसे हैं जो स्वयं ही नख से शिख तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। उन्हें जब किसी अवैध निर्माण की शिकायत दी जाती है तो वह कहते हैं कि हमें ऐसे किसी एसटीएफ का पता नही है और हमारे पास इसके बारे में कोई नोटिफिकेशन भी नही आया है।

हाल ही में यह घटना पूर्वी दिल्ली नगर निगम में एक शिकायत देने गये जनता कालोनी के निवासी कलीमुद्दीन के साथ हुई। कलीमुद्दीन एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और इलाके में साफ सफाई, पर्यावरण, अवैध निर्माण, अतिक्रमण और अवैध पार्किंग आदि को लेकर संघर्ष के अग्रिम मोर्चे पर रहते हैं और उनके प्रयासों से अक्सर नगर निगम और अन्य संबंधित विभाग दबाव में रहते हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी कालोनी के काफी लोगों के साथ स्मैक जैसे नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया है और शुरूआती स्तर में ही इसके काफी सकारात्मक परिणाम दिखाई पड़ रहे हैं। कलीमुद्दीन 21 जून को अवैध निर्माण और अतिक्रमण के दो गंभीर मामलों की पुरानी शिकायत देने के लिए पूर्वी दिल्ली नगर निगम के शाहदरा उतरी जोन के नोडल अधिकारी जूनियर इंजीनियर संजय कुमार, (बी-1-1) के कार्यालय में शिकायत देने के लिए गये जिसे उपरोक्त अधिकारी के कार्यालय ने यह कहकर लेने से इंकार कर दिया कि ऐसे किसी एसटीफ का नोटिफिकेशन उनके पास नही है और उन्हें मालूम नही है कि संजय कुमार इस जोन के नोडल अधिकारी हैं। जब उन्हें 4 जून का नवभारत टाइम्स में प्रकाशित विज्ञापन दिखाया गया तो उन्होंने कहा कि हम अखबार की बात क्यों माने अधिक जोर देने पर उनका कहना था कि अखबार को ही शिकायत दे दें।

अब आश्चर्य की बात यह है कि डीडीए विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों में फुल पेज विज्ञापन देता है और उसमें वर्णित नोडल अधिकारी का कार्यालय ऐसे नोटिफिकेशन की जानकारी नही होने की बात कहकर शिकायत लेने से पल्ला झाड लेता है। जिससे साफ जाहिर है कि या तो डीडीए और केन्द्र सरकार और उप राज्यपाल सचिवालय अवैध निर्माण और शहर में जारी अनियमितताओं पर कोई कार्रवाई नही करना चाहता है और उपरोक्त सभी विभाग मिलकर कोर्ट की आंखों में धूल झौक रहे अथवा नगर निगम का भ्रष्टाचार कोर्ट से लेकर डीडीए और उप राज्यपाल को कुछ समझ ही नही रहा है और शिकायतों पर कार्रवाई से बचने के लिए एसटीएफ के वजूद और उसके बारे में होने वाले नोटिफिकेशन पर भी झूठ बोल रहा है।

बहरहाल, यही दिल्ली में अवैध निर्माण और अतिक्रमण रोकने की केन्द्र सरकार की एजेंसियों का सच भी है और जमीनी हकीकत भी है। न्यायपालिका रोज अवैध निर्माण पर सरकार को फटकारती है और केन्द्र सरकार की एजेंसियां झूठे शपथ पत्र और एसटीएफ और डीटीएफ जैसे प्रयासों से कोर्ट और दिल्ली की जनता की आंखों में धूल झौंकती रहती है। इस मामले में निगम अभियंता संजय कुमार और उनके कार्यालय के कर्मचारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नही किया जाना और उनके इलाके में अवैध निर्माण और अतिक्रमण की जांच नही करने से जाहिर होता है कि नगर निगम में किस स्तर तक भ्रष्टाचार व्याप्त है।