विकास के नाम पर आम आदमी की लूट और मोदी-जेटली में झूठ का मुकाबला

आईएनएन भारत डेस्क
2014 के आम चुनावों में किये गये अपने वादों को पूरा नही कर पाने की विफलता बल्कि ये कहें कि उनके बोले गये झूठ को कवर करने के लिए एनडीए सरकार के मुखिया और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार अब नये झूठ बोल रहे हैं और आंकड़ों की बाजीगरी कर रहे हैं। इसके अलावा अब वितमंत्री अरूण जेटली ने झूठे आंकडों से सरकार की विफलता को ढांपने की कमान संभाल ली है। आम आदमी की खुली लूट के बावजूद दोनों के विकास के झूठे दावो को सुनकर लगता है कि मोदी और जेटली में बढ़ चढ़कर झूठ बोलने का मुकाबला शुरू हो गया है।

कारपोरेट घरानों और पूंजीपतियों पर छूट बारिश करके और वहीं गरीब बैंक ग्राहकों पर नये कर लगाकर और नये डयूटी चार्ज थोपकर गरीबों की लूट करवाने के मौजूदा सरकार की करतूतों पर विपक्षी हमले का जवाब वितमंत्री ने नये झूठ और झूठे आंकडों की बाजीगरी से दिया है। आरोपों पर वितमंत्री अरूण जेटली की प्रतिक्रिया और आंकडाई बाजीगरी से कुल मिलाकर इस सरकार के आर्थिक रूख का प्रतीक है। जेटली ने इन आरोपों को ठुकराते हुए कि एनपीए का लाखों करोड़ रूपया बट्टे खाते में डाला गया है और यह दावा किया कि छोटे कर्जधारक गरीब किसानों का कर्ज माफ किया गया है। इसके बाद जेटली का यह दावा कि एनपीए का बट्टे खाते में डाले जाना केवल एक तकनीकी मामला है और सरकार ने जिस कर्ज को बड़े पूंजीपतियों ने वापस नही किया था, उन कर्जो को माफ नही किया है। यह निरा सफेद झूठ है।

पिछले चार बजटों के दौरान वितमंत्री ने स्वयं पूंजीपतियों के कर्ज माफ करने के लिए बड़ी रकम का आवंटन किया है। पिछले बजट में ही उन्होंने 78 हजार करोड रूपये का इस उद्देश्य के लिए आवंटन किया था। सरकारी आंकड़ें दशार्तें हैं कि जितना आवंटन पिछले केन्द्रीय बजटों में सरकार ने किया हैं बैंकों ने उससे कहीं ज्यादा कर्ज माफ किये हैं। यह ठीक उसी तरह का विनाशक निर्णय है जैसा कि नोटबंदी जिसने पूरी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डालने के साथ ही पूरी बैंकिंग प्रणाली को पूरी तरह तबाह कर दिया था।

जहां तक गैर निष्पादित संपदा (एनपीए) का सवाल है, सरकार के आंकड़े वितमंत्री के दावे से विरोध जाहिर करते हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार बैंकों ने मार्च 2018 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में रिकार्ड 1 लाख 44 हजार 93 करोड रूपये के कर्ज माफ किये हैं। यह पिछले साल माफ किये गये कर्ज 89, 048 हजार करोड से 61.8 प्रतिशत अधिक है। 2009 से बैंक 4 लाख 80 हजार 093 करोड रूपयों के कर्ज माफ कर चुके हैं। जिसमें से आधा मोदी सरकार के कार्यकाल में माफ किया गया है।

यह आंकड़ा केवल उस रकम को दिखाता है जिसकी वापसी पर संदेह था, बैंकों को हालिया कर्जों को भी माफ करने के लिए मजबूर किया गया था। अडानी और अंबानी के साथ ताजा कर्ज देने में पक्षपात किया गया कि इसकी भरपाई उनके पिछले कर्जों को माफ करके की गई। वितमंत्री को झूठे दावे करने से पहले अपने रिकार्ड की जांच करनी चाहिए। शायद मौजूदा सरकार के लिए टिके रहना संभव नही था बगैर गोदी मीड़िया द्वारा झूठी खबरे फैलाने और झूठा प्रचार किये।

जैसा कि बैंक दिवालिया होने कु कगार पर हैं तो सरकार साधारण ग्राहकों पर नई लेवी के बौझ लाद रही है। गरीब लोगों पर पैसा निकालने के लिए एक महीने में चार गुना अधिक कर लादे जा रहे हैं, गरीब लोगों के खाते में यदि न्यूनतम धनराशि नही है तो सरकार उन पर भारी लेवी लगा रही है जिसमें सहकारी बैंक भी शामिल हैं, यह बोझ अंत में ग्राहक पर ही जाने वाला है। इस बैंकिंग का एकमात्र मकसद गरीबों से लूटकर और कारपोरेट और कालेधन वालों को फायदा पहुंचाने का ही है।

नोटबंदी को कालेधन और आतंकी फंडिंग पर सर्जिकल हमले की तरह पेश किया गया। अब यह जाहिर हो चुका है कि इसका लक्ष्य कालेधन को सफेद करने का मौका देना था, अधिकतर उन्होंने काले को सफेद किया जो मौजूदा सरकार के करीब हैं। नोटबंदी से पहले उन्होंने दावा किया था कि कुल करेंसी चलन में 16 लाख करोड़ रूपये है जिसमें से 3 लाख करोड़ वापस नही आयेगी। भारतीय रिजर्व बैंक इसकी पुष्टि कर चुका है कि 99 प्रतिशत कररेंसी की वापसी हो चुकी है। इसका सरल सा अर्थ है कि तीन लाख से अधिक के कालेधन को सफेद किया जा चुका है।

जब 1000 और 500 के नोट को बंद किया गया था तो यह बताया गया था कि बड़े नोट की कालेधन की जमाखोरी की मुख्य स्रोत हैं। परंतु अपने दावे से उलट सरकार ने 2 हजार का नया नोट जारी कर दिया। ऐसा जान पड़ता है कि काले धन को सफेद करने के लिए 2 हजार और 200 का नोट मुख्य स्रोत हैं। काई नही समझ पा रहा है कि कालेधन वालों के पास ये नोट करोड़ो की रकम में कैसे पहुंचे जबकि आम आदमी के लिए इनके एक बार दर्शन भी दुलर्भ थे। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार नयी करेंसी जारी होने के बाद अब 19 लाख करोड के नोट चलन में हैं। इसका मतलब है कि नोटबंदी के विनाशक निर्णय के बाद अब कालाधन दोगुनी मात्रा में हो चुका है। सबसे डरावना पहलू यह है कि नया अर्जित कालाधन सफेद हो रहा है। यह सरकार कालेधन के बनने का संरक्षण कर रही है और कालाधन सृजित करने वालों की रक्षा कर रही नये शुरू किये गये नोटों की मदद से।

नोटबंदी को और 2 हजार, 500 और 200 रूपये की नयी करेंसी लाने के पूरे प्रकरण को फिर से देखे जाने की जरूरत है। एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच इस समय की सबसे बडी जरूरत है।

(साभारः न्यूएज-मुक्ति संघर्ष )