पुलिस ने पूछा की चमार है क्या? उसके बाद गिरफ्तार कर लिया, दलित विरोधी योगी सरकार का असली चेहरा

आईएनएन भारत डेस्क
एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून में बदलाव का विरोध में दो अप्रैल का आंदोलन कईं दलित परिवारों की जिंदगी का अभिशाप बन गया है। पुलिस ने इस आंदोलन के बाद विभिन्न धाराओं में दलित नौजवानों को उठाकर जेल में ठूसने का एक ऐसा बदले और घृणा का दौर चलाया जिसमें से साफ ब्राहमणवादी नफरत की बू आती है। उठाये गये नौजवान किस उम्र के थे और वह आंदोलन के समय कहां थे इस बात से पुलिस को कोई फर्क नही पड़ता। लगता था कि उन्हें पूरा करने के लिए उपर से कोई टारगेट दिया गया है जिसे उन्हें किसी भी कीमत पर पूरा करना है और इस हद तक दलित उत्पीड़न करना है कि दलित फिर से विरोध करने की हिमाकत नही कर सकें। अपने इस बदले के जुनून में पुलिस ने विशेषकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने यह भी नही देखा कि जिसे उसने गिरफ्तार किया है उसकी उम्र क्या है। सभी गरीब दलित परिवारों के बच्चों और नौजवानों को निशाना बनाकर कानून व्यवस्था के नाम पर उत्पीड़न का एक नया दौर चलाया गया है।

गिरफ्तार सभी लोगों पर लगभग एक जैसी धाराओं में मुकदमें दर्ज किये गये हैं। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147, धारा 148, धारा 149 (दंगा और उपद्रव से जुड़े मामले), धारा 332 (सरकारी अफसर को चोट पहुंचना), धारा 353, धारा 336, धारा 435, धारा 307 (हत्या करने का प्रयत्न), धारा 395 (डकैती), धारा 504 (शांतिभंग), धारा 120बी (आपराधिक षड्यंत्र), धारा 427 के अलावा दंडविधि (संशोधन) अधिनियम, 1932 की धारा 7 और प्रिवेंशन ऑफ डैमेज टू पब्लिक प्रॉपर्टी एक्ट, 1984 (4) जैसी गंभीर धाराएं अधिकतर मामलों में लगाई गई हैं। यहां तक कि 12 और 14 साल के बच्चों को भी नही बख्शा गया उन पर भी उपरोक्त धाराओं में मुकदमें दर्ज किये गये। 307 और 120बी जैसी धाराएं जिसमें साजिशन जानलेवा हमला बनता है भी 12 साल और 14 साल के छोटे नाबालिग बच्चों पर थोपी गई।

इन सभी मामलों से साफ जाहिर होता है कि यह मुकदमें एक जाति विशेष को सबक सिखाने के लिए दर्ज किये गये हैं। पुलिस उत्पीड़न के कुछ शिकार परिवार इस बात की तस्दीक भी कर रहे हैं कि पुलिस सरेआम उन्हें धमकाते हुए कहती है कि चमारों को कुछ ज्यादा ही मस्ती चढ़ गई थी, वह तो उतारनी ही पडेगी।

मेरठ शहर के कलियागढ़ी के धर्मवीर का 15 साल का बेटा सचिन जिसकी मां रामेसरी घर में साफ सफाई का काम करती है। धर्मवीर और उनका परिवार पुलिस के सामने बच्चे के नाबालिग होने और 15 साल का होने का सबूत पेश कर रहा है परंतु पुलिस ने उसे चार्जशीट में 20 साल का बताया है। सचिन की जन्मतिथि 25 अगस्त 2003 है। इस परिवार के पास अपने बच्चे की पैरवी करने लायक भी पैसे नही हैं। सचिन दो महीने से जेल में बंद है। परिवार का कहना है कि सचिन कोचिंग के लिए मास्टर जी के पास बात करने गया था। उसी समय पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने जाटव है या चमार है, ये बोलकर हमारे बच्चों को गिरफ्तार कर लिया।

सरायकाजी की रहने वाली 40 वर्षीय विधवा रौशनी का 14 वर्षीय बेटा अजय दो महीने से मेरठ जेल में बंद है। रौशनी के पति रामपाल की चार साल पहले लीवर खराब होने के चलते मौत हो गई थी। रामपाल सिलाई का काम करके परिवार की गुजर बसर करते थे। घर संभालने की जिम्मेदारी रौशनी की 17 वर्षीय बेटी पर है, जो क्रिकेट गेंद में सिलाई लगाने का काम करती है। अजय की जन्मतिथि 20 सितंबर, 2004 है।.रौशनी ने बताया कि दो अप्रैल को अजय मेरी दवाई लेने गया था लेकिन वह वापस लौटा ही नहीं। दो दिन तक नहीं ही पता चला कि वो कहां है। पुलिस अफसर भी सही जानकारी नहीं दे रहे थे. फिर पता चला कि वो बाल सुधार गृह में है। हम मिलने गए तो एक पेड़ के नीचे बैठा रो रहा था। उसने मुझसे कहा अम्मा जल्दी यहां से बाहर निकालो। अजय की मां रौशनी केवल विधवा ही नही बल्कि अपाहिज भी है। अजय ने जेल में बताया कि पुलिस ने पूछा, चमार है क्या? हामी भरने पर उठाकर जेल में बंद कर दिया।

कलियागढ़ की रहने वाली 35 वर्षीय सुंदरी के बेटे 12 साल के अभिषेक को दो अप्रैल को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अभिषेक बाल सुधार गृह में है। 12 साल के बच्चे पर 10 गंभीर धाराओं में मुकदमें। उनके पति नानकचंद मजदूरी करते हैं। उन्होंने बताया कि दो अप्रैल को चैधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के पास पानी पीते वक्त पुलिस ने जाति पूछ कर अभिषेक को गिरफ्तार कर लिया।
गिरफ्तार बच्चों के मां बाप ने कहा कि जाटव समाज के बच्चों को चुन-चुनकर गिरफ्तार किया गया है। वे चाहते हैं कि ये बच्चे जेल में सड़े या जिंदगी भर कचहरी के चक्कर काटें ताकि आगे न बढ़ पाएं। ये सरकार चुन चुन कर दलितों के साथ गलत कर रही है। पीड़ित परिवारों ने सवाल उठाया है कि पुलिस कैसे एक ही धारा के तहत सभी को गिरफ्तार कर सकती है।

पीड़ित परिवारों का मानना है कि दो अप्रैल की हिंसा में सवर्ण शामिल थे और पुलिस ने उन्हें मौका-ए-वारदात से गिरफ्तार भी किया था। लेकिन बाद में भाजपा के दबाव में उन्हें छोड़ दिया गया। वास्तव में ये प्रशासन का दोहरा चरित्र है, ये सभी काम दलितों के जज्बे और हौसलें को तोड़ने का प्रयास है। जिसमें मनुवादी न्यायपालिका भी शामिल है। जो साफ निर्दोष दिखाई दे रहे बच्चों को भी जमानत नही दे रही है।