प्रणब मुखर्जी का दौरा संघी रणनीति और पहले से तैयार पटकथा का हिस्सा

महेश राठी
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नागपुर यात्रा आजकल चर्चाओं में है। प्रणब मुखर्जी की नागपुर यात्रा और उनकी आरएसएस को दी गई सीख जिस पर कांग्रेस सहित अन्य प्रगतिशील और कथित धर्मनिरपेक्ष इतराते और इठलाते घूम रहे हैं। दरअसल, वह सभी कुछ संघी रणनीति का एक हिस्सा भर था और प्रणब का नागपुर जाना और संघ को प्रवचन करना एक लिखी गई पटकथा के अनुरूप ही अभिनीत किया गया था।

वास्तव में प्रणब मुखर्जी की यात्रा और आरएसएस कार्यकर्ताओं से संवाद ब्राह्मणवाद बनाम ब्राह्मणवाद से अधिक कुछ भी नही था। यदि भागवत और प्रणब के भाषणों को गौर से देखें तो उसमें कोई अंतर भी नजर नही आयेगा। असल में यह संघ की अपने आप को उदार और नये अवतार में पेश करने की कोशिश का एक हिस्सा ही था जिसे प्रणब मुखर्जी ने बखुबी मंजिल तक पहुंचाने का काम किया। असल में सत्तासीन भाजपा के लिए संघ उसकी बुनियादी ताकत की तरह है। परंतु अभी तक की उसकी ताकत रहा यही संघ अपना मुस्लिम विरोधी मानसिकता के कारण अब भाजपा की सत्ता की लड़ाई के लिए मुश्किलें पैदा करने वाला बनता दिखाई पड़ रहा है और ऐसे में संघ के लिए जरूरी है कि वह अपनी मुस्लिम विरोधी छवि में बदलाव लाये और कट्टरपंथी हिंदू भक्तों से बाहर विशेषकर विरोधी पंथों में अपने आप को स्वीकार्य बनाये। अपनी इसी कोशिश में संघ ने अपने आप को स्वीकार्य बनाने की जो रणनीति तैयार की है प्रणब मुखर्जी की नागपुर यात्रा उसी का एक अहम पड़ाव था।

अगली कोशिशों में आरएसएस और उसके वरिष्ठ नेता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ईद मिलन के आयोजन से लेकर उसमें शामिल होने की कवायद में जुट गये हैं। इसी सिलसिले में आरएसएस के प्रयासों से बना राष्ट्रीय मुस्लिम मंच संसद एनेक्सी में ईद मिलन का आयोजन कर रहा है जिसमें भाजपा और संघ के वरिष्ठ नेताओं के भाग लेने की खबरें मीड़िया में दिखाई, सुनाई पड़ रही हैं। इन खबरों में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के संयोजक मुहम्मद अफजाल के हवाले से साफतौर पर दावा किया जा रहा है कि उलेमाओं और धर्म से जुड़े अन्य लागों को इस ईद मिलन में बुलाकर संघ के प्रति बनी गलतफहमियों को दूर करने का प्रयास किया जायेगा। इस कार्यक्रम में उलेमाओं के अलावा मुस्लिम देशों के नेताओं और राजदूतों को भी आमंत्रित किया गया है। ध्यान रहे कि रमजान के महीने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच जगह जगह इफ्तार की दावतों का आयोजन करता रहा है जिसमें संघ के प्रमुख नेता इंद्रेश कुमार सहित संघ के अन्य नेता भाग लेते रहे हैं।

दरअसल, 2014 में भाजपा ने लोकसभा की 282 सीटे हासिल की और उसमें एक भी मुस्लिम सांसद नही था। इस प्रकार भाजपा और संघ ने एक तरह का यह माॅडल पेश किया कि बगैर मुस्लिम वोटों के भी सत्ता हासिल की जा सकती है। उसने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि बगैर मुस्लिमों के वोट के कोई भी दल बहुमत हासिल नही कर सकता है यह एक तरह का मिथक ही है। जिसे उसे 2014 में तोड़कर दिखा दिया था और उसका नतीजा यह हुआ कि केवल भाजपा ही नही सभी धर्मनिरपेक्ष दलों के मुस्लिम नेता भी अपने दलों की पिछली कतारों में चले गये और सभी धर्मनिरपेक्ष दल ऐसी कोशिश में लगे रहे कि उन्हें मुस्लिम परस्त नही सिद्ध किया जाये। परंतु पिछले दिनों जैसे जैसे भाजपा के खिलाफ एक व्यापक महागठबंधन की कोशिशे तेज हुई और भाजपा को उपचुनावों में अपने कईं गढ़ों में हार का मुंह देखना पड़ा तो विपक्ष सहित भाजपा को भी समझ में आना शुरू हो गया है कि उसकी 2014 या उसके बाद की जीतें असल में वोटों के बंटवारे के कारण थी और मुस्लिम वोट अथवा बाकी सभी धर्मनिरपेक्ष वोट यदि बंटेगे तभी उसकी जीत हो सकती है और यदि वोट नही बंटते हैं तो उसे अपनी मुस्लिम विरोधी छवि से नुकसान ही होगा फायदा नही। इसी वास्तविकता को समझते हुए भाजपा ने अपनी इस छवि को बदलने की कवायद शुरू कर दी है।

अब सवाल उठता है कि भाजपा की छवि बदलने की कवायद में संघ की क्या भूमिका है। वास्तव में संघ की राजनीतिक आकांक्षा का नाम ही भाजपा है। इसके अलावा भाजपा का कोई अस्तित्व भी नही है। हालांकि भाजपा इसे नकार सकती है परंतु यदि हम इस देश में संघ के इतिहास को ध्यान से देखें तो भाजपा के वजूद की असलियत साफ हो सकती है। आजादी से पहले संघ का राजनीतिक मोर्चा अखिल भारतीय हिंदू महासभा थी बल्कि कईं जानकार लोगों का कहना है कि अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सांस्कृतिक अंग की शक्ल में ही आरएसएस का जन्म हुआ और फिर उससे जुड़े हुए दूसरे जन संगठन अस्तित्व में आये। परंतु गांधी की हत्या के बाद संघ और हिंदू महासभा पर प्रतिबंध लग गया था। जिसके बाद जुलाई 1949 में आरएसएस के नेता गोलवलकर ने राजनीति में कोई सीधा दखल नही करने और संविधान के अनुरूप काम करने का शपथ पत्र भारत सरकार को दिया जिसके बाद संघ पर से प्रतिबंध हटा था। परंतु हिंदू महासभा की राजनीतिक गतिविधियों पर रोक जारी रही। जिस कारण आरएसएस को फिर से एक राजनीतिक दल की आवश्यकता हुई और इसी क्रम में आगे चलकर 1950 के दशक में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर संघ ने जनसंघ की स्थापना करवाई। अपातकाल तक यह दल बना रहा और आपातकाल के समय जब जय प्रकाश नारायण ने पार्टी विहीन लोकतंत्र और संपूर्ण क्रान्ति का नारा दिया तो जनसंघ का विलय जनता पार्टी में कर दिया गया। उसके बाद जनता पार्टी में बंटवारे के बाद 1980 में गांधीवादी समाजवाद को अपने घोषणापत्र का हिस्सा बनाकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया गया। इस प्रकार भाजपा संघ का ही एक हिस्सा है और वैसे भी भाजपा की ताकत संघ का देशभर में मौजूद कैडर आधार ही है और पूरे भारतीय जनमानस में संघ की छवि मुस्लिम विरोधी है जिसका भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है इसीलिए उस भावी नुकसान से बचने के लिए संघ की छवि बदलने की यह कवायद शुरू हुई है।

भाजपा संघ का ही राजनीतिक संगठन है और जिस तरह से संघ सरकार के मामलों में सीधा दखल कर रहा है, उससे वह 1949 में दिये गये अपने शपथपत्र की शर्तों का उल्लंघन करके फिर से प्रतिबंध की वैधानिक चुनौती की जमीन तैयार कर रहा है। आज 10 जून 2018 के अखबारों में ही चर्चा है कि भाजपा और संघ के नेताओं और सरकार के बीच सरकार के कामकाज को लेकर चर्चा हुई और मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ऐसी कईं मीटिंगें हो चुकी है जो संघ के सीधे राजनीति में दखल का मामला है। जिसे वैधानिक चुनौती दी जानी चाहिए और संघ पर 1948 के प्रतिबंध को फिर लागू करने की मांग की जानी चाहिए।

बहरहाल, मौजूदा हालात में संघ और उसके राजनीतिक संगठन भाजपा को नये बनते व्यापक गठबंधन के कारण अपनी छवि बदलने और अभी तक विरोधी समझे जाने वाले अल्पसंख्यकों को अपनी तरफ लुभाने की जरूरत महसूस हो रही है जिसके कारण ही उसे बदले हुए चेहरों और छुपे हुए नामों के साथ ईद मिलन और इफ्तार जैसे आयोजन करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। इसी जरूरत के अनुसार अभियान शुरू करने के लिए उसने एक उदार बा्रहमण को नागपुर आमंत्रित किया जिसकी छवि धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील मानी जाती है। हालांकि उस उदार ब्राहमण ने केवल वही कहा जिसकी उम्मीद प्रगतिशीलता और धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़े उदार ब्राह्मणवाद से की जाती है। संघ बेशक अपनी छवि बदलने की कोशिश में परंतु यह काम अभी थोड़ा बच बचकर किया जा रहा है, जिससे उसके हिदंुवादी भक्त भी नाराज नही हों।