भगवा आतंकी की रक्षा के लिए दलित गिरफ्तारियां

दुनिया की सबसे बड़ी और दीर्घकालिक शोषण व्यवस्था अपने अस्तित्व और वर्चस्व के लिए फिर से हमलावर है। उसका हमला उत्पीड़न के नये रूपों और नई साजिशों के रूप में रोजाना सामने आ रहा है। वह अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए नयी अवधारणाएं गढ़ती है, नये नायक और खलनायक बनाती है। नये नायकों, खलनायकों और नयी अवधारणाओं के सृजन के समानांतर ही यह ब्राह्मणवादी व्यवस्था अपने हमलावर दस्तों के गठन करती है उन्हें सशक्त करती है।

इस ब्राहमणावदी शोषण प्रणाली को ऐसा नही है कि कभी चुनौती नही मिलती है। हर युग, हर दौर में शोषण की इस निकृष्तम व्यवस्था को चुनौतियां मिलती रही हैं। सिंधु घाटी सभ्यता पर से लेकर बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार तक इसे विभिन्न रूपों में चुनौतियां मिली हैं। परंतु उन चुनौतियों से सीख लेकर और मौका देखकर यह ब्राह्मणवादी आतंक फिर हमला करता है और अपना वर्चस्व स्थापित करता है। मौजूदा दौर में उसे देश के वंचितों से फिर चुनौती मिल रही है और ब्राह्मणवाद उस चुनौती का जवाब देने के लिए फिर से अपने भगवा आतंकी गिरोहों के साथ योजनाबद्ध हमले कर रहा है। ब्राह्मणवादी चुनौती को भीमा कोरेगांव की जीत की प्रेरणा प्रभावी और निर्णायक बना रही है तो मौजूदा दौर में ब्राहमणवादी शोषण व्यवस्था को भीमा कोरे गांव की जीत का भूत डरा रहा है। इसी डर के कारण ब्राह्मणवाद उसके खिलाफ सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहे दलित तबकों को निशाना बनाकर उनका उत्पीड़न कर रहा है। इसका ताजातरीन उदाहरण भीमा कोरेगांव की 200वीं बरसी को मानने के अवसर पर हुए संघर्ष के नाम पर पांच दलितों को माओवादी लिंक बताकर उठाना है।

भीमा कोरेगांव के असली गुनहगार को महाराष्ट्र की भगवा सरकार बचाना चाहती है। बावजूद इसके कि संभाजी राव भीन्डे को गिरफ्तार करने का आदेश कोर्ट भी दे चुका है फिर भी महाराष्ट्र सरकार उसे पकड़ना नही चाहती है। सभी जानते हैं कि भीमा कोरेगांव की घटना का शिल्पकार भीन्डे था फिर भी वह आजाद घूम रहा है। जबकि भीमा कोरेगांव के नाम पर पकड़े गये पांचों दलित में से चार तो ऐसे हैं जो उस दिन भीमा कोरेगांव गये भी नही थे। परंतु केन्द्र और राज्य की भगवा सरकार अनुसूचित जातियों के उभार को दबाने के लिए यह नई तरकीब लेकर आयी है। उन्हें अब माओवादी लिंक के नाम पर अथवा शहरी माओवादी कहकर धरा जायेगा। यह बहुजनों को कुचलने के भगवा आतंकवाद की बहुआयामी रणनीति का हिस्सा है।

यदि इन पांच लोगों को केवल भीमा कोरेगांव के नाम पर फंसाया जाता तो मामला दलित उत्पीड़न का बनता और राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो जाती और भाजपा और संघ के खिलाफ लंबे समय से बन रहे दलित उभार को एक नई उंचाई हासिल हो जाती। इसीलिए अबकी बार हमला माओवादी बताकर किया गया है। जबकि सभी बहुजन चिंतक साफतौर पर इन्हें अंबेडकरवादी बता रहे हैं। परंतु सरकार है कि उनके साथ माओवादी का तमगा लगाकर उन्हें अलग थलग कर देना चाहती है। यह भगवा आतंकवाद के उत्पीड़न का नया माॅडल है। जिसे आदिवासी इलाकों के जंगलों के बाहर शहरी और ग्रामीण जीवन में अजमाया जायेगा।

दरअसल, इस नये माॅडल के कईं फायदे हैं। भगवा गिरोह को लगता है कि पिछले दो-एक सालों से जो बहुजन एकता अनुसूचित जाति/जन जाति/पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की बन रही है इन दलित लोगों की गिरफ्तारियों को माओवादी कहने से उससे बचा जा सकता है। शहरी पढ़े लिखे दलित, पिछड़े तबकों को भी इन गिरफ्तारियों के खिलाफ बनने वाले प्रतिरोध से दूर किया जा सकता है। वैसे ऐसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय साफ है यदि आप माओवादी साहित्य पढ़ते हैं अथवा आप का व्यक्तिगत रिश्ता किसी माओवादी से है अथवा आपकी हमदर्दी भी माओवादी के साथ है तो वह आपकी गिरफ्तारी का कारण नही बन सकता है। बशर्ते आपकी ऐसे किसी माओवादी हमले प्रत्यक्ष संलिप्तता नही हो जबकि जिस घटना से जोड़कर इन पांचों को गिरफ्तार किया गया है उनमें से चार तो उस दिन भीमा कोरेगांव में थे ही नही। परंतु सवाल अवधारणा की राजनीति का है।

हालांकि भगवा गिरोह की यह चाल भी कुछ ज्यादा चलने वाली नही है। अपनी सारी चालबाजियों के अलावा देश के बहुजन तबकों में जो चेतना पिछले दो-तीन सालों में व्याप्त हुई है उसको ब्राह्मणवादी भगवा गिरोह कुछ कम करके आंक रहे हैं। उसे समझना होगा कि जैसे स्पष्ट और प्रभावी चुनौती ब्राह्मणवाद को इस दौर में मिल रही है। वैसी चुनौती उसे इतिहास में कभी नही मिली है और अपनी इस तरह की चालबाजियों से भगवा आतंकी देश की बहुमत आबादी को अधिक दिन बरगला नही सकते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में एक दो दिनों में ही भगवा सरकार की सारी करतूत लोगों के सामने अपने असली रंग में आ जायेगी और फिर उसे एक नही कईं रोहित वेमुलाओं और कईं चन्द्रशेखर रावणों का सामना करना होगा। ब्राह्मणवाद समझ ले कि उसकी कोई साजिश, उसकी को मक्कारी भरी चालबाजी उसके अंत उसके सफाये को नही रोक सकती है।