भारत के इतिहास पर ब्राह्मणवादी हमला, ब्राहमणवादी मीड़िया ने संभाली हमले की कमान 

आईएनएन भारत डेस्क
ब्राह्मणवादी हमला फिर से एकबार भारत का इतिहास बदलने की साजिशों में लग गया है और अबकी बार इसकी कमान संभाली है देश के ब्राह्मणवादी मीड़िया ने। भारत का ब्राह्मणवाद हमेशा आर्यों को भारत का मूल निवासी बताने पर उतारू रहा है। ब्राह्मणवाद को ऐसा सिद्ध करने के लिए कितने ही झूठ कितनी ही साजिशों का सहारा लेना पड़़े उसे कोई शर्म इसमें आती नही है। वर्तमान समय में जबकि डीएन के वाय क्रोमोसेम के ताजा अध्ययन और वाय क्रोमोसोम की मैपिंग से यह तय हो गया है कि आर्य विदेशी हमलावर थे और वे केवल मर्द ही भारत की जमीन पर हमलावर के रूप में आये थे, तब भी ब्राह्मणवाद आर्यो को यहां का मूल निवासी सिद्ध करने के लिए तमाम झूठों का सहारा ले रहा है।
पिछले कुछ समय से ब्राह्मणवाद की तमाम साजिशों को प्रचारित और प्रसारित करने का नेतृत्व भारत के ब्राह्मणवादी मीड़िया ने अपने हाथों में ले लिया है। और उसी ब्राह्मणवादी मीड़िया ने फिर से साजिशपूर्ण सक्रियता दिखाई है। अबकी बार यह ब्राह्मणवादी मीड़िया बागपत जिले के सनौली गांव में हुई पुरातात्विक खोजों को जोर शोर से महाभारत कालीन खोजें बताकर अपनी ब्राह्मणवादी साजिशों का पता दे रहा है। ऐसा पहली बार नही है कि ब्राह्मणवाद आर्यों को भारत का मूल निवासी बताने में इस कदर जल्दबाजी करे और मुंह की खाये। इसी कोशिश में यह संघी गिरोह सालों से सरस्वती नदी की खोज पर करोड़ों रूपये बहा चुका है और कभी लकड़ी का कोई टुकड़ा समुन्द्र से लाकर इसे प्राचीन द्वारका का अवशेष बताने लगता है। और दावा खारिज हो जाने इन्हें शर्मिंदगी भी नही होती है।
ताजा घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश के बागपत में आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को 5000 साल पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं। खेत की जमीन से महज दस सेंटीमीटर नीचे मिली कांस्य युगीन सभ्यता के बारे में जानकारों का कहना है कि यह सभ्यता मेसोपोटामिया जैसी समृद्ध रही होगी।
ध्यान रहे एएसआई के अधिकारी 2006-07 से बागपत के सादिकपुर सनौली गांव में खुदाई कर रहे हैं। इस गांव में 2007 में कईं कब्रे खोजी गई थी। बताया जाता है कि अभी तक 122 के लगभग कब्रें इस गांव के पास से खोदी गई हैं और एएसआई के अधिकारियों का मानना है कि जितनी बड़ी संख्या में यहां कब्रें मिली हैं हो सकता है कि यह किसी बस्ती का कब्रिस्तान रहा हो। यह कब्रें उत्तर से दक्षिण दिशा में बनी हैं। अब ताजा प्रकरण हाल ही में मिली एक 5000 साल पुरानी कब्र को लेकर है और सबसे बड़ी बात तो यह कि इस इलाके में खुदाई के दौरान कई कब्रें मिली हैं।
पहली बार खुदाई में शव के साथ इस तरह के सामान रखे मिले हैं। कब्र की खुदाई के दौरान शव के पास पहली बार दो रथ और तांबे की कई तलवारें और टोपियां मिली हैं जिससे पता लगता है कि ये किसी राजा या योद्धा के परिवार की कब्रगाह हैं। अब तक हड़प्पा कालीन खुदाई में इस तरह के सुसज्जित सामान नहीं मिले हैं। इसलिए पुरातत्व विभाग इसे बड़ी खोज बता रहा है। पुरातत्व संस्थान के निदेशक संजय कुमार मंजुल बताते हैं कि कब्रों में रखे शव पूरब और पश्चिम दिशा की ओर हैं। इस कब्रगाह में राजा के साथ उनके परिवार और जानवर को भी दफनाया गया है।
कब्र में रखे बर्तन, पांच हजार साल पुराने सोने के आभूषण और नक्काशीदार कंघी मिलना इसकी आधुनिकता को दर्शाता है। पहली बार पूरी तलवार मिली है। ये कंघी जिस पर मोर बना है। ये अब तक नहीं मिले थे। बागपत में इस तरह के दो दर्जन ऐतिहासिक जगहें हैं जहां हड़प्पाकालीन सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।  जिनसे पता चलता है कि यमुना, हिंडन और गंगा नदी के बेसिन में कई सभ्यताओं ने जन्म लिया था।
इस नई खोज के बाद शुरू हुआ है ब्राह्मणवादी मीड़िया का खेल। पूरा ब्राह्मणवादी मीड़िया इन कब्रों को महाभारत कालीन कब्रें बताने पर तुला है। इसके लिए उनके तर्क भी अजीबों गरीब और हवाई हैं। उनका कहना है कि महाभारत काल में पांडवों के कौरवों से मांगे गए 5 गांवों में से एक गांव बागपत भी शामिल था। अब इन पौराणिक गप्पों के कोइ्र साक्ष्य तो हैं नही परंतु इन गप्पों के आधार पर ब्राह्मणवादी मीड़िया इसे महाभारत के समय की सभ्यता से जोड़कर दिखा रहा है। वैसे बागपत से लगभग तीस किलोमीटर दूर बडौत तहसील के सनौली गांव में ये कब्र मिली हैं। परंतु 300 किलोमीटर भी होती तो भी ब्राह्मणवाद इसे पांडवों से जोड ही देता। और इस ब्राह्मणवादी मीड़िया की योजना और झूठ की साजिश में एकता देखिये कि देश के जाने माने दैनिक समाचार पत्रों से लेकर गोदी मीड़िया के वेब पोर्टल तक इस झूठ को आम आदमी के दिमागी में ठूसने पर अमादा है।
इस खुदाई का काम देख रहे एएसआई के एक अधिकारी इन अवशेषों का समयकाल बता रहे हैं। उनका कहना है कि अब तक जो कुछ भी मिला है, जांच पड़ताल से यह लगता है कि यह सब 4000 से 5000 साल पुराना रहा होगा। यानी लगभग 1800 से 2000 ईसा पूर्व का। यहीं से हमेशा की तरह ब्राह्मणवाद की साजिशी खोपड़ी की करतूत शुरू होती है वह एएसआई के अधिकारियों के कथन में केवल एक पंक्ति जोड़ देता है कि यही समय महाभारत काल का भी है और इस खोजों को महाभारत कालीन बताने का खेल शुरू हो जाता है।
गौरतलब है कि कब्रें और अंतिम संस्कार के जो सबूत मिले हैं, उनमें अब तक पहली बार ताबूत में रखी इतनी पुरानी कब्रें मिली हैं। यह सब कब्रें लकड़ी के मजबूत ताबूत में बंद हैं।  इनकी दीवारों पर तांबे की प्लेटिंग है, जिस पर तमाम तरह की आकृतियां बनाई गई हैं।
आम तौर पर ताबूत में लोहे की किलो का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन इन ताबूत में तांबे की कीलों का इस्तेमाल किया गया है। जिससे यह सिद्ध हो जाता है कि यह ताम्रयुगीन सभ्यता के अवशेष हैं। जाहिर है कि सिंधु घाटी सभ्यता और हडप्पाकालीन सभ्यता कांस्य सभ्यता थी। और इन अवशेषों को हडप्पा संस्कृति से जोड़ने से बचने के लिए पूरा ब्राह्मणवादी मीड़िया कितने शातिर तरीके से एकजुट हो गया है यह ब्राहमणवाद की साजिशी खोपड़ी का एक अनूठा और ताजातरीन नमूना है। इसके पास ही एक गढ्ढे में दो रथ, ताबूत के सिरहाने में मुकुट जैसी चीज के अवशेष भी मिले हैं. यही नहीं, ताबूत के पास तीन तलवारें, दो खंजर, एक ढाल, एक मशाल और एक प्राचीन हेलमेट भी मिला है।
हाल ही में मिली कब्र जिसे शाही कब्र कहा जा रहा है पुरानी कब्रों से 120 मीटर दूरी पर है। एएसआई अधिकारियों ने बताया कि साल 2005 में इसी जगह से 120 मीटर की दूरी पर एक कब्रगाह मिली थी, जिसमें से लगभग 122 कब्रें मिली हैं। उन कब्रों के पास भी तलवारें आदि मिली थी।
इन नई खोजों को महाभारत कालीन बताने की जल्दी में ब्राह्मणवादी मीड़िया यह भी भूल गया कि उनके तथाकथित महाभारत में दाह संस्कार होता था, मुर्दों को दफनाया नही जाता था। यहां तक कि उनके प्राचीनतम ग्रंथ ऋगवेद के दशम मंडल में भी दाह संस्कार का जिक्र है और उनके पूरे धर्म ग्रंथ दाह संस्कार की परंपराओं से भरे पड़े हैं। यदि अंतिम संस्कार के तरीकों के इतिहास को खंगाले तो दो तथ्य सामने आते हैं।
1. मुर्दो को दफनाने की परंपरा सिंधु घाटी सभ्यता की विशेषता थी और सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पहले भी इसके अवशेष मिल चुके हैं। इसका कारण भी बेहद स्वाभाविक था। कृषि प्रधान सभ्यता होने के कारण मानव शरीर के दफनाने को जमीन की उर्वरता से जोड़कर देखा जाता था।
2. दूसरे युनानी और आर्य एवं पूर्व आर्य सभ्यताओं में मुर्दों को जलाया जाता था।
3. हाल ही की डीएनए मैपिंग विशेषकर वाय क्रोमोसोम के आंकड़ों और उसकी मैपिंग ने सिद्ध किया है किया है कि आर्यों के भारत में हमले अथवा उनके आने का समय 4000 से 4500 ईसा पूर्व का समय था। हिंदकुश पर्वत से गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों में फैलने में इन आर्यों को 800 से 1200 के लगभग साल लग गये थे।
अब इन्हीं सभी तथ्यों को नकारने के लिए किस सफाई से ब्राह्मणवादी मीड़िया जुट गया है, वह देखने लायक है। हो सकता है कि किसी विवेकानन्द फाउंडेशन का ज्ञान अथवा नागपुरी इतिहासकारों का योजनाबद्ध प्रयास इन खबरों के पीछे हो परंतु यह तय है कि यह संगठित और सुनियोजित