ईवीएम मशीन पर उठते सवाल और सवालों से ठिठका लोकतंत्र

महेश राठी
मशीन के इस दौर में मशीन इंसानी जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा बन गया है मशीन इंसानों को सुविधा देने और उसके कामों को सटीक और सही बनाने का साधन है। परंतु एक मशीन ऐसी भी है जिस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। और यह सवाल कोई मामूली नही है, यह सवाल लोकतंत्र पर खतरे और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर खतरे की शक्ल में चर्चाओं में हैं। यह मशीन है इलेक्टिक वोटिंग मशीन अर्थात ईवीएम।

देश के लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दल इस मशीन पर सवाल खड़े कर रहे हैं। मगर वहीं दूसरी तरफ देश का चुनाव आयोग ईवीएम से मतदान कराने के सवाल पर अडियलपन की हद तक अड़िग है। और उससे भी ज्यादा अडियल रवैया सत्ताधारी दल भाजपा का है। ईवीएम पर सवाल उठते ही चुनाव आयोग से पहले सत्ताधारी दल के नेता मैदान में आकर विपक्ष पर आरोप प्रत्यारोप शुरू कर देते हैं। ठीक ऐसा ही नजारा कैराना लोकसभा उप चुनाव में देखने को मिला।

कैराना वैसे तो ख्याल गायकी के लिए निर्विवाद रूप से दुनिया भर में मशहूर किराना घराने के कारण जाना जाता है परंतु 28 मई को लोकसभा उप चुनाव के मतदान के दिन पक्ष और विपक्ष सभी मिलकर ख्याल गायकी से इतर ईवीएम खराबी का राग गा रहे थे। जहां एक तरफ संयुक्त विपक्ष मशीन खराबी को लेकर भाजपा पर हमलावर था तो वहीं भाजपा उम्मीदवार भी मशीन कार्यप्रणाली पर सवाल खडे करते हुए चुनाव आयोग पहुंच गयी थी।

कैराना के अलावा पालघर, भंडारा-गोदिंया और अनेकों विधानसभा क्षेत्रों में भी इस प्रकार के आरोप सत्तापक्ष पर लगाये गये। परंतु दिलचस्प नजारा तो तब बना जब भाजपा उम्मीदवार कैराना में ईवीएम मशीनों की शिकायत लेकर चुनाव आयोग गई हुईं थी और दूसरी तरफ भाजपा के अनेकों प्रवक्ता टीवी चैनलों में ईवीएम के पक्ष में मोर्चा खोले हुए थे। एक प्रवक्ता ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेता पर सवाल दाग दिया जब कांग्रेस सत्ता में थी तब आपने यह सवाल क्यों नही उठाये। शायद वह भूल गये कि उस समय भाजपा के नेताओं ने यह सवाल खड़े किये थे और कोई छोटे मोटे छुटभैया नेताओं ने नही लाल कृष्ण आडवाणी और सुब्राहाणयम स्वामी जैसे लोगों ने सवाल खडे किये थे।

भाजपा के प्रवक्ता जीएलवी नरसिम्हा राव ने तो 2010 में ईवीएम टेंपरिंग पर एक किताब ही लिख डाली। किताब का शीर्षक था ‘‘डेमोक्रेसी एट रिस्कः कैन वी ट्रस्ट अवर ईवीएम‘‘। राव ने कहा कि ईवीएम से साफ और जवाबदेह चुनाव हो ही नही सकते हैं और राव ने 2010 में जमकर ईवीएम का विरोध किया और साफ एवं जवाबदेह चुनावों के लिए बैलेट पेपर की वकालत की।

इसके अलावा आडवाणी ने भी ईवीएम पर सवाल उठाते हुए कहा कि जर्मन ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया है और अमेरिका में भी कुछ राज्य इसे वीवीपैट के साथ इस्तेमाल कर रहे हैं। याद रहे 2009 के आम चुनावों के बाद भाजपा ने ईवीएम पर जमकर हमला बोला था। आडवाणी ने यहां तक बता डाला था कि अमेरिका के 50 में से 32 राज्यों के विधानमंडलों ने ईवीएम के साथ वीवीपैट लागू करने का विधेयक पारित कर दिया है।

इसके अलावा एक ईवीएम विरोधी एक्टिविस्ट हरि के प्रसाद को ईवीएम चोरी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। जिसका टीडीपी नेता चन्द्रबाबू ने बचाव किया और ईवीएम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिये।
ईवीएम के इस विरोध के बीच सबसे मजबूत विरोध आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा में ईवीएम मशीन जैेसी मशीन पर टेंपरिंग करने का डेमो देकर किया। उसके बाद चुनाव आयोग ने ईवीएम मशीन को टेंपर करने की चुनौती राजनीतिक दलों के सामने रखी। परंतु इसका सबसे हैरान करने वाला पहलू यह था कि इसमें आपको ईवीएम को खोलने का अधिकार नही होगा। यह आश्चर्यजनक था कि बगैर मदर बोर्ड को छेडे और मशीन को खोले मशीन टेंपर करने की चुनौती दी गई थी जो कि अजीब भी था और नामुमकिन भी। हालांकि आप विधायक सौरभ भारद्वाज का कहना था कि मशीन टेंपर करना कुछ मिनट का काम है। परंतु अगर उसे खोलने ही नही दिया जायेगा तो यह कैसे संभव है कि आप मशीन टेंपर कर पायें। बहरहाल, चुनौती के इस तमाशे में जीत चुनाव आयोग और भाजपा सरकार की होनी थी और वही हुआ।

वैसे ईवीएम टेंपरिंग को लेकर कई रिपोर्टे सोशल मीड़िया पर पिछले दिनों वायरल हुई और लोगों ने उन्हें देखा भी। परंतु इसमें सबसे चर्चित रिपोर्ट 18 मई 2010 को बीबीसी पर प्रकाशित हुई। जिसमें अमेरिका के मिशीगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि उन्होंने भारतीय ईवीएम को हैक करने की तकनीक विकसित कर ली है। उन वैज्ञानिकों का दावा था कि केवल एक मोबाइल टेक्स्ट के द्वारा ही ईवीएम में टेंपरिंग की जा सकती है। इस परियोजना का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर जे एलेक्स हैल्डरमेन ने दावा किया कि केवल एक मोबाइल टेक्सट के द्वारा ईवीएम को हैक किया जा सकता है। इस परियोजना के तहत एक ईवीएम जैसी मशीन बनाई गयी और उसे हैक करने की तकनीक इस परियोजना के तहत विकसित की गई। और ध्यान रहे यह तकनीक 2010 में तैयार की गई थी। उनके अनुसार यह सब एक ब्ल्यू टूथ रेडियो और एक माइका्रेप्रोसेसर की मदद से किया जाता है।

असल में ईवीएम मशीन पर केवल भारत में ही नही कई अन्य देशों में सवाल उठाये जा रहे हैं। अफ्रीकी देश बोत्सवाना में ईवीएम मशीन के उपयोग को लेकर खासा विवाद बना हुआ है। सत्तारूढ बोत्सवाना डेमोक्रेटिक पार्टी अर्थात बोत्सवाना जनतांत्रिक पार्टी जो हमारी भाषा में यदि संक्षिप्त रूप में पुकारी जाये तो उसे भी बीजेपी ही कहा जायेगा, ईवीएम के इस्तेमाल पर उतारू है और प्रमुख विपक्षी दल बोतस्वाना कांग्रेस पार्टी इसका विरोध कर रही है। अब बोत्सवाना कांग्रेस और बोत्सवाना नेशनल फ्रंट और कई अन्य पार्टियों ने मिलकर ईवीएम के खिलाफ एक महागठबंधन बनाया है जिसे यूडीसी कहा जाता है। यूडीसी अर्थात अंब्रेला फार डेमोक्रेटिक चेंज।

अब हाल ही में संपन्न उप चुनावों के बाद जब फिर से ईवीएम पर सवाल उठाये हैं तो इस सवाल पर नये सिरे से चर्चा लाजिमी है। ईवीएम पर कईं तरह के सवाल हैं। सुप्रीम कोर्ट के भारी दबाव के बाद चुनाव आयोग वीवीपैट लागू करने के लिए तैयार हुआ और काफी लंबे समय तक मामला लटकाये रखने के बाद भाजपा सरकार ने वीवीपैट के लिए धनराशि का आवंटन किया है। परंतु वीवीपैट केवल एक सत्यापन प्रक्रिया है जिसमें कि मतदाता को केवल इतना पता चलता है कि उसने किसे वोट दिया है। यदि विपक्ष द्वारा वीवीपैट पर्चियों की गिनती की मांग करने के बाद भी चुनाव आयोग इसके लिए सहमत नही होता है तो वीवीपैट निरर्थक सिद्ध हो जायेगी। विपक्षी दल लगातार मांग कर रहे हैं कि या तो चुनाव आयोग पेपर बैलेट को वापस लाये अन्यथा सभी निर्वाचन क्षेत्रों में 25 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों की गिनती कराई जाये। जिस पर चुनाव आयोग अभी तक सहमत नही है।

परंतु अब मामला टेंपरिंग और वीवीपैट की गिनती से आगे निकल गया है। ऐसे कई मामले पिछले दिनों सामने आये हैं जिससे ईवीएम की विश्वसनीयता दांव पर लग गई है। अप्रैल 2017 में धोलपुर, राजस्थान में ईवीएम मशीन दबाये जाने वाले बटन की बजाये दूसरे व्यक्ति को वोट दर्शा रही थी। वहीं अप्रैल 2017 में ही मध्यप्रदेश के भिण्ड में मशीनों में छेडखानी का मामला सामने आया जिसमें वोट किसी को भी डाला जाये वोट भाजपा के खाते में जा रहा था। इस मामले में 18 अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। हालांकि इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद भी चुनाव नतीजों को सही ठहराया गया और वोट ईवीएम से ही पड़ा। इसके अलावा यूपी के विधानसभा चुनावों के दौरान भी एक ऐसे ही मामले का वीड़ियो वायरल हो गया था जिसमें एक युवक एक पार्टी को वोट डालता है तो वह भाजपा के खाते में चला जाता है। वह युवक उस बटन को दो घण्टे तक दबाये रहा ताकि इसकी वीडियोग्राफी हो और सबूत बन सके और साथ ही उच्च अधिकारियों को बुलाकर उनके सामने साक्ष्य पेश किये जा सकें। बाद में उक्त मामले में क्या निर्णय हुआ पता नही चल सका।

अभी जैसा माहौल है उससे ईवीएम की विश्वसनीयता पूरी तरह दांव पर लगी है और ऐसे में कोई भी तकनीक और कोई भी प्रयोग कर लिया जाये यह विश्वसनीयता बहाल होना मुश्किल होगा। लोकतंत्र में आप सवालों को रोक नही सकते और सवालों को आंख मूंदकर उन्हें खारिज भी नही कर सकते हैं। इससे लोगों का लोकतंत्र से विश्वास खत्म हो जायेगा और लोकतंत्र का वजूद खतरे में पड़ जायेगा। सवाल, विश्वास और लोकतंत्र में एक अन्तर्निहित रिश्ता है। कई पार्टियों की मांग है कि पेपर बैलेट की वापसी हो।

हालांकि भाजपा इसे प्रौद्योगिकी का विरोध बताकर विपक्ष पर हमला कर रही है। ठीक भी है सीता को ट्यूब बेबी बताने वाले, महाभारत काल में इंटरनेट होने का दावा करने वाले और गणेश को मानव सर्जरी का अद्भुत नमूना बताने वाले नेताओं की पार्टी को ईवीएम प्रौद्योगिकी और ईवीएम के विज्ञानी चमत्कार के लिए अड़ना ही चाहिए। वैसे राजनाथ सिंह ने भी कह ही दिया है कि 2019 में वो लंबी छलांग लगायेंगे और अभी की हार तो उनके दो कदम पीछे हटने के कारण है। इससे साफ जाहिर होता है जनता तो आनी जानी है जनता का क्या। लंबी छलांग के लिए हारना तो पडता ही है। बाकी ईवीएम प्रौद्योगिकी जिंदाबाद। अभी इंतजार किजिए कि कोई भाजपा नेता आये और कहे कि ईवीएम तो हमारे प्राचीन लोकतंत्रों की देन है वैशाली में तो चुनाव ईवीएम से ही होते थे। बहरहाल, सीता, गणेश, महाभारत और इंटरनेट अपनी आस्थाओं को सही सिद्ध करने की लड़ाई है और आस्थाओं की इस लड़ाई में ईवीएम भी अब आस्था का विषय बन जाये तो कोई बड़ी बात नही।