मीड़िया के इस संकटकाल में आपको नही जाना था, राजकिशोर जी……………..

आईएनएन भारत

हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार/लेखक/संपादक राजकिशोर जी हमारे बीच नही रहे। यह मीड़िया का संकट काल है, ऐसे समय में जब मीड़िया की स्वतंत्रता और मीड़िया की भूमिका गंभीर सवालों के घेरे में है तो राजकिशोर जी का जाना संकट में आकस्मिक और स्तब्ध कर देने वाला आघात है। यह वो समय है जब राजकिशोर जी की लेखनी हिंदी मीड़िया और पूरे भारतीय मीड़िया के लिए गहरे अंधेरे में एक हल्की रोशनी की तरह थी आज हिंदी मीड़िया को राजकिशोर जी की सबसे अधिक जरूरत थी।

राजकिशोर जी के जाने पर ना केवल हिंदी मीड़िया वरन सोशल मीड़िया पर भी एक शोक की लहर सी दौड़ गई है। हिंदी पत्रकारिता और हिंदी साहित्य जगत के अनेकों जाने पहचाने नामों ने सोशल मीड़िया पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि दी है। आईएनएन भारत की तरफ राजकिशोर जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि के एक छोटे से प्रयास के रूप में हम हिंदी मीड़िया से जुड़े ऐसे ही कुछेक नामों की प्रतिक्रियाओं को यहां साभार प्रकाशित कर रहे हैं।
                                                                                  -संपादक, आईएनएन भारत

हिंदी के वरिष्ठ लेखक और पत्रकार राजकिशोर का 71 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्हें फेफड़ों में संक्रमण के कारण पिछले करीब 20 दिनों से सांस लेने में तकलीफ थी, जिसके बाद उन्हें एम्स के आईसीयू में भर्ती कराया गया था, जहां सोमवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली।

करीब दो महीने पहले ही उनके 40 वर्षीय बेटे विवेक का ब्रेन हैम्रेज से निधन हो गया था। करीबियों के मुताबिक बेटे की मौत का उन्हें गहरा सदमा लगा था। उनके परिवार में अब उनकी पत्नी और बेटी बची है।
पश्चिम बंगाल के कोलकाता में 2 जनवरी 1947 को जन्मे राजकिशोर अपने वैचारिक लेखन के लिए जाने जाते थे। ‘तुम्हारा सुख‘ और ‘सुनंदा की डायरी‘ जैसे उनके उपन्यास के अलावा ‘पाप के दिन‘ शीर्षक से उनकी कविता संग्रह काफी प्रसिद्ध रहा है। पत्रकारिता और साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें लोहिया पुरस्कार के अलावा हिंदी अकादमी की तरफ से साहित्यकार सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

ओम थानवी
राजकिशोरजी नहीं रहे। हिंदी पत्रकारिता में विचार की जगह आज और छीज गई। कुछ रोज पहले ही उन्होंने अपना प्रतिभावान इकलौता बेटा खोया था।
पिछले महीने जब मैं उनसे मिलने गया, वे पत्नी विमलाजी को ढाढ़स बँधा रहे थे। लेकिन लगता था खुद भीतर से कम विचलित न रहे होंगे। मेरे आग्रह पर राजस्थान पत्रिका के लिए वे कुछ सहयोग करने लगे थे। एक मेल में लिखा – ‘दुख को कब तक अपने ऊपर भारी पड़ने दिया जाये।‘ फिर जल्द दूसरी मेलः ‘तबीयत ठीक नहीं रहती। शरीर श्लथ और दिमाग अनुर्वर। फिर भी आप का दिया हुआ काम टाल नहीं सकता। आज हाथ लगा रहा हूँ।‘

लेकिन होना कुछ बुरा ही था। फेफड़ों में संक्रमण था। कैलाश अस्पताल होते एम्स ले जाना पड़ा। आइसीयू में देखा तो अचेत थे। कई दिन वैसे ही रहे। तड़के उनकी बहादुर बेटी ने बताया डॉक्टर कह रहे हैं कभी भी कुछ हो सकता है। कुछ घंटे या दो-तीन रोज … और दो घंटे बाद वे चले गए। फोन पर मुझसे कुछ कहते नहीं बना। परिवार पर दूसरा वज्रपात हुआ है। ईश्वर उन्हें इसे सहन कराए।
मेरा परिचय उनसे तबका था जब सत्तर के दशक में बीकानेर में शौकिया पत्रकारिता शुरू की थी। वे कलकत्ता में ‘रविवार‘ में थे। तार भेजकर मुझसे लिखवाते थे। फिर जब मैं राजस्थान पत्रिका समूह के साप्ताहिक ‘इतवारी पत्रिका‘ का काम देखने लगा, उन्होंने हमारे लिए नियमित रूप से ‘परत-दर-परत‘ स्तम्भ लिखा जो बरसों चला। ‘जनसत्ता’ के भी वे नियमित लेखक रहे।
गांधी और समाजवाद में उनकी गहरी आस्था थी।

उन्होंने ‘परिवर्तन’, ‘दूसरा शनिवार’, (ऑनलाइन) ‘हिंदी समय’ और हाल में नए ‘रविवार’ का सम्पादन किया। उनकी किताबें हैं – पत्रकारिता के पहलू, पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, एक अहिंदू का घोषणापत्र, जाति कौन तोड़ेगा, रोशनी इधर है, सोचो तो संभव है, स्त्री-पुरुषः कुछ पुनर्विचार, स्त्रीत्व का उत्सव, गांधी मेरे भीतर। समकालीन मुद्दों और समस्याओं पर उन्होंने ‘आज के प्रश्न’ शृंखला में कोई पच्चीस किताबों का सम्पादन भी किया।
राजकिशोर जी ही नहीं गए, उनके साथ हमारा काफी कुछ चला गया है। जो लिखा हुआ छोड़ गए हैं, उसकी कीमत अब ज्यादा समझ आती है।

दिलीप सी मंडल
अलविदा राजकिशोर।

मेरे प्रिय दोस्त और हमारे दौर के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे संपादक-लेखक-पत्रकार को नमन। आज उनकी मृत्यु हो गई।

राम मंदिर और मंडल कमीशन के दौर में देश के संपादकों में सिर्फ एसपी सिंह और राजकिशोर ही संतुलन रख पाए थे।

उनका आखिरी काम बाबा साहेब की किताब श्एनिहिलेशन ऑफ कास्टश् का सरल हिंदी में अविकल अनुवाद है। इसे लेकर वे काफी उत्साहित थे। हरिजन से दलित किताब का उन्होंने संपादन किया था। उनकी दर्जनों किताबें हैं।

उन्होंने अथाह लिखा है। लेखन में उनकी बराबरी का इस समय कोई नहीं था।
लोहिया से उन्होंने विचार यात्रा की शुरुआत की और लोहिया को साथ लेकर सही ठिकाने यानी आंबेडकर तक पहुंचे।

25 साल की उम्र में मैं राष्ट्रीय स्तर पर इसलिए छपने लगा क्योंकि राजकिशोर ने मेरे कम उम्र को कम ज्ञान का समानार्थी नहीं माना।
देश के लगभग हर संपादक ने मुझे छापा, लेकिन मेरे लेखन को सिर्फ राजकिशोर ही सुधारते थे।
इस मायने में यह मेरे शिक्षक का भी न रहना है।

स्मृति में बने रहेंगे राजकिशोर जी।

प्रियदर्शन
वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर नहीं रहे। आज सुबह एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। सवा महीने पहले उन्होंने बेटे को खोया था। शायद यह शोक उनके फेफड़ों का संक्रमण बन गया।
जिन लोगों ने उन्हें पढ़ा है, वही ठीक से समझ सकते हैं, हमने क्या खोया है। सतर्क, संतुलित और सुघड़ गद्य क्या होता है, यह हमने उनसे सीखा। उनके जाने का शोक मेरे लिए इतना निजी है कि कुछ भी कहना तत्काल संभव नहीं है।

जयशंकर गुप्ता
अभी अभी एक अत्यंत दुखद और अंदर से हिला देनेवाली सूचना मिली है। समाजवादी सोच के वरिष्ठ पत्रकार-संपादक राजकिशोर जी का निधन हो गया। पिछले कुछ दिनों से यहां एम्स के आईसीयू में उनका इलाज चल रहा था। मष्तिकाघात के साथ ही उन्हें निमोनिया भी हो गया था।

अभी कुछ ही दिनों पहले उनके युवा पत्रकार पुत्र विवेकराज का असामयिक निधन हो गया था। राजकिशोर जी और हम सब उस दुख से उबर ही रहे थे कि राजकिशोर जी भी हम सबको छोड़कर पुत्र विवेक का अनुसरण करते हुए अनंत की यात्रा पर चले गए। उनके निधन से भारतीय हिंदी पत्रकारिता और खासतौर से समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष धारा की पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति हुई है।

राजकिशोर जी के साथ हमारे संबंध सरोकार 1977-78 में रविवार के प्रकाशन के समय से ही बन गए थे लेकिन 1982 हम जब कोलकाता में रविवार की संपादकीय टीम के साथ स्वयं भी जुड़ गए तो हमारे संबंध और भी प्रगाढ़ होते गए। रविवार के साथ ही नवभारतटाइम्स टाइम्स में भी हम लोग कुछ समय एक साथ काम किए।

यह कितना दुखद है कि रविवार के संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह, उदयन शर्मा और योगेंद्र कुमार लल्ला जी के बाद अब राजकिशोर जी भी नहीं रहे। पिछले दिनों, उनके बीमार पड़ने से पहले हम और गीता उनके निवास पर गए थे। काफी देर तक सम सामयिक राजनीति, पत्रकारिता और फिर अतीत के झरोखों को साफ करते हुए रविवार, नवभारत टाइम्स, एसपी सिंह, उदयन, राजेंद्र माथुर जी के बारे में बातें होती रहीं। उनका ह्यूमर भी पूर्ववत सामने था। सोशल मीडिया पर उनकी चुटीली टिप्पड़ियां भी पूर्ववत जारी थीं।
कतई नहीं लगा कि वह इतनी जल्दी हम सबको अलविदा कहनेवाले हैं लेकिन नियति को शायद यही मंजूर था। उनके परिवार, खासतौर से पत्नी, विमला भाभी, पुत्री गुड़िया, बहू और उसके बच्चों पर तो दुखों का पहाड़ सा टूट पड़ा है। असह्य दुख और शोक की घड़ी में हमारी सहानुभूति और संवेनाएं उनके साथ हैं। ईश्वर राजकिशोर जी की आत्मा को शांति और विमला भाभी, गुड़िया और बहू-बच्चों को इस दुख को भी बर्दाश्त करने का साहस और धैर्य प्रदान करे।

राजकिशोर जी को अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि और उनसे जुड़ी स्मृतियों को प्रणाम!

अरूण त्रिपाठी
राजकिशोर जी नहीं रहे। आज सुबह 9.30 बजे उन्होंने दिल्ली के एम्स में आखिरी सांस ली। उन्होंने हिंदी समाज को दिया बहुत ज्यादा लिया बहुत कम। मेरे जैसे पत्रकारों को लेखक बनाने में उनका बड़ा योगदान है। हिंदी समाज और मेरे जैसे लेखक पत्रकार सदा उनके ऋणी रहेंगे।

मदन कश्यप
राजकिशोर जी नहीं रहे। यह केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, हिंदी पत्रकारिता के सबसे तेजस्वी ज्योति-पुंज का बुझ जाना है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

अफलातून अफलू
वरिष्ठ समाजवादी चिंतक, लेखक तथा पत्रकार राजकिशोर जी नहीं रहे। उनकी स्मृति को सादर नमन। समाजवादी जन परिषद अपने वरिष्ठ साथी को श्रद्धांजलि अर्पित करती है।
अफलातून, महामंत्री, सजप

उमाशंकर सिंह
राजकिशोर जी से मामूली, चलताऊ लेकिन दिखने पर रूक कर दो मिनट बात करने वाली पहचान थी। वैसे तो दिल्ली में कौन किसका पड़ोसी होता है पर फिर भी दिल्ली में मयूर विहार फेज वन में मेरे पड़ोसी थे। वे एक साथ बहुत जहीन और खिलंदड़ इंसान और लेखक थे। निजी बात व्यवहार में पॉलटिकल करेक्ट होने की चिंता से भी दूर रहते थे। छोटे मोटे समझौते भी उनने बहुत किए। पर हिंदी समाज के बेसिक सवालों को उन्होंने विस्तार से संबोधित किया था। भाषा पर उनकी बेजोड़ पकड़ थी। एक वक्त वह राष्ट्रीय सहारा और जनसत्ता में लगातार लिखा करते थे। यह हमारी पीढ़ी का शैशव काल था और हमने उनसे जाने अनजाने हिंदी लिखना भी सीखा। उनके लिखने की खासियत यह थी कि उनके लिखे में असहमत को सहमत कर लेने का जोर भी था और नुकीले वाक्यों से चिढ़ाने का माद्दा भी। आज सुबह वे नहीं रहे। विदा राजकिशोर जी। हालांकि अभी आपकी बहुत जरूरत थी हिंदुस्तानी समाज को।

अरूण देव
राजकिशोर जैसे सुलझे, सटीक और निर्भीक पत्रकार/लेखक/संपादक हिंदी में इस समय बहुत कम हैं। ऐसे समय में उनका जाना दिल तोड़ गया।

वीरेन्द्र यादव
राजकिशोर जी का असमय न रहना हिंदी की विचार पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि।

अरूण महेश्वरी
बड़ी बुरी खबर है। हिंदी के जाने-माने श्रेष्ठ पत्रकार श्री राजकिशोर नहीं रहे। आंतरिक श्रद्धा के साथ उन्हें अंतिम विदाई।

तारेन्द्र किशोर
सदमे में हूँ. वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर जी नहीं रहे। अभी कोई डेढ़ महीने पहले ही उनके बेटे विवेक का निधन हो गया था। बीबीसी के दफ्तर में विवेक से भी मुलाकात होती रहती थी। रविवार डाइजेस्ट के लिए राजकिशोर जी ने मुझे कन्हैया के इंटरव्यू के लिए कहा था। उस वक्त उन्होंने एक आशंका व्यक्त की थी। वो राजनीति, समाज और व्यक्ति के मनोविज्ञान की कितनी गहरी समझ रखते थे वो उस वक्त मुझे थोड़ा समझ में आया था। बाद में ज्यादा समझ में आया। खैर अप्रैल 2016 के अंक में ये इंटरव्यू आया था। इंटरव्यू से वो बहुत खुश हुए थे।

इसके बाद उन्होंने कई बार मुझे रविवार डाइजेस्ट के लिए लिखने को कहा लेकिन मैं कभी लिख नहीं पाया। उसी वक्त राहिला को उन्होंने रविवार डाइजेस्ट में मुस्लिम जगत कॉलम के लिए लिखने का ऑफर दिया था। राहिला ने ये जिम्मेवारी पूरी शिद्दत से निभाई भी थी। राजकिशोर जी की तमाम विशेषताओं में से एक विशेषता ने मुझे निजी तौर पर बहुत प्रभावित किया था। ये एक ऐसी बात थी जो अच्छे-अच्छे बुद्धिजीवियो में नहीं पाई जाती है। जब राहिला ने रविवार के लिए लिखना शुरू किया तब उसके बाद से उन्होंने रविवार की दो प्रति भेजनी शुरू कर दी थी। मतलब उन्होंने एक स्त्री के व्यक्तित्व को भी जिस तरह से उसके साथी के व्यक्तित्व से अलग कर के देखा, यह एक काबिले तारीफ बात थी। उनसे गाहे-बगाहे फोन पर बातचीत हो जाती थी। लेकिन उनके बेटे की मौत के बाद इन डेढ़ महीनों में मेरी कभी हिम्मत नहीं हो पाई थी उनसे बात करने की, सोचता था कि जाकर मिलूंगा। लेकिन अब ये भी कभी पूरा नहीं हो पाएगा। वो कई जगहों पर संपादक रहे। रविवार डाइजेस्ट के बाद वो हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की ई-पत्रिका हिंदीसमय डॉटकॉम के संपादक बनाए गए थे। मेरी पीढ़ी और मेरे आसपास की पीढ़ी उन्हें बचपन से हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ कर बड़ी हुई है।

बचपन में पिता जी संपादकीय लेख पढ़ने की सलाह दिया करते थे। तभी मेरा परिचय राजकिशोर जी की लेखनी से हुआ था। हिंदी के तमाम अखबारों के संपादकीय पेज पर वो छपते थे। जब दिल्ली आकर उनसे बात हुई और परिचय हुआ तब मुझे अंदर ही अंदर बहुत फक्र हुआ था कि जिन लोगों को मैं स्कूल के दौरान छात्र जीवन से पढ़ता आया हूँ। आज मुझे वो इस काबिल समझ रहे हैं कि मुझे कुछ लिखने को कह रहे हैं और उनकी संपादकीय में छप रहा हूँ। वो कलकत्ता से निकलने वाले मशहूर पत्रिका रविवार में भी एसपी सिंह और उदयन शर्मा के साथ काम कर चुके थे। उन दोनों के जाने के बाद अब राजकिशोर भी चले गए। फेसबुक पर भी वो किसी युवा की तरह सक्रिय थे। बेटे की मौत के बाद उन्होंने फेसबुक पर एक शोक-संदेश लिखा था। ऊपर से वो मानसिक तौर पर मजबूत दिख रहे थे लेकिन शायद उन्हें बेटे का गम खाए जा रहा था। विनम्र श्रद्धांजलि राजकिशोर जी. आप बहुत याद आएंगे।