दस दिनों तक खिंचा ‘‘गांव बंद‘‘ किसान आंदोलन तो हो सकता है शहरी जीवन अस्त-व्यस्त

आईएनएन भारत डेस्क

भाजपा की मुसीबतें थमने का नाम नही ले रही हैं। हाल ही में कर्नाटक में सरकार बनाने को लेकर पार्टी की हुई फजीहत, रूकी भी नही थी कि 10 विधानसभा और 4 लोकसभा उप चुनावों में भाजपा की करारी हार ने उसे बौखलाकर रख दिया था। चुनावी शिकस्त के बाद अब भाजपा को देश के किसान गांवों में शिकस्त देने के लिए सड़कों पर उतर आये हैं।

राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल समेत देश के लगभग दर्जनभर राज्यों में किसानों ने 10 दिन का गांव बंद अभियान शुरू कर दिया है। यह अभियान 1 जून से शुरू होकर 10 जून तक अर्थात दस दिनों तक चलेगा। इस अभियान में 9 दिनों तक गांव बंद रहेंगे और दसवें दिन यानि 10 जून को भारत बंद का आहवान किया गया है।

इस किसान आंदोलन का नाम जरूर गांव बंद है लेकिन इससे सबसे ज्यादा शहर और शहर के लोग सहमें हुए हैं। यदि इस आंदोलन के नेताओं से बातचीत करके सरकार ने कोई हल नही निकाला और आंदोलन दस दिन तक चला तो निश्चित रूप से शहरों की जिंदगी अस्त-व्यस्त हो सकती है। शहरों में रोजना के इस्तेमाल की साग सब्जियों और दूध जैसी अनिवार्य चीजों की किल्लत खड़ी हो सकती है।

किसान कल्याण मजदूर महासंघ अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा ने दावा किया है कि इस आंदोलन में देश भर के 130 किसान संगठन शामिल हैं। इन संगठनों से जुड़े किसानों ने तय किया है कि मांगों पर सरकार का ध्यान खींचने के लिए 1 से 10 जून तक अपनी किसी भी उपज को वे शहरों में नहीं भेजेंगे। यानी गांवों में जो भी फल, सब्जी, दूध, अनाज पैदा होंगे, उन्हें वे शहर वालों को नहीं बेचेंगे। न ही शहर की दुकानों से ही किसान कुछ खरीदेंगे। यह दो तरफा बंदी की घोषणा है जिसका शर्तिया शहर की जिंदगी पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इस तरह शहर में रहने वाली बड़ी जनसंख्या के सामने रोजमर्रा की चीजों की किल्लत खड़ी हो सकती है।

किसान संगठनों की मुख्य मांगें कर्जमाफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना है। अरसे से लाल फीताशाही में उलझी इन सिफारिशों के मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य फसल की लागत का डेढ़ गुणा होना चाहिए। इसके अलावा एक अन्य महत्वपूर्ण मांग 60 वर्ष से ऊपर के किसानों के लिए 5 हजार महीने की पेंशन को लागू किये जाने की भी है।

मौजूदा सरकारों ने किसानों के हित में काफी कुछ करने के दावे किये हैं। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, कृषि बीमा योजना, सॉइल हेल्थ कार्ड, कृषि कौशल जैसी योजनाएं आगे बढ़ाई गईं। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का भी ऐलान किया गया। लेकिन वास्तविकता ये है कि धरातल पर इन योजनाओं या घोषणाओं का कोई फायदा भूमिपुत्रों को नहीं मिल पाया है।

Suraj Govind, 9, son of a farmer who according to a media release has committed suicide in western state of Maharashtra, poses for a picture during a protest organized by various farmers’ organizations demanding complete debt waiver and good rates for their crops, in New Delhi, India July 19, 2017. The cap reads “My father has committed suicide”. REUTERS/Adnan Abidi – RC1144B44600

उदाहरण के लिए राजस्थान में अपने खाते से कृषि बीमा योजना का प्रीमियम कटवा चुके कुछ किसानों ने जब फसल खराब होने पर मुआवजे के लिए आवेदन किया तो उन्हें मना कर दिया गया। बीमा कंपनी ने कहा कि उनके नाम कोई पालिसी नहीं है। जांच हुई तो पता चला कि बैंक ने बीमा कंपनी को प्रीमियम जमा ही नहीं करवाया। मामला खुल गया तो सॉफ्टवेयर की गलती बता दी गई, नहीं खुलता तो शायद बैंक अपना कुछ एनपीए किसानों के प्रीमियम से कम कर लेता?

राजस्थान में गांव बंद आंदोलन का सबसे ज्यादा असर जयपुर, सीकर, झुंझुनूं, नागौर, बीकानेर, हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर के कृषि समृद्ध जिलों में देखने को मिला। जयपुर सरस डेयरी में रोजाना 11 लाख लीटर दूध पहुंचता है लेकिन आंदोलन के पहले दिन 2 लाख लीटर दूध कम पहुंचा। किसानों ने या तो दूध इकट्ठा ही नहीं होने दिया या फिर टैंकरों को रोककर सड़क पर फैला दिया। सब्जियों को भी शहरी मंडियों में भेजने के बजाय सड़कों पर या जानवरों के सामने फेंका जा रहा है। श्रीगंगानगर में किसानों और व्यापारियों के बीच संघर्ष के हालात भी बन गए। यहां कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करना पड़ा। यह तय है कि यह किसान आंदोलन यदि दस दिनों तक खिंच गया तो शहरी जिंदगी पर भारी असर पड़ेगा परंतु इस भारी संकट के बावजूद भी अभी तक सरकार की तरफ से किसानों के साथ बातचीत को लेकर कोई पहल नही की गई है। लगता है कि मौजूदा मोदी सरकार को ना गांव के किसानों की चिंता है और ना ही शहर के आम आदमी की फिक्र है।