शिवपाल सिंह यादव के साथ धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव और बाबरी मस्जिद विध्वंस तक बेबाक बातचीत, भाग -1

आईएनएन भारत

(सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक फ्रैंक हुजूर के साथ समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव की जिंदगी का अब तक का सबसे लंबा साक्षात्कार (इंटरव्यू ) इनकी जिंदगी के कुछ अनछुए पहलुओं को जानने के लिए पढ़े पूरा इंटरव्यू…..)

अपने संगठनात्मक कौशल से समाजवादी पार्टी की नीव को अटूट मजबूती देने वाले शिवपाल सिंह यादव (उम्र, 63) को 1996 में पहली बार जसवंत नगर की जनता ने अपना प्रतिनीधि चुनकर विधान सभा में भेजा। इसी जसवंत नगर विधान सभा से नेता जी ने अपने राजनैतिक सफर की शुरुवात की थी, फिर केंद्र की राजनीति में दस्तक देने के बाद प्रदेश की राजनीति को बतौर उत्तराधिकारी जसवंत नगर की सीट से शिवपाल के राजनैतिक सफर की शुरुआत करायी। जिस तरह से भारतीय राजनीति मुलायम सिंह यादव को नेताजी और अखिलेश यादव को भईया जी के नाम से जानती है उसी तरह शिवपाल सिंह यादव को चाचा जी के नाम से जाना जाता है।

देश के समाजवादियो की कतार में खांटी समाजवादी की पहचान को बनाये हुए जनहित के मुद्दों को लेकर कभी कलेक्ट्रेट तो कभी ब्लॉक पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले रहते थे।

फ्रैंक हुजूरः मेरा पहला सवाल है कि सैफई, जिस गाँव में आपका जन्म हुआ है, आज भारत में जब भी समाजवाद की बात होती है तो उसे सैफई से भी जोड़कर देखा जाता है। आपने नेताजी में पहली बार राजनीति को कब महसूस किया? और पहली बार आपमें राजनीति करने की इच्छा कब जगी?

शिवपाल सिंह यादवः देखिये! पहले तो आपने सैफई का जिक्र किया तो सैफई एक छोटा सा गाँव है जो अब बड़ा हो गया है वहाँ बहुत सी सुविधायें हो गई हैं जैसे रोड की सुविधा हो गई, तहसील की सुविधा हो गई अस्पताल की सुविधा हो गई है। लेकिन पहले तो एक छोटा सा गाँव ही था। हम लोग वही पैदा हुए, वही पढ़ाई किये। प्राइमरी स्कूल में पढ़े हैं, उस समय प्राइमरी स्कूल में सिर्फ एक कमरा हुआ करता था, उसी एक कमरे में एक से लेकर पाँचवी क्लास तक की पढ़ाई होती थी।

वही से शुरूआती पढ़ाई लिखाई शुरू हुई थी फिर कक्षा पाँच पास करने के बाद छठी कक्षा में हमारा एडमिशन जैन इंटर कॉलेज करहैल में हुआ, जहाँ नेताजी लेक्चरर थे, तो छठी से लेकर बारहवाँ तक वही पढ़े, गाँव से स्कूल तक पैदल जाते थे तब तो साइकल भी नही थी।

हमारे गाँव के सभी बच्चे स्कूल तक पैदल ही जाते थे। नेताजी पढ़ाने के लिये साइकल से जाते थे। तब तो वैसा कोई रास्ता भी नही था स्कूल तक जाने के लिये, बारिश के समय पर तो हम लोग खेतों की मेड़ों से होकर जाते थे। वहाँ एक बम्मबा नहर था जिस में पानी भरा रहता था तो स्कूल तक जाने में दिक्कतें होती थी।

नेताजी 1967 में जब पहला चुनाव लड़े थे तब हम बारह-तेरह साल के बच्चे थे तो ज्यादा कुछ पता नही था। नेताजी पहला चुनाव जीतकर सदन में पँहुचे। हम लोग बचपन में नेताजी के चुनाव प्रचार के लिए गाँव गाँव जाकर पोस्टर लगाते थे, उनके लिए नारे लगते थे।

फ्रैंक हुजूरः जब पहला चुनाव नेताजी लड़े तो उनके चुनाव प्रचार में आपकी क्या भागीदारी थी?

शिवपाल सिंह यादवः हम लोग उस समय बच्चे ही थे तो क्या चुनाव प्रचार करते, जहाँ तक मुझे याद है कि सत्तर के बाद जब हम हाई स्कूल में पहुँच गये थे तो उसके बाद जो भी चुनाव आता था हम लोग नारे लगाते थे। जब भी किसी समाजवादी की गाड़ी आती थी तो हम नारे लगाते थे और किसी दूसरी पार्टी की गाड़ी आती थी तो उसका विरोध करते थे। गाँव गाँव पोस्टर लगाते थे। ये सारे काम आज भी चलते हैं, हम जब भी गाँव जाते हैं छोटे छोटे बच्चे नारे लगाने लगते हैं।

फ्रैंक हुजूरः 1971 के उस दौर में पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध भी हुआ था, उस समय नौजवानों में, गाँव के लोगों में किस तरह का माहौल हुआ करता था? उस दौर की कोई बात जो आपके जेहन में हो?

शिवपाल सिंह यादवः देखिये! 1971 में तो हमारे गाँव से कई लोग सेना में भर्ती हो गये थे। जब युद्ध हुआ तो हमारे सबसे बडे भाई रतन सिंह भी जाकर सेना में भर्ती हो गये थे। हमारे पड़ोस के रामशरण यादव भी सेना में भर्ती हो गये थे और नेताजी के जो बार्बर थे राममूर्ती वो भी भर्ती हो गये थे। एक ड्राइवर हुआ करते थे बेंचे वो भी भर्ती हो गये थे, तो उस समय जब भर्ती हो रही थी तो ये सब लोग जाकर सेना में शामिल हो गये थे। उस समय का इतना ही याद है। ये लोग छूट्टी लेकर गाँव आते थे।

फ्रैंक हुजूरः जब ये लोग सेना से लौट कर गाँव आते थे तो क्या बताते थे?

शिवपाल सिंह यादवः वही सब बातें बताते थे कि चाइना से कैसे युद्ध लड़े, पाकिस्तान से कैसे युद्ध लडे। सीमा पर की कहानियाँ सुनाते थे।

फ्रैंक हुजूरः उन लोगो की बातें सुनकर कभी ऐसा लगा कि हमें भी सेना में जाना चाहिये? या फिर सियासत मे आने की वजह सिर्फ नेताजी बने?

शिवपाल सिंह यादवः देखिये! जब नेताजी चुनाव लड़ने लगे तो हम सब उनके लिये काम करते थे, उस समय पर्चियाँ काटी जाती थी। चुनाव के एक महीने पहले से पर्चियाँ काँटना शुरू कर देते थे। वोटर लिस्ट लेकर के हम लोग पर्चियाँ तैयार करते थे और चालिस-पचास लोग मिलकर के साइकल से गाँव गाँव प्रचार करने जाते थे, पोस्टर लगाते थे, नारे लगाते थे। तो यही सब काम चलता था। ये तो हम लोगों ने 1972 में शुरू कर दिया था। 1974 में फिर से नेताजी विधायक बन गये थे और 1975 में एमरजेंसी लग गई थी। जब एमरजेंसी लगी तो हम के. के. डिग्री कॉलेज, इटावा में पढ़ते थे। जहाँ हम लोग रहते थे वहां कभी कभी नेताजी भी वही आजाते थे। नेताजी जब भी लखनऊ से लौटते थे तो हम लोगों के पास इटावा में रूक जाते थे। हम लोग एक ही मकान में रहते थे।

जब एमरजेंसी लगी तो हम वहीं इटावा में थे, नेताजी भी थे। हमारे पास एक फिलिप्स का ट्रांजिस्टर था उस पर सुना था कि एमरजेंसी घोषित हो गई है। पुलिस घूमने लगी मोहल्ले में, तब तो शायद लोकदल हुआ करता था या जनसंघ पार्टी हुआ करता था, इनके लोगों की गिर फ्तारियाँ शुरू हो चुकी थी ट्रांजिस्टर पर हम लोग सुनते थे। तब तो हमें एमरजेंसी का मतलब भी नही पता था, हमारे पड़ोस में एक कांग्रेस के नेता थे रामाधिन शर्मा, उनका हमारे यहाँउठना बैठना होता था तब हमने उनसे बात की, उनसे पूछा कि एमरजेंसी का मतलब क्या है? तब उन्होंने बताया कि एमरजेंसी लग चुकी है गिरफ्तारियाँ शुरू है।

उस समय हमारे घर पर भी पुलिस आती थी। पुलिस वाले पुछते थे कि विधायकजी कहाँ हैं, उस समय नेताजी को विधायक जी कहा जाता था। तब तक तो हम लोगांे को पता चल ही चुका था कि गिरफ्तारियाँ शुरू हो चुकी है। उस समय नेताजी भर्तना की ओर किसी शादी में गये हुए थे, तो हम लोगां ने पुलिस को उसके उल्टी तरफ सिकोहाबाद की ओर बता दिया कि नेताजी उधर गये हैं। तो नेताजी जब रात में लौटे तो हम लोगो ने घर में बाहर से ताला लगा दिया और पुलिस आई तो उसको बता दिये कि घर पर कोई है ही नही, फिर सबेरे चार बजे नेताजी को मोटरसाइकिल से गाँव तक छोड ़आये।

उस समय एक नेता हुआ करते थे रामसेवक जो अभी भी हैं, वो किसी की मोटरसाइकिल लेकर आये और नेताजी को सुबह चार बजे गाँव छोड आये। तब उस समय नेताजी की गिरफ्तारी नही हो पाई। उसके बाद नेताजी गाँव गाँव जाते रहे लोगों से मिलते रहे, एक महीने के बाद नेताजी की गिरफ्तारी हुई। नेताजी 18-19 महीने तक जेल में रहे।
जब नेताजी एमरजेंसी के समय जेल में बंद थे तो मैं हर रोज उनसे मिलने जेल में जाता था।

फ्रैंक हुजूरः क्या आप नेताजी से मिलने जेल में जाते थे?

शिवपाल सिंह यादवः हाँ, एक दिन में दो बार तो अनिवार्य रूप् से रोज मिलने जाते थे। नेताजी को जिस भी सामान की जरूरत पड़ती थी हम पहुँचा आते थे। उस समय के एक जेलर थे वाजपेयीजी जिनसे हमारी दोस्ती भी हो गई थी। जब कभी जेल में नेताजी से मुलाकात नही हो पाती थी तो जेलर साहब को ही सामान दे आया करते थे।

फ्रैंक हुजूरः जब आप नेताजी से जेल में मुलाकात करके वापस गाँव, घर, परिवार के बीच लोटते थे तो लोग क्या पूछते थे?

शिवपाल सिंह यादवः अरे! उस एमरजेंसी के समय तो हम लोग लड़के ही थे। जब हम लोग जेल के गेट तक पहुँचते थे तो पुलिस खदेड़ती थी, हम लोग भाग जाते थे। एमरजेंसी लगने के एक-दो महिने तक तो पुलिस का आतंक था। लेकिन हम लोगों को क्या ही फर्क पड़ता था, पुलिस खदेड़ती थी हम लोग भाग जाते थे। जेल के पास में ही स्टेशन था तो उधर की भाग जाते थे। और जब भी कभी नेताजी से मुलाकात होती तो नेताजी जो भी पत्र लिखकर देते थे उसे गाँव तक हम लोग पहुँचा आते थे। फिर हम लोग चुनाव की तैयारी भी करते थे, तो वहीं से हमारी राजनीति शुरू हो गई थी, एमरजेंसी के बाद।

फ्रैंक हुजूरः एक नेता के रूप में आपने पहला भाषण कब दिया था?

शिवपाल सिंह यादवः देखिये! हम लोग तो अपना काम करते रहे, उस समय केवल हम लोगांे का काम था कि नेताजी की मीटिंग बडे नेताओं से करायें जैसे जनेश्वर मिश्राजी थे, रामनारायण जी थे, अनंत जायसवाल जी थे।

ये सभी बडे समाजवादी नेता हुआ करते थे। इनकी जब मीटिंग होती थी तो हम लोग कराते थे। गाँव में छोटे छोटे पंचायत के स्तर पर इन नेताओं की मीटिंग कराते थे। फिर हम 1988 में जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन हो गये। मुझे याद है कि हरदोई में नेताजी की एक मीटिंग होनी थी, वहाँ मैने अपना पहला भाषण दिया था। हमारे यहाँ समाजवादी पार्टी के जिले के महासचिव गयाप्रसाद वर्माजी थे जो तीन बार विधायक बने थे तो उनके साथ कई मीटिंग हमने अटेंड की फिर तो धीरे धीरे एक महराज सिंह हुआ करते थे पार्टी के अध्यक्ष, वो भी पाँच बार भर्तना से विधायक बने। कोऑपरेटिव मूवमेंट से इसकी शुरूआत हुई।

जब उत्तर प्रदेश को पहली बार कोई पिछड़ा मुख्यमंत्री मिला तो गाँव गाँव लोगांे में बहुत उत्साह था।

फ्रैंक हुजूरः उस दौर में कांग्रेस की जो राजनीति थी, जो भी उस पार्टी के मुख्यमंत्री पद के नेता बनते थे वो भी ज्यादातर सवर्ण समाज के होते थे। जिस तरह से आज भाजपा पर सवर्ण परस्ती का आरोप लगता है वैसे ही उस समय कांग्रेस पर भी लगता था तो उस समय जब पहली बार रामनरेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनते हैं और वो उस समय पिछड़े के प्रतिनिधित्व/अधिकार की बात करते हैं जिसके चलते गाली भी खाते हैं। क्या उस समय समाज में किसी तरह का विरोधाभास पैदा हुआ था? जिस तरह से मंडल कमीशन के बाद हुआ था।

शिवपाल सिंह यादवः देखिये! एमरजेंसी के बाद जब सरकार बनी, सबकी मिली जुली जनता पार्टी बनी। सभी लोग कांग्रेस के विरोध में हो गये थे। और यहाँ मुख्यमंत्री रामनरेश यादव बने उनके बाद बनारसी दास भी मुख्यमंत्री बने। जब रामनरेश यादव मुख्यमंत्री बने तो पिछड़ांे में खुशी का माहौल था। पहली बार जब कोई यादव मुख्यमंत्री बना तो गाँव गाँव लोगों बहुत उत्साह था क्योंकि इसके पहले तो केवल सवर्ण ही मुख्यमंत्री बनते थे। नेताजी पढ़ाई लिखाई में भी गुरू रहे, पॉलिटिक्स में भी गुरू रहे और परिवार के गार्जियन भी रहे।

फ्रैंक हुजूरः जब नेताजी पहली बार कोऑपरेटिव मिनिस्टर बने थे तब लखनऊ से आपका जुड़ाव ज्यादा हो गया रहा होगा?

शिवपाल सिंह यादवः उस समय भी हम पढाई ही कर रहे थे। एमरजेंसी के पहले ही हमने बीए कर लिया था, उसके बाद एमए किया फिर 1978 में लखनऊ के क्रिश्चियन कॉलेज से ही बीपीएड किया तब नेताजी कोऑपरेटिव मिनिस्टर थे। पहले नेताजी 16, गौतम पल्ली में रहते थे हम भी उनके साथ ही रहे और विक्रमादित्य में जब नेताजी रहे तब भी हम कुछ दिनों तक उनके साथ ही रहे। इसके बाद ही हम राजनीति में सक्रिय हो गये थे।

फ्रैंक हुजूरः आप पर नेताजी की राजनीति का असर लगातार हो रहा था तो क्या आप कह सकते हैं कि नेताजी आपके राजनैतिक गुरू हैं?

शिवपाल सिंह यादवः हाँ, नेताजी के साथ ही हमेशा काम किया है और हमारे जिले के जो गया प्रसाद वर्माजी थे, महराज सिंह जी थे इनके साथ भी काम किया है।

फ्रैंक हुजूरः कहते हैं कि गोपाल कृष्ण गोखले, गांधीजी के भी गुरू थे, कुछ लोग क हते हैं कि वो जिन्ना के भी गुरू थे तो उसी तरह आपका राजनैतिक गुरू किसे कहा जाय?

शिवपाल सिंह यादवः तब तो नेताजी को ही कहा जायेगा। नेताजी ने पढ़ाया भी है, मेरा विषय पॉलिटिकल साइंस भी था। पहला पीरियड नेताजी का ही लगता था वही पढ़ाते थे। तो नेताजी पढ़ाई लिखाई में भी गुरू रहे, पॉलिटिक्स में भी गुरू रहे और परिवार के गार्जियन भी रहे। अखिलेश (टीपू) हमारे साथ ही रहते थे। .

फ्रैंक हुजूरः उसी समय में अखिलेशजी का जन्म होता है और नेताजी पिता भी बन जाते हैं, तो उस दिन के बारे में कुछ बतायेंगे?

शिवपाल सिंह यादवः हाँ, उस समय तो मैं गाँव में ही था, जिस दिन इनका जन्म हुआ 1972 में लोगांे ने खुशी जाहिर की थी। जिसको हम लोग बड़ी माँ बोलते थे, जो प्रोफेसर की माँ थी उन्होंने सबसे पहले आकर हमें बताया सुबह सुबह जब अखिलेश जी का जन्म हुआ। फिर खुशी का माहौल था।

फ्रैंक हुजूरः अखिलेश जी ने अपना ज्यादातर समय आपके परिवार के साथ बिताया, मिलेट्री स्कूल से लेकर हर जगह आप गार्जियन के रूप् में मौजूद रहे। क्या आपने उस समय कभी ऐसा महसूस किया कि ये लड़का आगे चलकर राजनीति में जायेगा?

शिवपाल सिंह यादवः देखिये! शुरूआत में जब नेताजी कोऑपरेटिव मिनिस्टर थे तब ये बहुत थे चार साल के रहे होंगे। तब मेरे साथ ही गाँव से लखनऊ आकर के पंद्रह दिन तक रहे थे, तब तक उनका एडमिशन नही हुआ था। उसके बाद ही उनका एडमिशन इटावा सेंट मैरी में कराया गया था। सेंट मैरी स्कूल से चैथी क्लास पास करने के बाद ही मिलिट्री स्कूल, धौलपुर में एडमिशन कराने मैं ही ले गया था।

फ्रैक हुजूरः अखिलेश के साथ कुछ ऐसी बातें या कोई यादगार पल जो आप साझा करना चाहें?

शिवपाल सिंह यादवः देखिये! जब हमारे साथ ही रहे तो यादगारे तो बहुतसी हैं, अब जो चाहे लिख लेना।

फ्रैंक हुजूरः बचपन में अखिलेश जी का व्यवहार कैसा था? जैसे सीधे थे, शरारती थे या शर्मीले थे?

शिवपाल सिंह यादवः देखिये! शर्मीले तो नही थे। खेल कुद में ज्यादा मन लगता था।

फ्रैंक हुजूरः किस खेल में इनका ज्यादा मन लगता था? कौन सा खेल खेलते थे?

शिवपाल सिंह यादवः देखिये! मोहल्ले में जहाँ हम लोग रहते थे किराये के मकान में, तो मोहल् ले के लड़के इकट्ठे हो जाते थे उनके साथ खेलते थे और जब बडे हुए तो क्रिकेट, फुटबॉल ज्यादा खेलते थे। फुटबॉल में उनका ज्यादा मन लगता था।

शेष भाग- 2 में जारी…………………….

(हिंदी अनुवादः रत्नेश यादव)