यूजीसी ने वापस लिया सौ प्रतिशत वाइवा का प्रावधानः बहुजनों के संघर्ष की कामयाबी

मुलायम सिंह
आज जब यूजीसी की तरफ से एमफिल/पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में 100 प्रतिशत वाइवा के प्रावधान को हटाने का निर्णय आया तो लेफ्ट और कट्टर दक्षिणपंथियों में श्रेय लेने की होड़ लग गई। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यूजीसी ने यह निर्णय इसलिए लिया है क्योंकि इस नियम के खिलाफ एससी/एसटी/ओबीसी तथा अन्य वंचित वर्गों के छात्र लगातार विरोध कर रहे थे। यह बात स्पष्ट की गई है कि इस यूजीसी गजट के विरोध में सबसे मुखर आवाज जेएनयू के बहुजन छात्रों की है। इसलिए यहाँ लेफ्ट और दक्षिणपंथियों के दोहरे चरित्र को देखने को देखने की जरूरत है।

आप सबको ज्ञात होगा कि वायवा में भेदभाव रोकने, हॉस्टल तथा प्रवेश के तीनों स्तर पर ओबीसी रिजर्वेशन लागू कराने, माइनॉरिटी डिप्राइवेशन पॉइंट लागू कराने के लिए यूनाइटेड ओबीसी फोरम पिछले दो सालों से लगातार संघर्ष कर रहा है। ओबीसी फोरम के प्रखर विरोध के कारण पहली बार जेएनयू के इतिहास में ओबीसी को हॉस्टल में आरक्षण दिया गया। वर्ना इसके पहले किसी को होश ही नहीं था कि ओबीसी को हॉस्टल एलॉटमेंट में आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। बस ओबीसी का वोट लेने का ख्याल सारे संगठनों को रहता है। सालों से ठगे जा रहे बहुजनों ने सामाजिक न्याय की यह लड़ाई मुखर रूप से 10 मई 2016 के एकेडमिक काउंसिल मीटिंग के बाहर अपने उग्र प्रदर्शन से शुरू किया जिसमें कुलपति को एसी मीटिंग बीच में स्थगित करनी पड़ी थी। उसके बाद 27 मई 2016 को पुनः एसी मीटिंग बुलाई गई जिसमें यूनाइटेड ओबीसी फोरम के लगातार दबाव के कारण प्रो. अब्दुल नाफे कमेटी का गठन हुआ। इस कमेटी के गठन के बाद 6 महीने तक प्रशासन और यूनियन ने इसकी एक भी मीटिंग नहीं बुलाई न ही यूनियन ने छात्रों की सूचना दी जबकि यूनियन भी इस कमेटी में शामिल थी।

ओबीसी फोरम के दबाव के कारण नवंबर में कमेटी की मीटिंग होती हैं और सारे सेंटर से वायवा का प्रतिशत कम करने हेतु प्रतिक्रिया मांगी जाती है। लेफ्ट और दक्षिण के कृपाचार्य और द्रोणचार्य दोनों मिलकर वायवा का प्रतिशत कम करने का विरोध करते हैं जिसकी सूचना ओबीसी फोरम को आरटीआई के तहत हासिल हुई। 23 दिसंबर 2016 के एसी मीटिंग के बाहर बहुजनों ने नाफे कमेटी की रिपोर्ट को लागू कराने के लिए जमकर प्रदर्शन किया लेकिन यूजीसी गजट, 5 मई 2016 का हवाला देकर वायवा में भेदभाव का मुद्दा गायब कर दिया गया। उसी एसी मीटिंग में यूनियन की उपस्थिति में यूजीसी गजट-2016 को पास कर दिया गया जिसके विरोध में यूनाइटिड ओबीसी फोरम, बाप्सा, डीएसयू, एसएफएस, एनएसयूआई तथा संबंधित छात्रों ने लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए 26 दिसंबर 2016 के एसी मीटिंग पार्ट-2 के बाहर यूजीसी गजट लागू किए जाने के खिलाफ उग्र प्रदर्शन कर आवाज उठाने की कोशिश की। ज्ञात हो कि जातिवादी मैनस्ट्रीम लेफ्ट और दक्षिणपंथी इस प्रदर्शन से गायब थे जबकि यूनियन को आने की अपील भी की गई थी।

जब प्रशासन हमारी हमारी आवाज सुनने से मना कर दिया तो बहुजन छात्रों ने कन्वेंशन सेंटर के अंदर घुसकर अपने मुद्दों को लेकर नारेबाजी की और नतीजन प्रशासन ने करीब 11 विद्यार्थियों को तत्काल निलंबित कर दिया जिसमे की यूनाइटेड ओबीसी फोरम के सदस्य मुलायम सिंह यादव, दिलीप यादव, बापसा के प्रवीण, भूपाली, राहुल सोनपिंपले, स्टूंडेंट फ्रंट फॉर स्वराज के दिलीप कुमार, एनएसयूआई और स्कूल ऑफ लाइफ साइंस के कन्वीनर मृत्युंजय सिंह यादव, डीएसयू से कामरेड दावा शेरपा, सामाजिक न्याय के मुखर पक्षधर बीरेंद्र कुमार, शकील अंजुम, और प्रशांत निहाल शामिल थे। इसके बाद सामाजिक न्याय के मुद्दों को कैंपस में लागू कराने के लिए उपरोक्त निलंबित छात्रों ने आॅल आर्गेनाइजेशन मीटिंग बुलाकर यूनियन तथा अन्य वामपंथी संगठनों से यूजीसी गजट तथा निलंबन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ने की अपील की लेकिन यूनियन सहित तमाम गद्दार वामपंथी संगठनों ने हाथ खड़े कर दिए। फिर बाद में बहुजन छात्रों ने कमेटी आॅफ सस्पेंडिड स्टूडेन्टस फार सोशल जस्टिस का गठन किया और यूजीसी गजट, वाइवा में भेदभाव, तथा अलोकतांत्रिक निलंबन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ने का बिगुल बजाया। जिसमें माइनॉरिटी डेप्रिवेशन पॉइंट, जेंडर डेप्रिवेशन पॉइंट, फीस वृद्धि तथा ओबीसी फैकल्टी का हर स्तर पर आरक्षण लागू करने के मुद्दे शामिल थे।

बहुजनों के इस समाजिक न्याय के आंदोलन में एक ओर जहां यूनियन तथा अन्य मेनस्टीम वामपंथी संगठन इसके खिलाफ गोलबंद होकर छात्रों के बीच अफवाहें फैला रहे थे वहीं कैंपस के बहुत सारे छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर सहयोग किया। निलंबन तथा अन्य मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन के तमाम लोकतांत्रिक तरीकों के बावजूद जब प्रशासन सुनने को तैयार नहीं हुआ तो यूनाइटेड ओबीसी फोरम की तरफ से दिलीप यादव ने यूनिवर्सिटी पर जातिवाद का आरोप लगाते हुए खुले तौर पर अपनी एमफिल की डिग्री जलाने को कोशिश की मगर विश्वविद्यालय के टीचर्स तथा छात्रों ने रोक लिया। आगे ओबीसी फोरम ने इस आंदोलन को मजबूर करने के लिए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का आह्वान किया जिसमें साथी दिलीप यादव ने बिना पानी पिये हड़ताल करने का फैसला किया।

इस ऐतिहासिक भूख हड़ताल से प्रशासन पूरी तरह से दबाव में आ गया और कुलपति ने ओबीसी फोरम तथा आंदोलन के अन्य साथियों के साथ कई बार वार्ता के लिए बुलाया लेकिन मांग नहीं मानने पर आंदोलन को जारी रखा गया। अंततः 73 घंटे बिना पानी पिये भूख हड़ताल करने की वजह से दिलीप के यूरिन से ब्लड निकलने लगा और प्रशासन ने दिल्ली पुलिस बुलाकर हड़ताल को बलपूर्वक खत्म कराया। साथी दिलीप चार दिन तक एम्स में भर्ती रहे। इस बीच एबीवीपी प्रशासन की दलाली करते हुए कैंपस में 80-20 का स्वांग रचाकर नौटंकी कर रहा था। उसके बाद कमेटी आॅफ सस्पेंडिड स्टूडेन्टस फार सोशल जस्टिस की तरफ से कुलपति पर दबाव बनाने हेतु प्रशासन भवन को अनिश्चितकाल के लिए ब्लाॅक दि एडमिन ब्लाॅक का आह्वान किया और 10 फरवरी 2017 को जेएनयू प्रशासन भवन को विरोध प्रदर्शन करते हुए पूरी तरह से बंद कर दिया गया। इस बंद से जहां एक ओर प्रशासन दबाव में था वहीं यूनियन तथा अन्य संगठनों के रंगरूट इस सामाजिक न्याय के आंदोलन के खिलाफ मोर्चाबंदी किये हुए  थे और लगातार कैंपस के छात्रों को गुमराह कर रहे थे।

प्रशासन के खिलाफ खड़े हुए बहुजनों के इस सामाजिक न्याय आंदोलन को मजबूती प्रदान करने हेतु एआईएसएफ से अपराजिता राजा, जयंत जिज्ञासु, मनमीत रंधावा, अनुभूति एगनेस बारा, अनुभूति शर्मा, सदत हुसैन, श्यामोली, सिंपल राजरह तथा अन्य बहुत सारे छात्रों ने कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। मुलायम सिंह के द्रोणाचार्यों के दिलों को चीरने वाले नारो ने जेएनयू प्रशासन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इन्ही छात्रों ने फरवरी में पूरा यूनिवर्सिटी को बंद कर दिया था सामाजिक न्याय को लागू कराने के लिए उस समय हर दूसरे दिन जेएनयू प्रशासन अपने वेबसाइट पर नोटिस, सर्कुलर और प्रेस रिलीज लगाता था।

आज जब यूजीसी ने सौ प्रतिशत वाइवा को हटाया है तो इन छात्रों का बहुत बड़ा योगदान है। आज तक इन छात्रों को जेएनयू प्रशासन द्वारा मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। लेकिन यह एक सामूहिक लड़ाई थी हम सबकी लड़ाई थी और आंदोलन की लड़ाई बेकार नहीं जाती है यह साबित कर दिया है। बहुजन छात्रों की सामाजिक न्याय की इस लड़ाई ने यूजीसी को 100 प्रतिशत वायवा की नीति को वापस लेने को विवश किया है। सामाजिक न्याय की लड़ाई का यह केवल एक हिस्सा है और आगे लड़ाई जारी रहेगी। इन सब लड़ाइयों का एक हिस्सेदार यूनाइटेड ओबीसी फोरम भी रहा है जिसमें की अन्य संगठनो और व्यक्तियों का भी योगदान उतना ही है। आने वाले वक्त में भी यूनाइटेड ओबीसी फोरम पूरी मुस्तैदी के साथ बहुजन छात्रों के हितों, छात्रों के अधिकारों के लिए लड़ता रहेगा।