रमजान में बच्चों के लिए शीरमाल और लिए दूध-ब्रेड लेने गया बाप बना मोब लिंचिंग का शिकार

आईएनएन भारत डेस्क
गौरक्षा के नाम देश में फैल रहा भगवा आतंकवाद अब बेलगाम हो रहा है। इतना बेलगाम की खुशियों के त्योहार ईद को भी उसने कुछ गरीब लोगों के लिए गम और खौफ की याद बनाकर रख दिया है। गौरक्षा के भगवा जुनून ने एक और गरीब निर्दोष की जान ले ली है। भगवा आतंकी गिरोह के हाथो मध्य प्रदेश के सतना जिले का 40 वर्षीय पेशे से दर्जी रियाज मारा गया। बीफ के शक में एक घर में घुसकर कुछ भगवा उन्मादियों ने गरीब रियाज की जान ले ली।

रियाज का परिवार बेहद गरीब है इतना गरीब की बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भी नही भेज पाता है। रियाज दर्जी का काम करता था तो उसकी बीवी शहीदुल निशां घर पर ही रहकर बीडी बनाने का काम करती थी। रियाज अपने जानकार शकील के साथ बीडी पत्ता लेने गया था। शकील मांस का कारोबार करता था। शकील को पहले भी गौरक्षा गिरोह की तरफ से धमकियां मिली थीं। रियाज को वह बीडी पत्ता दिलवाने के बहाने लेकर गया था। जहां उन पर भगवा आतंकियों हमला कर दिया। शकील पहले से सचेत था भाग निकला। रियाज उन हमलावरों का शिकार बन गया।

गुरूवार को रियाज घर से यह कहकर गया था कि ईद के कपड़े सिलने के लिए आए हुए हैं। उन कपड़ों के लिए लेस, धागा और बटन लेने के लिए जाना है। बच्चों ने शाम की इफ्तारी के लिए अब्बू से शीरमाल और सहरी के लिए ब्रेड-दूध लाने के लिए कहा। रियाज ने बच्चों से वादा किया कि वह यह सारा सामान लेकर ही घर आएगा। उसने यह भी कहा कि आज इफ्तारी शीरमाल से ही करेंगे। गरीबी जैसी भी थी लेकिन पूरा परिवार इस पर खुश था कि वे इफ्तारी और सेहरी एक साथ बैठकर करेंगे। अब उनके अब्बू कभी भी उनके लिए शीरमाल और दूध-ब्रेड लेकर नही आयेंगे।

उसका छह साल का छोटा बच्चा अपने अब्बू रियाज के बिना नहीं रह पाता है। वह लगातार रो रहा है। वह दिमागी तौर पर कमजोर भी है, शहर के एक प्राइवेट अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है। रियाज को उम्मीद थी ईद के मौके पर चार पैसे ज्यादा रहेंगे तो सभी बच्चों के लिए सुंदर कपड़े सिलवाने हैं।

शहीदुल निशां के भाई अब्दुल रशीद बताते हैं कि शुक्रवार सुबह पुलिस घर आई और कहने लगी कि एक्सीडेंट में रियाज की मौत हो गई है, अस्पताल जाकर उनकी लाश ले आओ। बेहद गरीब घर के रियाज के यहां एक वक्त का खाना मुश्किल से पकता है। अस्पताल से लाश लाने के लिए गली मोहल्ले वालों से पैसे मांगे गए। किसी तरह पैसे जोड़कर अस्पताल से रियाज की डेड बॉडी घर लाई गई। तभी घर पर कुछ पुलिस वाले आए और कहने लगे कि एसपी सतना और कमीश्नर साहब ने संदेश दिया है कि जितनी जल्दी हो सके रियाज को दफना दिया जाए। एसपी सतना ने इसके लिए परिवार को आर्थिक मदद देने के लिए भी कहा कि पैसे हमसे ले लो लेकिन जितनी जल्दी हो सके रियाज को दफन कर दिया जाए। प्रशासन के दबाव में रियाज के रिश्तेदारों ने यहां-वहां से पैसे मांगकर जितनी जल्दी हो सके उसे दफनाने की मजहबी प्रक्रिया पूरी की।

गौरक्षा गिरोह के उन्माद का शिकार एक और गरीब परिवार हो गया। रियाज इस आतंकी हमले में मारा गया। उसके बच्चे इंतजार कर रहे हैं कि अब्बा सहरी लेकर आयेंगे और आज सहरी शीरमाल के साथ ही होगी। परंतु भगवा आतंकवाद ने उनके इंतजार को एक ना खत्म होने वाले इंतजार में बदल दिया। रियाज की पत्नी अपने शौहर की मौत की खबर सुनकर एकबार को पत्थर हो गयी थी परंतु गरीबी ने शहीदुल निशां को अधिक देर तक पत्थर होने और अफसोस करने का भी मौका नही दिया। यदि वो पत्थर बन जायेगी तो उसकी तीन भूखे बच्चों का क्या होगा। रोती बिलखती वह अपने गम से ज्यादा बच्चों की फिक्र में घुली जा रही है।