हिंदुत्व और कारपोरेट साम्राज्यवाद की लूट का नव उदारवादी माॅडल वेदांता-स्टरलाईट

रोजर मूडी
(तूतीकोरीन में जिस तरह की तबाही पिछले कुछ सालों में वेदांता-स्टरलाईट ने शुरू की थी और उसके बाद उस तबाही को कुचलने के लिए तमिलनाडु सरकार और पुलिस ने जो बेरहम हमला प्रदर्शनकारियों पर किया है, उससे वेदांता-स्टरलाईट के इतिहास और उसकी लूट के कारोबार को समझने के लिए हम मूल रूप से लंदन के रहने वाले अनुभवी अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्त्ता और अभियानी रोजर मूडी के शोध के संपादित अंश के रूप में यह आलेख पेश कर रहे हैं।-संपादक)

तूतीकोरीन (तमिलनाडु) में कम्पनी की हरकतों से वहाँ के बाशिन्दों और कामगारों की हुई दुर्दशा एक दीर्घकालिक चिन्ता का विषय है। आस्ट्रेलिया के एक पुराने बन्द प्लांट से 1994 में खरीदे गये (अग्रवाल का कहना है कि यह माटी के मोल मिल गया था) इस स्मेल्टर को महाराष्ट्र सरकार ने बहुत ज्यादा खतरनाक बता कर खारिज कर दिया था और वही स्मेल्टर मन्नार की खाड़ी के स्पेशल बायो-स्पफीयर रिजर्व से 9 किलोमीटर दूर समुद्री सुरक्षा नियमों के खिलाफ बैठाया गया।

अपने पहले साल के कार्यकाल में इस स्मेल्टर को सरकारी आदेश से तीन बार बन्द किया गया मगर स्पष्ट रूप से असुरक्षित और जहरीले पदार्थों से छलकते हुए इस प्लांट को फिर खोलने की अनुमति दे दी गई। भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित खतरनाक कचरों का अनुश्रवण (मॉनिटरिंग) करने वाली एक समिति जब सितम्बर 2004 में यह प्लांट देखने गई तब वह एक किनारे पर फॉस्फो-जिप्सम के ‘‘पहाड़‘‘ देख कर हैरान रह गई तो कारखाने के दूसरे किनारे पर ‘‘हजारों टन आर्सेनिक से सने स्लैग‘‘ देखने को मिले- सब खुले आसमान के नीचे हवा और पानी के पूरे सम्पर्क में। न सिर्फ इस कचरे को तत्काल हटा देने वाले आदेश की वेदांत ने अनदेखी की बल्कि उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित एक अन्य विशेषज्ञ समिति जब अगले महीने वहाँ गई तो उसने देखा कि कम्पनी ने गैर-कानूनी ढंग से नये-नये उपकरण लाकर अपना विस्तार अपनी डिजाइन क्षमता से लगभग दुगुना कर लिया है जिसकी वजह से कचरा घटने के बजाय बढ़ गया है। बहुत से पर्यवेक्षकों और खुद मैंने इस स्मेल्टर तक की 2004 से 2006 के बीच कई यात्राएं कीं और सबका नतीजा एक ही था कि कम्पनी ने इन खतरनाक वस्तुओं की मात्रा को कम करने के लिए कुछ भी नहीं किया।

इस बीच में अग्रवाल वेदांत के महत्वाकांक्षी बॉक्साइट खनन प्रयासों के साथ-साथ अल्युमिनियम की शोधन और स्मेल्टिंग क्षमता को आगे बढ़ाने के प्रयासों में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में कोशिशें करते रहे। स्टरलाइट द्वारा 2001 में सरकार की कम्पनी बाल्को के अधिग्रहण पर उस साल एक बड़ा राजनैतिक विवाद उठ खड़ा हो गया था। यह पहला मौका नहीं था जब अग्रवाल ने भारत के एक बड़े अल्युमिनियम कारखाने को हथियाने की कोशिश की थी। उन्होंने इण्डैल को पाने के लिए इसके निवेशकों से शेयर लेने का प्रयास किया मगर पैसा नहीं चुका सके। 4 साल बाद दिल्ली उच्च न्यायालय को एक आदेश निर्गत कर उन्हें मजबूर करना पड़ा कि वह पैसा दिखायें. भारत की तीसरी सबसे बड़ी अल्युमिनियम कम्पनी बाल्को के 51 प्रतिशत हिस्से की आनन-फानन में बिक्री को कुछ लोगों ने सरकार के बीमार बही-खातों को ‘बजट-पूर्व कलाबाजी‘ के रूप में देखा था। इस तरह के आरोप खुल कर लगाये गये कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में चल रही देश की सरकार ने जान-बूझ कर और सफलतापूर्वक बाल्को को अपनी शर्तों और अपने संसाधनों से आधुनिकीकरण नहीं करने दिया। जो भी रहा हो, कम्पनी की कीमत बहुत कम आँकी गई, कुछ अनुमानों के अनुसार स्टरलाइट ने जितना पैसा दिया उससे दस गुनी सम्पत्ति उसने हासिल की। इस रेवड़ी बंटने के सबसे पहले शिकार हुए बाल्को के कामगार जिन पर छंटनी और अन्य लाभों को गंवाने का खतरा मंडराने लगा। नवनिर्मित ‘आदिवासी‘ छत्तीसगढ़ राज्य के सात हजार कामगार एक लम्बी हड़ताल पर चले गये और भारत अल्युमिनियम कर्मचारी संघ (सीटू से सम्बद्ध) के कार्यकारी अध्यक्ष एएम अन्सारी को स्टरलाइट प्रबन्धन ने 3 साल पहले किये गये दुर्व्यवहार का हवाला देकर नौकरी से बर्खास्त कर दिया।

जनवरी 2007 में वीवी गिरी इन्स्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई कि वेदांत/बाल्को ने हस्तांतरण के समय अपने कर्मचारियों के साथ आतताइयों जैसा व्यवहार किया और रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कम्पनी ने निजीकरण अनुबन्ध के अधिकांश प्रावधानों का उल्लंघन किया। सर्वाधिक दबाव तथाकथित ‘हरित धातु‘ के उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की जो आवश्यकता पड़ती है, उस उच्च गुणवत्ता वाले सारी दुनिया में पाये जाने वाले बॉक्साइट का आठवाँ भाग भारत में जमीन के नीचे मौजूद है। लेकिन यह खनिज उन पहाड़ियों की चोटी पर मिलता है जो कम से कम 1000 मीटर उंची हैं जहाँ पहाड़ी ढलानों पर किनारे-किनारे केवल संकरे रास्तों और पगडण्डियों के जरिये ही पहुँचा जा सकता है। पिछले 20 वर्षों में जंगलों की भारी कटाई के बावजूद और पर्यटन तथा जंगल कटाई से बचते-बचाते ये इलाके अब भी इस उप-महाद्वीप के सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले क्षेत्र हैं। ये हजारों आदिवासियों, चीतों, हाथियों, भैंसों, हिरण और दुर्लभ औषधियों के घर-वास हैं। तमिलनाडु में यह शोला के जंगलों की शक्ल में बीहड़ों को ढकने का काम करते हैं।

मैंने वेदांत की प्रायः सभी बड़ी बॉक्साइट वाली खदानों के स्थानों को देखा है जो छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु में जगह-जगह पर फैली हुई हैं। बिना किसी अपवाद के मैंने यह पाया है कि यह कम्पनी छोटे से छोटे पर्यावरणीय मानकों का भी उल्लंघन करती है और अपने कामगारों का शोषण तो वह इस हद तक करती है जिसके आगे, अगर विश्वस्तरीय प्रतिष्ठानों की बात छोड़ दें, तो घरेलू भारतीय कम्पनियाँ भी उतना नीचे नहीं गिरती होंगी।

परियोजना की राह के रोड़े बनी बैगा आदिवासियों की दो बस्तियों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किये हुए उनके घरों समेत उजाड़ दिया गया और उन्हें मैदानों में गैर-आदिवासी बस्तियों के बीच लाकर छोड़ दिया गया। उन्हें उनकी मक्के, तिलहन, चने और सरसों की फसल को काटने तक की मोहलत नहीं दी गई। उनकी गाय, भैंस, बकरियाँ वगैरह सब वहीं छूट गईं और जितनी जमीन उनके पास हुआ करती थी अब उसकी आधे पर अपनी जिन्दगी बसर करने के लिए वे मजबूर हैं। वेदांत के पहले मैनेजर ने 2005 में मुझे बताया कि वेदांत ने यहाँ जो खैरात बाँटी उसमें नया घर बनाने के लिए 2,500 रुपये, एक हैण्ड पम्प और एक नई सड़क शामिल थी। कुछ मुआवजा भी लोगों को दिया गया था लेकिन मैनेजर ने यह स्वीकार किया कि वह बहुत कम था। उन्होंने यह भी कहा कि, ‘‘अगर सरकार हमें कुछ अतिरिक्त भुगतान करने के लिए कहती है तो हम करेंगे।‘‘ लोगों के प्रति हुई नाइन्साफी से साफ तौर पर परेशान मैनेजर ने कहा कि लोगों को और अधिक नहीं हटाया जाना चाहिए, कम से कम कुछ समय के लिए तो हरगिज नहीं। इसके कुछ दिनों बाद मैनेजर को ही हटा कर मैनपाट भेज दिया गया और इसी बीच में कुछ अन्य परिवारों को जबर्दस्ती उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया या पहाड़ों पर खदानों के किनारे ठेल दिया गया ताकि वे झूलते रहें। अब उनकी नींद हर सुबह खदानों के धमाके और धूल भरी बारिश से खुलती है।

अगर भारत के पर्यावरणवादियों और आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोग न होते तो अब तक कम्पनी द्वारा इन पहाड़ियों की लूट-पाट शुरू हो चुकी होती। सितम्बर 2004 में भू-वैज्ञानिक डॉ श्रीधर राममूर्ति्त-निदेशक, अकैडेमी ऑफ माउन्टेन एन्विरॉनिक्स, उड़ीसा के पर्यावरणविद् विश्वजीत महन्ती और अधिकार रक्षक-प्रचारक सामन्त राय ने मिल कर उच्चतम न्यायालय की सेन्ट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी को आवेदन किया कि वह कम्पनी के क्रिया-कलाप को बन्द करवाये। इसके प्रत्युत्तर में उस वर्ष के अन्त में दो विशेषज्ञों को लांजीगढ़ भेज कर वस्तुस्थिति की जानकारी मांगी गई। ये लोग इस नतीजे पर पहुँचे कि वेदांत ने उड़ीसा सरकार की मिली भगत से गैर-कानूनी ढंग से संरक्षित वनों का विनाश किया है और बिना समुचित अनुमति के रिफाइनरी का निर्माण चालू कर दिया है तथा वहाँ के बाशिन्दों को बिना किसी जन-सुनवाई के उनकी जमीन और घरों से हटा दिया है। जनवरी 2005 में सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने स्पष्ट रूप से कहा कि वेदांत ने उड़ीसा सरकार की मदद से बेशक कानून को तोड़ा है। अब आप समझ सकते हैं कि मोदी सरकार पर्यावरण और मानवाधिकार के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों के खिलाफ क्यों है।

शहरों में रहने वाले बहुत से भारतीयों ने स्टरलाइट इण्डस्ट्रीज का नाम सुना होगा मगर (जैसा मुझे अपनी यात्राओं के दौरान पता लगा) इनमें से बहुतों को यह नहीं पता होगा कि स्टरलाइट पर वेदांत का 82 प्रतिशत नियंत्रण है। वास्तव में लन्दन में हुए निबन्धन ने अग्रवाल को विदेशी पूंजी हासिल करने का अभूतपूर्व अवसर प्रदान करने के साथ-साथ स्टरलाइट की भारतीय खदानों और उनसे सम्बद्ध शोधन इकाइयों की पूंजी को भी और अधिक बढ़ाने का मौका मुहैया करवाया। 2007 के प्रारम्भ में अनिल अग्रवाल और उनके परिवार के पास वेदांत का 54 प्रतिशत हिस्सा था और इस तरह से उसी अनुपात में उन्होंने कार्पोरेट मुनाफे का हिस्सा भी हथिया लिया।

55 वर्ष पूर्व एक व्यापारी मारवाड़ी परिवार में पैदा हुए (मगर इस समय लंदन के फैशनपरस्त मेफेयर इलाके में सुखपूर्वक रहते हुए) अग्रवाल ने पिछले 3 दशकों में एक छोटी सी ताँबा उत्पादक इकाई को एक पारिवारिक होल्डिंग कम्पनी के रूप में संवर्धित किया था जो अब भारत सरकार की दो खनिज कम्पनियों, हिन्दुस्तान जिंक और बाल्को (भारत अल्युमिनियम कम्पनी) को नियंत्रित करती है। भारत के तीन खनिज समृद्ध राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं, पी चिदम्बरम वेदांत कम्पनी के एक डायरेक्टर रह चुके हैं जिस पद को छोड़ कर वह भारत के ताकतवर वित्तमंत्री बने।

‘‘मैं भारत के मानस को समझता हूँ।‘‘ यह अग्रवाल ने 2005 के शुरू में सारी दुनिया के निवेशकों के सामने उनके ज्ञानवर्धन के लिए कहा था। वह निश्चित रूप से जानते हैं कि गोटी कैसे फिट की जाती है। जब वेदांत के अध्यक्ष माइकेल फाउल ने एकाएक उस साल मार्च में अपने पद से इस्तीपफा दे दिया और उसके तुरन्त बाद ज्याँ पियरे रॉडियर, जो वेदांत के स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण समिति के अध्यक्ष थे, भी छोड़ कर चले गये तब अग्रवाल ने तुरन्त अपने आप को कम्पनी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। यह इंग्लैण्ड के उस कार्पोरेट जगत के बेहतर गवर्नेंस नियमों के खिलापफ था जिसकी नाक-भौंह चढ़ जाती है अगर किसी कम्पनी का सबसे बड़ा शेयर धारक उसका मुखिया बन जाता है। अपने बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति को लेकर भी अग्रवाल पर छींटे पड़े। इंग्लैण्ड की निबन्धन संस्था की कम्पनी पर प्राथमिक शर्तों के अनुसार, जिस पर जेपी मॉर्गन इन्वेस्टमेन्ट बैंक की भी मुहर थी, बोर्ड के अधिकांश निदेशक अग्रवाल परिवार और उनके ट्रस्ट के ‘बाहर‘ के आदमी होने चाहियें। आजकल बोर्ड का केवल एक सदस्य गैर-हिन्दुस्तानी है। तीन में से दो कार्यकारी निदेशक अग्रवाल हैं और तीसरे कुलदीप जौरा ने 2002 से स्टरलाइट के लिए काम किया है।

नियमों को ताक पर रखने वाले अग्रवाल

विवाद अग्रवाल का पीछा 1990 के दशक के मध्य से ही कर रहे हैं। उन पर बार-बार आरोप लगे हैं कि उन्होंने राजनैतिक और न्यायिक स्तर पर घूस देने की पेशकश की है और भारत के दक्षिणपंथी हिन्दुत्व एजेण्डे की पैसे से मदद की है। उनके खिलाफ साबित तो कुछ नहीं हुआ है मगर इस साल शुरू में लोकसभा में भारत की राजनैतिक पार्टियों को दानदाता वेदांत फाउण्डेशन द्वारा चन्दा देने का प्रश्न उठाया गया था क्योंकि, जैसा लगता है, यह मामला देशी कानून का उल्लंघन है जो किसी भी विदेशी कम्पनी को ऐसा करने से निषेध करता है। जिसके लिए संभवत मोदी सरकार ने पिछले संसद सत्र में कानूनों में बदलाव किये हैं।

इतना तो तय है कि 1998 में स्टरलाइट को वृहद रूप से खुद को फायदा पहुँचाने वाले शेयर घोटाले का दोषी पाया गया था। परिणामतः बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के नियंत्रक, सिक्यूरिटी एण्ड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इण्डिया (सेबी) ने इसे 2 साल तक के लिए ट्रेडिंग करने से रोक दिया था (हालांकि इस आदेश को जल्दी ही सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया था जब सेबी द्वारा दिये गये नए सबूत को सरकार ने नहीं माना)।

उपसंहारः ‘‘हमारा वेदांत‘‘

दुनिया की किसी भी खनन कम्पनी ने इस तरह से अपने आपको प्रतिष्ठित नहीं किया जैसा कि वेदांत ने किया है। इसे एक ओर अपने भारतीय मूलपर नाज है और यह देश के औद्योगिक विकास में मदद करने के लिए कटिबद्ध है (इसने आणविक विद्युत केन्द्रों के निर्माण में रुचि दिखाई है, निजी कोयला खदानों के क्षेत्र में काम करना चाहती है, लौह अयस्क की खदानों को हासिल करना चाहती है, और कोलार की सोना खदानों के लिए बोली लगा रही है), वहीं इसने ऑस्ट्रेलिया, जाम्बिया और अर्मेनिया में वर्तमान सेंधमारी के अलावा दुनिया की बहुत-सी जगहों पर अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए नजरें गड़ा रखी हैं।

अनिल अग्रवाल यह दावा जरूर करते हैं कि उनके मुनाफा कमाने से साथी भारतीयों को फायदा पहुँचता है मगर हकीकत यह है कि उसका नतीजा एकदम उलटी दिशा में होता है।

दरअसल उनका पहला उद्देश्य अपने परिवार के जखीरे को बड़ा करना है और अपने विदेशी निवेशकों को उनका लाभांश पहुँचा देना है। अब तक किसी ने भी, लक्ष्मी मित्तल या टाटा बन्धुओं समेत, इतने व्यवस्थित और निन्दनीय तरीके से अपनी मातृ-भूमि को नंगा नहीं किया है, अपने कामगारों का इतना शोषण नहीं किया है, और न ही कभी निर्दयी लुटेरों की तरह उन समुदायों के अधिकारों का हनन किया है जिन्हें तथाकथित रूप से भारत के संविधान से सुरक्षा मिली हुई है। सच यह भी है कि पिछले 2 वर्षों में किसी भी खनन कम्पनी का आर्थिक रूप से इतना विकास नहीं हुआ है जितना इस कम्पनी का हुआ, जिसने अपने मुनाफे को इसी दौरान लगभग दोगुना कर दिया।

वेदांत को शुद्ध रूप से एक मानक की तरह भारतीय चमत्कार मानने को मन करता है और सचमुच इस निष्कर्ष पर पहुँचना ही होगा कि अग्रवाल ने जान-बूझ कर इस कम्पनी को इस तरह से गढ़ा है कि वह उच्चवर्णीय हिन्दुत्व का एक तार्किक विस्तार लगे, मगर प्रगट रूप में वह धर्मनिरपेक्ष दिखाई पड़े। उनका यह प्रस्ताव कि वह पुरी के पवित्र धाम के पास उड़ीसा में ‘हार्वर्ड की तर्ज पर‘ एक वेदांत विश्वविद्यालय की स्थापना करेंगे, इसकी एक मिसाल है। इस विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए किसी ‘योग्यता‘ की आवश्यकता नहीं होगी, (अर्थात इसमें मध्य वित्त वर्ग और सम्पन्न वर्ग के लोगों के लड़के-लड़कियों के लिए खास स्थान होगा और उनसे – अभिभावकों से- यह अपेक्षा रहेगी कि वे वेदांत के सभी सही-गलत कामों का समर्थन करते रहें)ं लेकिन इसके पहले कि इस दिव्य भवन की आधारशिला रखी जाए, वेदांत ने खुद आदिवासियों के मनुष्य और प्रकृति के बीच के सम्बन्धों की मनोभावना को निर्दयतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया है और उनकी आध्यात्मिकता को ठिकाने लगा दिया है।

लांजीगढ़ रिफाइनरी के निर्माण के लिए चैरस या उजाड़ कर दिये गये किसी भी क्षेत्र में अगर कोई जाये तो उसे हर गाँव में एक साइन बोर्ड लिखा मिलता है और उस पर स्पष्ट शब्दों में लिखा मिलता है कि यह ‘हमारे वेदांत‘ का हिस्सा है।

यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है. अस्सी के दशक में सुनने में आया था कि मध्य-पूर्व में एक इस्लामिक मिनरल्स जैसी कोई कम्पनी वजूद में आई थी और ऑस्ट्रेलिया में वहाँ की आदिम जन-जातियों के एक समूह ने क्रिश्चियन मिनरल कम्पनी शुरू की थी। मगर इन लोगों ने अपने पंथ के मूल पर कोई परदा डालने की कोई कोशिश नहीं की थी और शायद इसीलिए उनका जीवन काल बहुत छोटा रहा क्योंकि आजकल के समय में कड़ी व्यापारिक स्पर्धा में यह सब टिक नहीं सकता। इसके विपरीत अग्रवाल उद्योग ने हिन्दुत्व और नव-उदार रूढ़िवादिता का मिश्रण करने में एक जबर्दस्त सफलता अर्जित की है भले ही यह सफलता बेतुकी क्यों न हो।