मोदी और शाह पर राहुल के हमलों से बौखलाया गोदी मीड़िया

महेश राठी
कर्नाटक में येदियुरप्पा के इस्तीफा देने और भाजपा सरकार गिर जाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नई दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पर जमकर हमला किया। मोदी और शाह के बारे में कहना मुश्किल है कि उन पर राहुल के बयानों का कुछ फर्क पड़ा अथवा नही। परंतु इन आरोपों से गोदी मीड़िया हाल बेहाल और पगलाया सी दिखाई पड़ रहा है। यह पत्रकारिता के ‘‘भक्ति अभियान‘‘ में बदल जाने और पत्रकारों के ‘‘अंधे भक्त‘‘ हो जाने के दौर को दर्शा रहा है। ऐसा नही है कि यह भक्ति केवल स्थापित प्रिंट मीड़िया अथवा खबरिया चैनलों तक ही सीमित है बल्कि इस बीमारी ने वैकल्पिक मीड़िया के रूप में उभर रहे वेब मीड़िया को भी अपनी चपेट में लेने की कोशिश शुरू कर दी है।

वेब पार्टल फर्स्ट पोस्ट पर एक सज्जन ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर हमला करते हुए राहुल गांधी की तुलना ट्रंप से करते हुए उन्हें झूठा और तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करने वाला तक बता डाला। उन्होंने यह कोशिश राजनीति में झूठ के चलन को रेखांकित करने और शुचिता की राजनीति के पक्ष में नही की गई बल्कि उनका यह आलेख सीधे सीधे मोदी और शाह के बचाव में आकर लिखा गया है। उनका यह आलेख ऐसा जाहिर करता है कि मोदी और शाह मानो इस देश में मूल्यों की राजनीति कर रहे हैं और राहुल गांधी झूठ फैलाने और मिथ्यारोप लगाने की राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने अपने लेख में अमित शाह पर लगे आरोपों से बरी हो जाने को ऐसे पेश करने की कोशिश की है कि मानों वह एक मासूम इंसान हैं और राजनीति का शिकार थे। वहीं राहुल गांधी की तुलना ट्रंप से करके उन्होंने राहुल गांधी को अनायास ही ट्रंप के जैसा झूठ बोलने वाला और वाचाल बता दिया है।

जबकि वास्तविकता इससे कहीं अलग है। देश और दुनिया का मीड़िया अभी तक मोदी और ट्रंप की तुलना करता रहा है। मोदी और ट्रंप की तुलना इसलिए नही की जाती है कि उनमें से कौन सबसे ज्यादा झूठ बोल सकता है। क्योंकि इस मामले में तो शार्तिया भारत के प्रधानमंत्री ही बाजी मार ले जायेंगे। यह तुलना इस कारण से अधिक है कि दोनों ट्रंप और मोदी दुनियाभर में नफरत और नस्लवाद की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। और अपनी इसी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए वे अजीबो गरीब बयानबाजी करते हैं तो तथ्यों से खिलवाड़ भी करते हैं। दोनों तथ्यों को ऐसे तोड़ मारोड़कर पेश करते हैं कि अपने लोगों अपने देश की जनता को गुमराह किया जा सके। बेशक इस मामले में ट्रंप अपने देश की आबादी के अधिक प्रतिशत लोगों को मूर्ख बना पाने में कामयाब हुए तो वहीं मोदी तुलनात्मक रूप से भारत के कम प्रतिशत को गुमराह करने के बावजूद चुनाव प्रणाली की विसंगतियों के कारण सत्ता कब्जाने में कामयाब हो गये।

मोदी और ट्रंप में कई समानताएं हैं। मसलन, ट्रंप दुनिया में चलाये जा रहे मुस्लिम फोबिया का दोहन करके और उसी आधार पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके सत्ता पर कािबज हुए हैं और नस्लवादी श्वेत श्रेष्ठता भी उनका ध्रुवीकरण का एक अन्य हथियार है। उसी तर्ज में मोदी भी मुस्लिम विरोधी फोबिया के कारण ही सत्ता में आये हैं। गुजरात नरसंहार से पहले तक मोदी को कोई खास जानता भी नही था। उनके हिंदू हर्दय सम्राट बनने का कारण 2002 का गुजरात नरसंहार ही रहा है। जो कि देश में उस एक खास तबके को लुभाता है जो मुस्लिमों से नफरत करने और उनके खिलाफ अभियानों से संतोष पाता है। उसी सांप्रदायिक आबादी को मोदी एक नायक के रूप में लुभाते हैं और जबसे दुनिया में अमेरिकी गुप्तचर संस्थाओं के नेतृत्व में यह मुस्लिम फोबिया बनाया और बढ़ाया गया है तभी से संघ नीत भाजपा और उसके मोदी जैसे नेताओं की राजनीति उभार पर है। और यह कोई अनायास भी नही है कि इस मुस्लिम फोबिया की राजनीति का चलन अन्तर्राष्ट्रीय वित्त पंूजी की नव उदारवादी नीतियों के लागू होने से जुड़ा है। नव उदारवादी नीतियां जितनी तेजी से दुनिया के देशों की प्राकृतिक और राष्ट्रीय संसाधनों को निगलने के लिए उतारू हुई उतनी ही तेजी से मुस्लिम फोबिया की इस राजनीति का देश और दुनिया में विस्तार हुआ।

अब बात ट्रंप और मोदी की। दोनों में इस मुस्लिम फोबिया और उनके अपने राष्ट्रवाद को लेकर झूठ बोलने की भी एक स्पर्धा है। ट्रंप जब आतंकवाद के खिलाफ मुहिम की आड़ में दुनिया के सभी मुसलमानों को निशाना बनाते हैं तो आतंकवाद को बनाने और बढ़ाने में अमेरिका की बेशर्म भूमिका को छूपा जाते हैं। वह एक दिन नही बोलते और दुनिया के समझदार लोग एक दिन नही भूलते कि अमेरिका का तमाम तरह का पोषण नही उपलब्ध होता तो दुनिया में यह तथाकथित इस्लामिक आतंकवाद नही पैदा होता। अमेरिका ही दुनिया में फैले मौजूदा आतंकवाद का जनक है। वहीं दूसरी तरफ देश के मुसलमानों को निशाने पर लेने वाले संघी देश की आजादी की लड़ाई में मुसलमानों की भूमिका पर पर्दा डालने और झूठ फैलाने के अलावा दूसरा कोई काम करते नही हैं। और केवल यह देश के मुसलमानों की भूमिका पर ही पर्दा नही डालते हैं बल्कि आजादी की लड़ाई में अपनी करतूतों को छिपाकर ही राष्ट्रवादी बनते हैं। सावरकर से लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक सभी ब्राहमणवादी संघियों की करतूतें अंग्रेजों की चाकरी की रही हैं। उनके अंग्रेजों को समर्थन देने के लिखित दस्तावेज मौजूद हैं। वह सावरकर जिसकी तरीफों के पुल बांधते संघी अघाते नही हैं। वह तिरंगे के अपमान से लेकर 15 अगस्त 1947 को शोक का दिन बताने का दोषी है। जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आजाद हिंद फौज लेकर देश को आजाद करवाने भारत की सीमा पर लड़ रहे थे तो सावरकर और मुखर्जी देशभर में अंग्रेजों की फौज में भर्ती होने की प्रेरणा देने वाले भर्ती कैंप चला रहे थे। 1939 के बाद जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ मिलकर पंजाब, सिंध और बंगाल में सरकार चलाने वाले और अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध करने वाले राष्ट्रभक्त और देश की आजादी की लड़ाई में 1857 से लेकर 1947 तक हजारों जाने कुर्बान करने वाले मुसलमान राष्ट्रवादी नही हैं। यही ट्रंप और मोदी की राजनीति की समानता है।

इसके अलावा जहां ट्रंप मुसलमानों को आतंकी बताकर देश में आने से रोकना चाहता है तो मोदी भी समय समय पर उनके खिलाफ झूठा विषवमन करते हैं। मोदी का एक जुमला यूपी चुनाव के प्रधानमंत्री होने के बावजूद श्मशान और कब्रिस्तान वाला सभी को अभी तक याद है। इसके अलावा हम पांच हमारे पच्चीस का जुमला भी सभी को याद है। राहुल पर निशाना साधने वाले भक्त पत्रकार कोई तथ्य इस जुमले के पक्ष में लाकर दे दें। यह वही नफरत की राजनीति है जिसे ट्रंप पूरी दुनिया में फैलाना चाहते हैं और मोदी और संघ इस नफरत की राजनीति के भारत में उनके स्वाभाविक सहयोगी हैं।

इसके अलावा केवल झूठ और तथ्यों को बिगाडने तक भी सीमित रहें तो अनेक पत्रकार और लेखकों ने ढ़ेरों लेख लिखे हैं। मोदी के 12 झूठ, मोदी के 14 झूठ और इसी तरह। मोदी ने तथ्य और इतिहास को बिगाड़ने की सारी हदें पार कर डाली। यहां तक कि जिनके नाम पर वह राजनीति करते रहे हैं। उन्हीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी और विवेकानन्द की जन्म तिथियों को बदलकर उनको चड्ढी यार बना डाला। यहां तक बिहारियों का वोट पाने के जनून में सिंकंदर को बिहार तक खींचकर ले आये। बेचारा पौरस भी रोता होगा कि हाय में बिहारी क्यों नही हुआ। इतिहास भूगोल किसी को भी मोदी के झूठ ने नही छोड़ा। रही बात अमित शाह की अभी भाजपा सरकार आने के बाद किस प्रकार से गवाह पलटे हैं और उनको बरी करने वाले जज की तरक्की उनके वकील की तरक्की और इसमें चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर सवाल खड़े करने वाली तमाम रिपोर्टें देशभर के अखबारों और पोटर्लों पर प्रकाशित हो चुकी है। हमने राणा अय्यूब की किताब गुजरात फाइल्स भी पढ़ी है। क्यों नही संघ अथवा भाजपा उसे चुनौती देते हैं। मालूम है यदि ऐसे मामलों को कानूनी चुनौती दी जाती है तो कईं मुर्दे कब्रों से बाहर आ जायेंगे और एक किताब जिसमें लेखिका सारे सबूत होने का दावा करती हैं और उनके पास रिकार्डिंग्स भी हैं उनकी, तो वही साक्ष्य बन जायेंगे और जिस एसआईटी से मिश्रालय ने गोदी मीड़िया के तथाकथित मासूम और सच्चे नेताओं को बचाया है। वह भी उन्हें नही बचा पायेगा।

बहरहाल, यह मीड़िया इसीलिए गोदी मीड़िया है कि यह एक संघी डिजायन का हिस्सा है जो सारी अनैतिकताओं को नये मूल्यों, झूठ को सच्चाई का पुलिंदा और षडयंत्रों को राष्ट्रवादी प्रयास बनाकर पेश करता है। हमें हाल ही की कर्नाटक की घटनाएं याद हैं गोदी मीड़िया ने उसे कैसे प्रचारित और प्रसारित किया। कांग्रेस और जेडीएस के गठजोड़ को उसने ‘‘डील‘‘ लिखा, नापाक और अनैतिक बताया। और भाजपा की खरीद फरोख्त को युदियुरप्पा सरकार को बचाने का भाजपाई प्रयास भर कहा। कांग्रेस के जो दो विधायक गायब थे और जेडीएस के जो विधायक नही मिल पा रहे थे कभी नही उन पर स्टोरी की कि वो कहां है। जब वो वापस आ गये तो सबने स्टोरी करके बताया कि किस प्रकार उनका पुराना संबंध रेड्डी बंधुओं से है और वो भाजपा में टिकट नही मिलने पर कांग्रेस में आ गये थे यानि पुराने भाजपाई थे। यही भगवा राजनीति का असली रंग है। उनका झूठ, उनके षड़यंत्र और उनकी मक्कारी सभी सतकर्म और राष्ट्र हित में और बाकी के मूल्य बचाने, लोकतंत्र बचाने संविधान सम्मत प्रयास सब के सब ‘‘डील‘‘। परंतु यह कोई एक या उससे अधिक घटना भर नही है। ना ही यह अनायास हो रही मासूम पत्रकारिता है, यह भयावह ब्राहमणवादी डिजायन है। जो सत्ता की भूख में कुछ भी कर सकता है किसी भी हद तक जा सकता है।