कर्नाटक के बाद भी विपक्ष सुप्तावस्था में, कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों को आगे रखकर व्यापक एकता बनानी होगी

संजय यादव
प्रत्येक चुनाव में हारने और जीतने वाले दोनों के लिए निश्चित ही कुछ संदेश होते हैं। और कर्नाटक चुनावों के भी विपक्षी दलों के लिए एक साफ संदेश है।

चाहे आपके पास चुनाव पूर्व और चुनाव के बाद के गठबंधन के रूप में महत्वपूर्ण बहुमत हो तो भी आपको समझना पड़ेगा कि केन्द्र में सत्तासीन मौजूदा तानाशाह दक्षिणपंथ जिसके पास उसके इशारे पर काम करने वाली जांच एजेंसियों का मजबूत सहारा है, आपको पहले कि तरह आसान तरीके राजनीति करने की राह नही देगा।

सतारूढ़ पार्टी के पास एक नये नार्मल की परिभाषा है जिसमें नैतिकता और उसके औचित्य का नया संबंध हैं। जिसका नतीजा है, किसी भी कीमत पर सत्ता के लिए स्थापित परंपराओं की तबाही, जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र की अपूरणीय क्षति हुई है।
अपनी राजनीतिक सुविधा और सत्ता की भूख के अनुरूप उसके पास शासन के कईं भयावह डिजायन हैं।

अपने प्रति प्रतिबद्ध मीडिया के समर्थन से शासक दल के सदस्य उसे वैधानिक, नैतिक और संवैधानिक के रूप में गढ़कर पेश करते हैं जो उनके लिए अच्छा है। ऐसा कुछ जो उनके खिलाफ है, उसे लोकतंत्र की हत्या के रूप में ब्राण्ड़ किया जाता है।
कर्नाटक और बिहार उनकी अधिकनायकवादी मानसिकता के एकदम उपयुक्त उदाहरण हैं। गोवा, मणिुपर, मेघालय और जम्मू और कट्ठीर दूसरे उदाहरण हैं, जहां वह अंत उनका चुनाव और उसके औचित्य का साधन बनता है, बेशक यह लोकतंत्र का गला घोट दे।

विपक्षी दलों को लोकतंत्र और उसके संस्थानों पर इस केन्द्रीत हमले को समझने की जरूरत है। विपक्षी दलों को मतभेदों को त्यागने की जरूरत को समझना चाहिए और संविधान की प्रस्तावना की पहली पंक्तिः ‘‘हम भारत के लोग‘‘ की रक्षा के लिए व्यापक एकता बनानी चाहिए।

कोई गलती नही करें। यह लडाई गोडसे के विचार जिसका प्रतिनिधित्व संघ परिवार कर रहा है और गांधी, अंबेडकर और लोहिया के भारत के विचार के बीच है।

इस समय पर विपक्षी दलों द्वारा उठाये गये कदमों से ही इतिहास हमें जज करेगा। हालिया घटनाक्रमों ने दिखाया है कि संवैधानिक मूल्य और जनवादी वजूद खतरे में हैं। विपक्षी दल और नागरिक समाज संगठन एक राजनीतिक दल के खिलाफ नही बल्कि खतरनाक दक्षिणपंथी संगठन आरएसएस के खिलाफ हैं।

यह समझना मुश्किल है कि क्यों विपक्ष अभी भी लगातार सुप्तावस्था में बना हुआ है।

कर्नाटक के चुनावों ने फिर से यह संदेश दोहराया है कि सभी विपक्षी दलों को सबसे नीचले तबकों के सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्धता की योजना के साथ एक साथ आने की जरूरत है। विपक्षी दलों को यह भी मानना होगा कि कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रभाव है और इसीलिए वह आरएसएस और भाजपा का विकल्प है। ठीक उसी तरह कांग्रेस को भी इसे स्वीकार करना चाहिए कि वह प्रत्येक राज्य में भाजपा के खिलाफ हमले में क्षेत्रीय दलों को अग्रिम भूमिका में आने देगी।

अक्सर कांग्रेस व्यापक विपक्षी एकता पर जोर देती है परंतु उसे वास्तविक आकार देने में पीछे रह जाती है। कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के सामाजिक गठबंधनों को समायोजित करने में सक्रिय नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए। 2014 के बाद केवल क्षेत्रीय दल ही भाजपा को रोकने में सक्षम हुए यथा बिहार में लालू यादव, पश्चिमी बंगाल में ममता बनर्जी, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल। केवल पंजाब ही एक अपवाद है।

राजद प्रमुख लालू यादव वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भाजपा के जन विरोधी एजेंडे को समझा और इस प्रकार नीतीश कुमार के साथ एक गठजोड़ करने का निर्णय लिया, जो पहले से ही लंबे समय भाजपा-आरएसएस के सहयोग से सत्ता का आनन्द ले चुके थे। इस लंबी राजनीतिक दोस्ती को एक तरफ करके उन्होंने यह गठजोड़ किया और नीतीश को मुख्यमंत्री पद की पेशकश की, बावजूद इसके कि उनकी पार्टी बड़ी थी। कांग्रेस पार्टी भविष्य का गठबंधन करते हुए इसे ध्यान में रखना चाहिए।

जानबूझकर या अनजाने में ही कांग्रेस ने क्षत्रीय दलों के साथ गठजोड़ में कुछ गलत आंकलन किये हैं। उदाहरण के लिए उसने महाराष्ट्र में शरद पवार की एनसीपी के साथ लंबे समय से चला आ रहा गठजोड़ तोड़ दिया, असम में बदरूद्दीन अजमल की एयूडीएफ, झारखण्ड़ में हेमंत सोरेन की जेएमएम, गुजरात में एनसीपी और बीएसपी, त्रिपुरा में कम्युनिस्टों और सबसे ताजातरीन उदाहरण कर्नाटक में देवगौडा की जेडीएस का है।

इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है कि राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस को सपा-बसपा और दूसरे स्वतंत्र समूहों को गठबंधन में साथ लाना चााहिए। इसे उन्हें दार्शनिक और वैचारिक समर्थन देना चाहिए बल्कि उन्हें हमले की अगली कतार में रखना चाहिए। महत्वपूर्ण राज्यों जैसे यूपी, बिहार और पश्चिमी बंगाल में कांग्रेस को इन क्षेत्रीय दलों को भाजपा को चुनौती देने में तैनात कर देना चाहिए।

ऐसा राजनीतिक-सामाजिक गठजोड़ कांग्रेस को 200 सीटें दिलवाने में मदद करेगा जहां पर वह भाजपा से सीधे मुकाबले में है।

(लेखक बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के राजनीतिक सलाहकार हैं।)