गोरखपुर में दलितों पर टूटा पुलिस का कहर, पैरवी करने पर दी पूर्वांचल सेना नेता को धमकी

आईएनएन भारत डेस्क
गोरखपुरः गगहा थाने के अस्थौला गांव में मंगलवार को दलित समुदाय के लोगों को पहले दबंग अगड़ों की गुड़ागर्दी और बाद में पुलिस के कहर का सामना करना पड़ा। बाताया जाता है कि पूरा मामले गांव की अगड़ी दबंग जाति के एक व्यक्ति द्वारा पंचायत की जमीन को कब्जाने की घटना से शुरू हुआ। कब्जा करने वाले को प्रधान और प्रधान प्रतिनिधि का नजदीकी बताया जाता है।

काफी पहले से ही इस मामले की शिकायत पुलिस को की गई थी परंतु ना ही पुलिस और ना ही राजस्व विभाग ने कुछ किया। और अब इस अवैधा निर्माण का विरोध करने पर जो नजारा गांव के दबंगों ने पेश किया वह योगी राज में ठाकुरशाही का एक और नमूना है। इसके अलावा शान्ति कायम करने और कानून व्यवस्था बनाने के नाम पर जो कहर पुलिस ने बरपाया वह किसी की भी रूह कंपा देने वाला है।

मामले को रफा दफा करेन के लिए थानाध्यक्ष ने गांव के दलितों को थाने में बुलाया और उनके उपर कहर बरपा कर दिया। पुलिस इसे गांव वालों का उपद्रव बताकर इस घटना के शिकार दलितों पर ही ररसुका लगाने की धमकी भी दे रही है। लगता है सहारनपुर के बाद योगी पुलिस को दलित दमन का नया फार्मूला हाथ लगा गया है। पहले हमला करो फिर दोषी बताकर रासुका ठोक दो। यदि गांव वाले दलित ही दोषी हैं तो सवाल यह उठता है कि बुरी तरह घायल भी दलित ही क्यों हैं।

ग्रामीणों के साथ मारपीट, दुर्व्यवहार और पिकअप में भेड़-बकरियों की तरह ठूस कर लाया गया

इन घायलों में बड़े ही नही 12 वर्षीय बालक भी शामिल है। कल किसी दलित परिवार के नवजात को मारकर भी योगी पुलिस की ठाकुरशाही उसे उपद्रवी और दोषी बता सकती है अथवा उस पर रासुका भी लाद सकती है। योगी पुलिस सिद्ध करना चाह रही है कि दलित घर में जन्म लेना ही अपराधी होना है।

पुलिस ने ना केवल बर्बर तरीके से दलित लोगों को पीटा बल्कि कुछ समाचार पत्रों के अनुसार 35 राउंड गोली भी चजलाई और आरोप है कि बुरी तरह से घायल तीनों ग्रामीण पुलिस की ही गोली से घायल हुए हैं। हालांकि एडीजी जोन दावा शेरपा ने पुलिस द्वारा गोली चलाने से साफ इंकार किया है। उन्होंने कथित रूप से बांसगांव के उप जिलाधिकारी और क्षेत्रधिकारी को घटना की जांच कर 48 घंटे में रिपोर्ट देने का आदेश दिया है।

इस मामले में 10 नामजद सहित पुलिस ने 250 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया है। 27 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। घटना के बाद अस्थौला गांव पहुंचे जिलाधिकारी के. विजयेंद्र पाण्डियन ने सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा होने पर हल्का लेखपाल को कड़ी फटकार लगाई है। उन्होंने घटना की मजिस्ट्रेटी जांच का आदेश दिया है। जांच रिपोर्ट के आधार पर जिलाधिकारी ने हल्का लेखपाल सहित अवैध कब्जे के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई करने की बात कही है। एसएसपी शलभ माथुर ने बताया कि उपद्रव करने वालों को चिह्न्ति किया जा रहा है। उनके विरुद्ध रासुका की कार्रवाई की जाएगी। वैसे कह पाना मुश्किल है कि यह कार्रवाई है अथवा दलित परिवारों को खुली पुलिसिया धमकी।

गोली लगने से अस्थौला गांव के जीत्तू (60), भोलू (18) और दीपक (12) घायल हैं। मेडिकल कालेज में उनका इलाज चल रहा है। डाक्टरों ने दीपक को पिस्टल या रिवाल्वर की गोली लगने तथा दो अन्य घायलों को 12 बोर का छर्रा लगने की पुष्टि की है।

घायलों को देखने के लिए बसपा-सपा के प्रतिनिधिमंडल अस्पजताल में आये थे। जिन्होंने घायलों से मिलकर पूरी घटना का ब्योरा लिया और प्रशासन से मांग करते हुए कहा कि दोषी पुलिसकर्मियों के उपर तुरंत कार्रवाई की जाए।

पूर्वांचल सेना के नेता के साथ पुलिस की बदतमीजी

इस मामले में दलित परिवारों की पैरवी कर रहे और उनके साथ हर समय खड़े पूर्वांचल सेना के नेता धीरेन्द्र प्रताप से भी पुलिस ने सीजेएम कोर्ट परिसर में बदतमीजी की।

धीरेन्द्र प्रताप ने बताया कि आज पुलिस ने मुझे सीधी धमकी दी वो मेरी आवाज भी बंद करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि आज गगहा थाना कांड में गिरफ्तार किए गए ग्रामीणों के साथ मारपीट, दुर्व्यवहार और पिकअप में भेड़-बकरियों की तरह ठूस कर लाए जाने की सूचना पाने के बाद हम लोग ग्रामीणों से मिलने सीजेएम कोर्ट पहुँचे, वहाँ मौजूद पुलिसकर्मी मेरे कंधे पर नीला गमछा देख भड़क गए और मुझे घेरकर पकड़ लिया। उनमे से एक सादी वर्दी में मौजूद पुलिसकर्मी जिसकी फोटो मेरे पास है, ने मुझे इसी मुकदमे में अभियुक्त बनाने की बात कहते हुए मेरा हाथ पकड़कर मुझे खींचने लगा। तभी वहाँ कई अधिवक्ता बंधु पहुँच गए और इसका विरोध किया और तब जाकर पुलिस ने मुझे छोड़ा।

-पुलिस के इस व्यवहार से सवाल यह उठता है कि जब पुलिस इतनी पाक साफ है तो पीड़ितों की पैरवी करने वालों को निशाना क्यों बना रही है।

-जब जमीन कब्जा करने की शिकायत काफी पहले पुलिस को दी गई थी तो उसने इस शिकायत पर आज तक कार्रवाई क्यों नही की।

-थानाध्यक्ष ने दलित शिकायतकर्ताओं को थाने में बातचीत के लिए क्यों बुलाया। जमीन कब्जा करने वालों को गिरफ्तार करने की कर्रवाई क्यों नही की।

-जब पुलिस ने गोली नही चलाई तो अपने अलग अलग बयानों में पुलिस अधिकारी असलहा अथवा कारतूस खत्म होने की बात क्यों कह रहे हैं।