औरंगाबाद हिंसा पुलिस की लापरवाही और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का नतीजा

आईएनएन भारत डेस्क
शुक्रवार और शनिवार को मराठवाडा क्षेत्र के औरंगाबाद में हुई हिंसा पुलिस प्रशासन की लापरवाही और सांप्रदायिक दलों के ध्रुवीकरण का परिणाम है। इस हिंसा में दो लोग मारे गये और 30 से अधिक घायल हो गये थे। औरंगाबाद में अभी पुलिस शान्ति और कानून व्यवस्था नियंत्रण में होने का दावा कर रही है।

हाल की हिंसा की शुरूआत अवैध पानी के कनेक्शन को काटने को लेकर शुरू हुई और बाद में शहर के कईं हिस्सों में फैल गई। अवैध नल के कनेक्शनों को काटने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। जिसमें दावा किया गया कि एक समुदाय विशेष को निशाना बनाकर नल कनेक्शन काटे जा रहे हैं। उसके बाद पानी भरने के समय दो समूहों में कहासुनी हुई और बात इतनी बढ़ी की इलाके में इसने दो समुदायों की आपसी झड़प का रूप ले लिया। जिसके बाद तनावग्रस्त इलाके में पथराव और आगजनी का रूप ले लिया।

दरअसल इस तनाव की शुरूआत होने और हिंसा का रूप ले लेने के समय औरंगाबाद में पुलिस नादारद थी। हालांकि अब पुलिस स्थिति नियंत्रण में होने का दावा कर रही है। वैसे पूरे प्रकरण में जो दो लोग मारे गये बताया जाता है कि वे दोनों ही पुलिस की गोली का शिकार हुए हैं। पुलिस दावा कर रही है कि उसने प्लास्टिक बुलैट्स का इस्तेमाल किया था परंतु वह गोली संवेदनशील अंग पर लगने से एक चाय वाले और एक 17 वर्षीय जवान की मौत हो गयी।

पुलिस के तमाम दावों के बावजूद यह ध्यान रहे कि शहर के पुलिस कमिश्नर का पद खाली पड़ा है और पुलिस आईजी भाबंरा कार्यवाहक कमिश्नर के रूप में इस दायित्व को देख रहे हैं। उसके बाद भी पुलिस शान्ति और कानून व्यवस्था के नियंत्रण में होने और अपने दायित्व के निर्वाह की बात कर रही है।

वैसे पानी के कनैक्शनों तो एक तात्कालिक मुद्दा है परंतु यहां तनाव पहले से बना हुआ है। रामनवमी के मौके पर दो महीने पहले भी यहां सांप्रदायिक तनाव बन गया था और शहर हिंसा की चपेट में आ गया था। तभी से यह तनाव लगातार बना हुआ है और विभिन्न सांपद्रायिक समूह इस तनाव को बढ़ाकर अपना राजनीतिक फायदा उठाने की फिराक में हैं।

असल में इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रमुख कारणों में औरंगाबाद नगर निगम का सीटों का गणित है। यहां पर जहां किसी भी दल को बहुमत हासिल नही है तो वहीं सबसे बड़ी दो पार्टियां शिवसेना और औवेसी की एआईएमआईएम है। भाजपा तीसरे स्थान पर है। अब तीनों दलों का यह गणित आगामी चुनावों के मद्देनजर ध्रुवीकरण की जरूरतों को जन्म देता है।

इसके अलावा जनवरी में कोरेगांव की घटना के बाद दलित उभार के कारण हुई हिंसा की चपेट में आने वाले शहरों में औरंगाबाद भी प्रमुख था। अब हिंदू सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के उपर निर्भर करने वाले दलों के लिए यह एक खतरे का संकेत था। यदि जनवरी वाला सामाजिक ध्रुवीकरण आगे बढ़ता और दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ की शक्ल में सामने आता तो जाहिर है अगले चुनावों में भाजपा-शिवसेना की सीटों में ना केवल भारी गिरावट आती बल्कि वह दोनों सता से बाहर हो जाती। इसीलिए यहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करना और उनसे दूर हो रहे दलित मतदाताओं को हिंदू बनाना जरूरी था। जिसका परिणाम औरंगाबाद की ताजा हिंसा में साफ दिखाई पड़ रहा है और पुलिस की अंतिम समय तक विवाद से दूरी भी इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की योजना की पुष्टि करती है।