नीले कफन में हुआ सचिन वालिया का अंतिम संस्कार, उमड़ा जनसैलाब, हत्यारों की सुरक्षा में तैनात पुलिस बल

आईएनएन भारत डेस्क

सहारनपुर के गांव रामनगर में भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया के भाई सचिन वालिया का अंतिम संस्कार भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बीच हो गया। सचिन का शव नीले कफन में लिपटा जब अंतिम संस्कार के लिए आगे बढ़ा तो जय भीम, जय भीम और सचिन के हत्यारों को फांसी दो के नारे लगाते हुए एक जनसैलाब उस शहीद के शव के पीछे उमड़ पड़ा। अंतिम संस्कार होने तक भीम आर्मी के समर्थन में भारी संख्या में औरतें भी अंतिम समय तक सड़कों पर डटी रही।

सचिन को गोली मारे जाने को लेकर पुलिस की अजीबो गरीब थ्योरी से खफा भीम आर्मी समर्थकों और कमल वालिया के परिजनों ने हत्यारों को पकड़े जाने से पहले शव का पोस्टमार्टम करवाने से साफ इंकार कर दिया था। उसके बाद सचिन का शव मोर्चरी में रखा दिया गया जिसे घेरकर भीम आर्मी के कार्यकर्ता और समर्थक वहीं धरने पर डट गये। पुलिस अधिकारी सचिन के परिजनों को समझाने और पोस्टमार्टम करवाने को लेकर मशक्कत करते रहे। रात को तीन बजे पुलिस अधिकारी किसी तरह सचिन वालिया के परिजनों को समझाने में कामयाब हुए। इसके बाद पोस्टमार्टम किया गया और सुबह शव को लेकर जैसे ही एम्बुलेंस सचिन के गांव में दाखिल हुई गांव में कोहराम मच गया।

शव के गांव में आने के इंतजार में आसपास के हजारों लोग और भीम आर्मी समर्थक गांव में एकत्र हो चुके थे। पुलिस सचिन के शव को सफेद कपड़े में लपेटकर लायी थी परंतु भीम आर्मी ने परंपरागत सफेद रंग को नकार कर शव को नीले कपड़े में लपेटा और फिर नीले रंग के कफन में लिपटे सचिन की अंतिम यात्रा शुरू हुई तो आक्रोश और गुस्से से भरे दिलों से जय भीम और सचिन के हत्यारों को फांसी दो के नारे आसमान में गूंज उठे।

शव के अंतिम सफर पूरा कर लेने और अंतिम संस्कार हो जाने तक गांव और आसपास के गांव की भीम आर्मी की महिलाएं सड़क पर रूकी रही और सचिन के हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग करती रही। सचिन के शव को मुखाग्नि भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष और सचिन के बड़े भाई कमल वालिया ने दी।

सचिन वालिया के अंतिम संस्कार के बाद भी गांव में भारी सुरक्षा के इंतजाम पुलिस ने किये हैं। दलित बहुल इस गांव में पुलिस के इंतजाम को देखकर साफ कहा जा सकता है कि पुलिस हत्यारों और उनके परिजनों की सुरक्षा के लिए गांव में है। यदि उसे कभी भी दलित परिवारों की सुरक्षा की चिंता होती तो एक मासूम नौजवान की इस तरह पुलिस की मौजूदगी में हत्या नही हुई होती। इसके अलावा पुलिस की सचिन की हत्या की थ्योरी भी पुलिस की भूमिका को संदिग्ध बना रही है। भारी पुलिस इंतजाम के बीच गोली चली और सचिन की हत्या हो गयी परंतु पुलिस को पता नही कि गोली कैसे चली और किसने चलाई। मगर पुलिस को यह पता है कि यह मौत संदिग्ध हालात में हुई है। पुलिस के सामने साफ है कि यह महाराणा प्रताप की जयंती का वही जश्न है जिस पर पिछले साल दलितों पर हमला हुआ था और उनके घरों को फूंका गया था। परंतु सजा घर जलाने वालों को नही उनको दी जा रही है जिनके घर जले और जो उनके लिए न्याय के लिए लड़ने के लिए आगे आये। चन्द्रशेखर रावण पर रासुका इसका जिंदा सबूत है। अब पुलिस अपनी कोई थ्योरी देकर कह सकती है किसी बंदूक से अपने आप गोली चल गई और सचिन वालिया दुर्घटनावश मारा गया।

पुलिस ने जिस प्रकार गत वर्ष राजपूत जाति के नये नेता के रूप में उभर रहे शेर सिंह राणा और उसके गिरोह का बचाव किया उससे पुलिस की भूमिका संदिग्ध ही नही शर्तिया एक पक्षीय है। शेर सिंह राणा के गत वर्ष भी घटनास्थल पर होने के कई प्रमाण थे और उसने ही राजपूत नौजवानो को भडकाकर दलितों के घरों पर हमले करवाये थे और अबकी बार भी वही शेर सिंह राणा पूरे इस हत्याकाण्ड के पीेछे है। इस आशय की कई रिपोर्ट गत वर्ष विभिन्न स्वतंत्र जांच टीमों और पत्रकारों ने उजागर की और प्रकाशित भी की थी। फूलन देवी की हत्या के अभियुक्त और जमानत पर बाहर आकर नये हत्याकाण्ड़ों की रचना करने वाले व्यक्ति को बचाने में ठाकुरशाही की मंशा क्या है और इसके पीेछे कौन सी शक्ति है जो इन हत्यारों को बचा और बढ़ा रही है। ऐसे कईं सवाल हैं जिनके जवाब यूपी में काबिज ठाकुरशाही को देने हैं।