कर्नाटक में एक हारी हुई लड़ाई लड़ रही है भाजपा

कर्नाटक में जैसे जैसे मतदान का दिन करीब आ रहा है चुनावी गर्मी और नेताओं की बयानबाजी लगातार तेज हो रही है। पूरे चुनाव प्रचार का सबसे दुखद पहलू इसमें नेताओं द्वारा लगातार किये जा रहे निम्न स्तर के आरोप प्रत्यारोप है। परंतु इस स्तरहीन बयानबाजी का सबसे अफसोस जनक पहलू यह है कि इस निकृष्टतम जुमलेबाजी की शुरूआत करने वाला और इसे सबसे अधिक हवा देने वाला और कोई नही स्वयं देश के प्रधानमंत्री हैं। यदि देश का प्रधानमंत्री ही इस स्तर पर आकर आरोप प्रत्यारोप करने लगे तो फिर राजनीति का स्तर क्या रहने वाला है। अब मोदी के भाषणों में से विकास निकलकर भाग गया लगता है और मंहगाई, भ्रष्टाचार पर लगाम देश की जनता और भाजपा दोनों के लिए दिवास्वपन बनकर रहे गये तो रोजगार पकौडे बेचने लगा है। कालाधन माल्या, छोटे मोदी और मेहुल की शक्ल में स्थायी रूप से विदेश में जाकर बस गया लगता है।

दरअसल, प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों की जिस प्रकार की बयानबाजी और आरोप प्रत्यारोप कर्नाटक चुनावों में हो रहे हैं उससे साफ जाहिर है कि यह भाजपा की तय चुनावी हार के कारण पैदा हुई हताशा के सिवाय कुछ भी नही है। कर्नाटक में भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी और उनके पास येदियुरप्पा को छोड़कर मुख्यमंत्री पद का कोई दावेदार नही होना पार्टी के लिए सबसे बड़ा संकट है। इसके अलावा कर्नाटक के मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जिस प्रकार लिंगायत को अल्पसंख्यक दर्जा देने का कार्ड खेलकर भाजपा को अपने राजनीतिक जाल में उलझाया है उससे युदियुरप्पा और कमजोर हो गये हैं। असल में येदियुरप्पा की असली ताकत उनका लिंगायत वोट बैंक ही था। जिसमें एक सोची समझी रणनीति के तहत सिद्धारमैया ने जबरदस्त सेंध लगा दी है। लिंगायत समुदाय के 34 से अधिक मठो ने खुले तौर पर कांग्रेस और सिद्धारमैया का समर्थन करने का खुला एलान कर दिया है। जिससे बड़ी संख्या में लिंगायत वोटों के कांग्रेस की तरफ चले जाने की आशंका भाजपा को सता रही है।

इसके अलावा भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर भी भाजपा के पास कहने के लिए कुछ खास नही है। कर्नाटक मे ं35 हजार करोड़ के खनन घोटालों के आरोपी रेड्डी बंधुओं को आठ टिकट देकर भाजपा ने भ्रष्टाचार पर बोलने का ना केवल हक गंवा दिया है बल्कि मध्यम वर्गीय शहरी मतदाताओं के बड़े हिस्से को भी उसने नाराज कर दिया है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार देश भर मंें भाजपा शासित राज्यों में दलितों और अल्पसंख्यकों पर लगातार हमले हो रहे हैं। उससे भाजपा की दलित और अल्पसंख्यक विरोधी एक छवि बनी है। ऐसी स्थिति में कर्नाटक में दलित वोटों का कांग्रेस के पक्ष में लामबंद होना लगभग तय माना जा रहा है तो वहीं अल्पसंख्यक वोटों के कांग्रेस के पक्ष में लामबंद होने में ना भजपा को और ना किसी अन्य को कोई संदेह है।

इस प्रकार बाजी को हाथ से निकलते देखकर भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक नरेन्द्र मोदी की रैलियों की गिनती में भाजपा ने एकदम से इजाफा कर दिया है। पहले जहां भाजपा मोदी की 15 रैलियां करवाने की योजना बना रही थी। अब मोदी को 21 रैलियां करवाने का जिम्मा दिया गया है। दरअसल, भाजपा मोदी की रैलियों से राज्य में चुनाव का नैरेटिव बदलने की कोशिश कर रही है। परंतु वह नैरेटिव बदलने के नाम व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप के अलावा और छोटे स्लोगन नुमा तुकबंदी करने के आलावा कुछ भी ज्यादा कर पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं और अब उनके इन जुमलों को उनके भक्तों के अलावा कोई ज्यादा गंभीरता से लेता नही है। जबकि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया पहले ही चुनावों का एजेंडा तय कर चुके हैं। कर्नाटक सीएम ने यह काम पिछले साल भर से बेहद चालाकी और चपलता के साथ शुरू कर दिया था।

कर्नाटक सीएम ही इस चुनाव प्रचार का एजेंडा सेट करने वाले और मुख्य खिलाड़ी हैं यह बात समझने में मोदी और भाजपा को कईं दिन लग गये। इसीलिए पहले उनका निशाना राहुल गांधी पर था परंतु जब कईं दिनों बाद उन्हें असली खिलाडी की पहचान हुई तो उन्होंने अब सिद्धारमैया को निशाना बनाना शुरू किया है। ना केवल मोदी बल्कि पूरी भाजपा अब सिद्धारमैया को निशाने पर ले रही है। भाजपा के इस रणनीतिक बदलाव को समझकर ही सिद्धारमैया ने भी भाजपा और मोदी सहित सभी नेताओं को मानहानि का नोटिस भेजकर भाजपा को उसी की भाषा में जवाब दिया है। इससे पहले यह मानहानि का अस्त्र अक्सर भाजपा के नेता यथा अरूण जेटली और नितिन गडकरी अजमाते रहे हैं।

अभी तक के जितने मतदान पूर्व सर्वे आ रहे हैं वह भी कांग्रेस को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में पेश करने लगे हैं। परंतु उनका आंकलन बेहद मशीनी और सिद्धारमैया के लिंगायत दांव से पहले का जान पड़ता है। मशीनी इसलिए कि वह भाजपा के वोट प्रतिशत को पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा और युदियुरप्पा की पार्टी के वोटों को बेहद मैकेनिकल ढ़ंग से जोड़कर दिख रहे हैं और दूसरी बडी पार्टी के रूप में पेश कर रहे हैं। जबकि सिद्धारमैया के लिंगायत दांव के बाद यदि चैथाई लिंगायत वोटों का रूख भी कांग्रेस की तरफ मुड़ता है जिसकी पूरी संभावना है, तो भाजपा के पुराने वोटों में चार से पांच प्रतिशत का नुकसान होगा और कांग्रेस के वोटों में इजाफा होगा। इस प्रकार भाजपा जहां 30 प्रतिशत से नीचे आ सकती है तो वहीं कांग्रेस अपने पुराने 37 प्रतिशत वोटों में इजाफा कर सकती है। जिससे चुनावी नतीजों का रूख पूरी तरह से कांग्रेस के पक्ष में घूम जायेगा।

इसके अलावा केन्द्र में 2019 में किसकी सरकार होगी यह भी कर्नाटक चुनावों में एक कारक होगा। इसीलिए अब अमित शाह कर्नाटक में चुनाव लड़ते लडते अचानक तो यह दावा बेवजह नही करेंगे कि उन्हें 2019 में 50 प्रतिशत वोट पूरे देश में मिलेंगे। क्योंकि अब जहां भी चुनाव या उप चुनाव हो रहे हैं भाजपा के वोटों में भारी गिरावट हो रही है और गोरखपुर जैसे अजेय गढ़ को हारने के बाद मतदाताओं में यह संदेश साफतौर पर चला जा रहा है कि 2019 में भाजपा का जाना तय है तो अब ऐसी स्थिति में अमित शाह अपने वोटरों और कैडर को यह संदेश देकर उत्साहित करना चाहते हैं कि 2019 में उन्हें 50 प्रतिशत वोट मिलेगा और केन्द्र में उनकी ही सरकार बनेगी। कुल मिलाकर मोदी की विरोधियों पर तंजकशी वाली जुमलेबाजी और बेबुनियाद आरोप प्रत्यारोप के अलावा उनके भाषणों में कुछ बाकी बचा नही है जिसे देखकर साफ कहा जा सकता है कि कर्नाटक में भाजपा ने बेशक अपना पूरा केन्द्रीय कैबिनेट और केन्द्रीय लाव लश्कर झौंक दिया है लेकिन उसके पास जनता को देने के लिए जुमलेबाजी के अलावा कुछ है और इस बात को जितना समझती है उतना ही भाजपा का नेतृत्व भी जाना है। इसीलिए जैसे जैसे चुनाव का दिन नजदीक आता जाता है भाजपा नेताओं की जुमलेबाजी तंजकशी से विषैली होती जाती है। लगता है यह बयानबाजी उनकी संभावित हार को समझकर हो रही हताशा और बौखलाहट का नतीजा है और भाजपा समझ रही है कि वह कर्नाटक में एक हारी हुई लड़ाई लड़ रही है।