जिन्ना, सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की इस दोस्ती को क्या नाम दें

महेश राठी
श्यामा प्रसाद मुखर्जी और मोहम्मद अली जिन्ना भारतीय इतिहास के ऐसे दो नाम हैं जिनमें आजादी से पहले स्पर्धा कम और दोस्ती ज्यादा दिखाई देती है और आजादी के बाद भगवा राजनीतिक दोनों को एक दूसरे का दुश्मन बनाकर पेश करती है। असल में आजादी से पहले दोनों के बीच ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए वफादारी का एकसमान एक बिंदू था जो दोनों को जोड़े रखने में सक्षम था। जिन्ना को देश में प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि वह भारत के विभाजन के कारण थे और श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर को देश में देशभक्त और महापुरूषों के रूप में पेश किया जाता है। जबकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सावरकर और जिन्ना की मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति में कोई ज्यादा अंतर नही था।

 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और उनके कृत्यों का विश्लेषण करें तो वह ना केवल अंग्रेजों की तरफ झुकाव वाला बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की राह में गतिरोध खडा करने वाला दिखाई देता है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी जिन्ना की तरह अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत कांग्रेस से की थी। वह कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर पहली बार बंगाल प्रांतीय परिषद के सदस्य चुने गये थे। उसके बाद वह आगे चलकर 1939 में सावरकर के प्रभाव में आकर हिंदू महासभा के साथ जुड गये। श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर को भाजपा और संघ के नेता महान राष्ट्रवादी नेता के तौर पर पेश करते हैं। परंतु यदि भारतीय स्वतंत्रता संगाम में उनकी भूमिका को देखें तो किसी भी तरह से जिन्ना से कम विवादास्पद नही थी बल्कि कईं अर्थों में वह जिन्ना से भी विवादास्पद और अंग्रेज परस्ती की दिखाई पड़ती है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का उन्होंने जमकर विरोध किया यहां तक बंगाल के गवर्नर जाॅन हरबर्ट को 26 जुलाई 1942 को एक पत्र लिखा और उसमें गांधी और कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध करते हुए उसे विफल बनाने के लिए भरपूर सहयोग देने का वादा भी किया था। उन्होंने अपने पत्र में साफ लिखा था कि आपके मंत्री हाने के नाते हम भारत छोड़ों आंदोलन को विफल करने के लिए पूरा सक्रिय सहयोग करेंगे।

 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी केवल इतने पर ही नही ठहरे बल्कि जब गांधी और कांग्रेस करो या मरो के नारे के तहत अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन चला रहे थे उस समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी सावरकर के साथ मिलकर अंग्रेजों का सहयोग कर रहे थे। कांग्रेस और गांधी ने अंग्रेजों द्वारा भारत को दूसरे विश्व युद्ध में शामिल करने की घोषणा का विरोध किया तो वहीं सावरकर पूरे भारत में घूमकर अंग्रेजी फौज में भारतीयों को भर्ती होने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जाहिर है बंगाल के वित्तमंत्री और भाजपा और संघ के आदर्श नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी इसमें शामिल थे। वास्तव में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत छोड़ों आंदोलन के विरोध का कारण सावरकर द्वारा सभी हिंदू महासभा सदस्यों को लिखे गये पत्र का जवाब था जिसमें उन्होंने गांधी द्वारा पद त्याग का विरोध करते हुए लिखा था कि अपने पद पर बने रहो। सावरकार का यह प्रसिद्ध पत्र “स्टिक टू दि पोस्ट” नाम से मशहूर है।

 

इस से भी शर्मनाक स्थिति वह थी कि जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस देश को आजाद करवाने के लिए आजाद हिंद फौज के साथ जान की बाजी लगा रहे थे तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी मुस्लिम लीग के नेतृत्व में बंगाल में बनी सरकार के उप प्रधानमंत्री (उप मुख्यमंत्री) थे। वहीं दूसरी तरफ नेताजी देश को नारा दे रहे थे कि तुम मुझे खुन दो और मैं तुम्हे आजादी दूंगा तो दूसरी तरफ मुस्लिम लीग और संघ-हिंदू महासभा मिलकर ब्रिटिश फौज के लिए भर्ती कैंप चला रहे थे।

 

इसके अलावा जिन्ना, सावरकर और श्यामा प्रसाद की दोस्ती और सहयोग का सबसे अनौखा उदाहरण 1939 में दिखाई देता है। अंग्रेजों द्वारा भारत को दूसरे विश्व युद्ध में शामिल करने की घोषणा पर 1939 में गांधी के आहवान पर कांग्रेस के विधायकों ओर मन्त्रियों ने अंतरिम सरकार के अपने पदों से इस्तीफा दे दिया तो जिन्ना ने इस पर खुशी जाहिर करते हुए इसे मुक्ति का दिन बताया और इस मुक्ति के दिन में मुखर्जी ने मंत्री पद छोडने की अपेक्षा कांग्रेस छोड़कर जिन्ना की खुशी में शामिल होकर मुस्लिम लीग सरकार में साझेदारी करना बेहतर माना था। ध्यान रहे कि जहां श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस मुक्ति के दिन का समारोह मनाते हुए मुस्लिम लीग सरकार में शामिल हो रहे थे तो वहीं अब्दुर रहमान सिदद्की नामक एक ऐसे लीगी मुस्लिम नेता भी थे जिन्होंने जिन्ना की घोषण का विरोध करते हुए लीग की वर्किंग कमेटी से इस्तीफा दे दिया था और जिन्ना की घोषणा को राष्ट्रीय गरिमा का अपमान और अंग्रेजों की चाकरी बताया था। परंतु राष्ट्रवादी नेता मुखर्जी और सावरकर को इसी चाकरी में राष्ट्रवाद दिखाई पड़ रहा था।

 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकार एवं उनकी हिंदू महासभा और बाद में मुखर्जी द्वारा स्थापित जनसंघ जोकि बाद में चलकर भाजपा के गठन का आधार बनी हमेशा कांग्रेस और गांधी एवं नेहरू पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाते रहे। परंतु सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत के बंटवारे और पाकिस्तान की मांग करने वाली मुस्लिम लीग के साथ मिलकर भाजपा के आदर्श नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी सत्ता का आनन्द लेते हैं। बंगाल में बनी मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के गठजोड़ वाली सरकार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी वित्तमंत्री, उप मुख्यमंत्री रहे। इस सरकार के मुख्यमंत्री फजुल हक थे जो बाद में भारत के बंटवारे और पाकिस्तान निर्माण की लड़ाई का एक हिस्सा थे, जो बाद में चलकर एक समय में पाकिस्तान के गृहमंत्री भी रहे। इसके अलावा भारत के बंटवारे के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को लेकर भी सबसे अधिक उत्साहित श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर ही थे। ध्यान रहे वह सावरकर ही थे जिन्होंने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत दिया था। यहां तक कि मुखर्जी ने तो 1944 में कलकता की एक रैली में सार्वजनिक तौर पर भारत के विभाजन का समर्थन कर दिया था। इसके अलावा उन्होंने 2 मई 1947 को लार्ड माउंटबेटन को एक गुप्त पत्र लिखते हुए यहां तक कह दिया था कि भारत का विभाजन अगर नही भी हो पाता है तो बंगाल का विभाजन तो होना ही चाहिए। इसके अलावा श्यामा प्रसाद, सावरकर की हिंदू मुस्लिम महासभा सिंध प्रांत की गुलाम हुसैन हिदायतुल्ला के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग सरकार में शामिल थी और देश में सबसे पहले इसी सरकार ने अपनी असेंबली में पाकिस्तान के निर्माण का प्रस्ताव पारित करवाया था और इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद भी राष्ट्रवादी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर की हिंदू महासभा सरकार में बनी रही थी।

 

वास्तव में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय बहुलतावादी संस्कृति के विपरीत एक जातिवादी, सांप्रदायिक और पक्के ब्राहमणवादी नेता थे। इसका सबसे बड़ा प्रमाण भारतीय संविधान निर्माण के समय हिंदू कोड़ बिल का विरोध किया था। हालंकि वे जब तक नेहरू सरकार में मंत्री रहे उन्होंने इसके बारे में कुछ नही कहा था परंतु 1951 में मन्त्रिमण्डल छोडने के बाद उन्होंने हिंदू कोड़ बिल को हिंदू समाज को छिन्न भिन्न करने वाला बताकर इसका विरोध किया। उनका कहना था कि यह हिंदू समाज की बुनियाद और उसकी विवाह संस्था को खत्म कर देगा। साथ ही यह हमारे धर्म के स्वाभाविक स्रोत को नष्ट कर देगा। इसके अलावा 1943-44 के बंगाल अकाल के राहत कार्यो में भी उनकी हिंदू महासभा पर राहत कार्यो में भेदभाव के आरोप लगे थे। बंगाल सरकार के गुप्तचर विभाग के अलावा उस समय के दि हिंदू के रिपोर्टर टी जी नारायणन और प्रसिद्ध चित्रकार चितोप्रसाद ने भी इस प्रकार की रिपोर्ट की थी। ना केवल राहत कार्यो में भेदभाव बल्कि बंगाल सरकार द्वारा उस समय चालाई जा रही कैंटीन पर भी मुखर्जी और उनकी हिंदू महासभा को आपति थी क्योंकि उसमें खाना पकाने और उसके वितरण का काम अल्पसंख्यकों और दलितों के पास था।

 

इस प्रकार के ब्राहमणवादी, सांप्रदायिक, जातिवादी और अंग्रेजों की चाकरी करने वाले नेता को आज भारतीय समाज के आदर्श के रूप पेश किया जा रहा है। अंग्रेजो की चाकरी का श्यामा प्रसाद मुखर्जी का एक और गजब का उदाहरण तब का है जब वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के उप कुलपति थे। उन्होंने उस समय कुछ छात्रों को विश्वविद्यालय से बर्खास्त कर दिया था। और भाजपा-संघ के राष्ट्रवादी नेता ने यह इसलिए किया क्योंकि उन छात्रों ने ब्रिटिश झण्ड़े यूनियन जैक को सम्मान नही देने का गुनाह किया था। अब श्यामा प्रसाद मुखर्जी कैसे सहन कर सकते थे कि उनके मालिकों के झण्ड़े को कुछ गुस्ताख लड़के सम्मान ना दें। आखिरकार वह अंग्रेजो के खास और सम्मान प्राप्त बाप सर आशुतोष मुखर्जी के बेटे जो थे।