सुप्रीम कोर्ट की बंद दीवारों के पीछे थम नही रहा है तूफान, पत्र लिखकर दो जजों ने की फुल कोर्ट की मांग

आईएनएन भारत डेस्क

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की बंद दीवारों और दीवारों के बाहर लगता है कि तूफान थमने का नाम नही ले रहा है। विपक्षी दलों का महाभियोग नोटिस खारिज होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ जजों ने पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के भविष्य पर चर्चा के लिए फुल कोर्ट बुलाने की मांग कर डाली है। और इस पूरे प्रकरण में चीफ जस्टिस का रवैया ना केवल उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है बल्कि विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जजों के आरोपों को बल प्रदान कर रहा है। अब यह आम चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर चीफ जस्टिस के अडियलपने और मनमानेपन और अलोकतांत्रिक व्यवहार की कुछ तो वजह होगी। कुछ तो है जिसकी पर्देदारी है।

अभी कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों की ओर से चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ दिए गए महाभियोग नोटिस को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू द्वारा खारिज किए जाने की चर्चा धीमी भी नही पड़ी थी कि सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ जजों ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर फुल कोर्ट बुलाने की मांग कर डाली है। वास्तव में सरकार और माननीय चीफ जस्टिस जिस मसले को इतना आयान समझ रहे थे कि रोस्टर पर चीफ जस्टिस को सारे अधिकार दिलवाने और सीनियर जजों की अनदेखी करके और ऐसे मामले को वरिष्ठतम जज से छीनकर मन माफिक फैसला करवा लेना जिसमें वह खुद संदेह के दायरे में थे। यह सब इतना आयान है नही और विद्वान जज जो न्यायपालिका को बचाने और पूरे लोकतंत्र को बचाने का इशारा देकर मीड़िया और जनता के सामने आये थे, लगता है वह भी न्यायपालिका की आजादी को लेकर कमर कस चुके हैं। आने वाले दिन चीफ जस्टिस के लिए उतने आसान रहने वाले नही हैं और ना ही सरकार की मर्जी और नियंत्रण से न्यायपालिका चलने वाली है। जजों ने जब संवाददाता सम्मेलन में अपनी बात रखी थी तो तभी कह दिया था कि हम नही चाहते कि आने वाली पीढ़ियां हमें इस तरह याद रखें कि जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा था तो हम खामोश थे।

अब इसी पूरे घटनाक्रम को देखकर लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों ने आगे की पीढ़ियों को सकारात्मक जवाब देने और राह दिखाने का मन बना लिया है इसीलिए महाभियोग खारिज होने के दो दिन बाद शीर्ष अदालत के दो वरिष्ठ जजों ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर फुल कोर्ट बुलाने की मांग की है। जस्टिस रंजन गोगोई और मदन बी लोकुर ने चीफ जस्टिस को लिखे पत्र में सर्वोच्च न्यायालय के भविष्य और संस्थागत मुद्दों पर चर्चा के लिए फुल कोर्ट में बहस की मांग की है। पत्र में जजों ने लिखा है कि हमें सांस्थानिक मुद्दों और अदालत के भविष्य पर विचार करने की जरूरत है। हालांकि, वरिष्ठ जजों के इस पत्र का चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। मालूम हो कि जस्टिस दीपक मिश्रा इस साल अक्टूबर में रिटायर हो रहे हैं और उनके बाद वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस रंजन गोगोई देश के प्रधान न्यायाधीश का पद संभाल सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम के सदस्य जस्टिस गोगोई और लोकुर दोनों ने चीफ जस्टिस को लिखे अपने पत्र में संवैधानिक और संस्थागत मुद्दों पर चर्चा के लिए फुल कोर्ट के गठन की मांग की है। प्राप्त समाचारों के अनुसार 23 अप्रैल को भी सुप्रीम कोर्ट में चाय पर चर्चा के दौरान कुछ जजों ने फुल कोर्ट का मामला उठाया था, लेकिन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इसको लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई। न्यायपालिका से जुड़े सार्वजनिक महत्व के गंभीर मुद्दों पर चर्चा के लिए सुप्रीम कोर्ट की फुल कोर्ट यानी सभी जजों की बैठक बुलाई जाती है।

इससे पहले 9 अप्रैल को जस्टिस कुरियन जोसफ ने भी चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर कॉलेजियम की सिफारिशों पर सरकार के रवैये पर कदम उठाने की मांग की थी। अपने पत्र में जोसफ ने सात जजों की बेंच बनाकर जजों की नियुक्ति को लेकर कॉलेजियम की सिफारिशों पर सुनवाई की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस के एम जोसफ और इंदु मल्होत्रा की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति की सिफारिश की है, लेकिन सरकार की तरफ से इसे मंजूरी नहीं दी गई। जिसपर जस्टिस कुरियन जोसेफ ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर विरोध जताया था।

सुप्रीम कोर्ट के कामकाज और चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यशैली के विरोध में शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठ जजों ने जनवरी में मीड़िया से मुखातिब होकर सुप्रीम कोर्ट में केसों के आवंटन में पारदर्शिता न होने का आरोप लगाया था। यह अपने आप में सुप्रीमा कोर्ट के इतिहास में एक दुर्लभ क्षण था। वरिष्ठ जजों ने मीड़िया में जज लोया की मौत के मामले में चीफ जस्टिस के रुख को लेकर भी सवाल उठाये थे। जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक तरह से काम नहीं कर रहा है और अगर ऐसा चलता रहा तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व में सात विपक्षी दलों के सांसदों द्वारा दिए गए महाभियोग नोटिस को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने राजनीति से प्रेरित बताते हुए 23 अप्रैल को खारिज कर दिया था।

अब इस पूरे घटनाक्रम के बाद जिस प्रकार की सक्रियता सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जजों ने दिखाई है, उससे लगता है कि आने वाले दिन सुप्रीम कोर्ट में घटनाप्रधान रहने वाले हैं और चीफ जस्टिस के लिए यह दिन उतने आयान नही रहने वाले जितना वह और उनके समर्थन में खड़ी मोदी सरकार मानकर चल रही है।