भारतीय राजनीति के पाखंडवाद का शिकार है माकपाई राजनीतिक पाखंड

भारतीय राजनीति लगातार झूठ और पाखंड का शिकार होती जाउ रही है। पहले वामपंथी दलों से कुछ नैतिकता और सरलता और साफगोई की उम्मीद की जा सकती थी परंतु मौजूदा दौर में वामपंथी दल भी उसी चालू राजनीतिक पाखंड का शिकार हो गये लगते हैं। हाल ही में हैदराबाद में संपन्न माकपा का राष्ट्रीय अधिवेशन इसका जीता जागता सबूत है। इस अधिवेशन में सीताराम येचुरी फिर से महासचिव चुने गये और यह केवल माकपा नही बल्कि समूचे विपक्ष के लिए भी संतोष और खुशी का विषय है।

सीताराम की जीत इसलिए खुशी का विषय है कि वह मोदी सरकार और भाजपा-संघ के खिलाफ व्यापक राजनीतिक संघर्ष और वृहत विपक्षी एकता के हिमायती हैं। वहीं दूसरी तरफ प्रकाश करात का ग्रुप भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी और कांग्रेस से किसी भी प्रकार के गठबंधन नही करने का हिमायती था। परंतु इस अधिवेशन में सीताराम येचुरी किसी हद तक अपनी लाइन मनवाने में सफल रहे हैं। अब सवाल राजनीतिक पाखंड का है। भाजपा-संघ के खिलाफ माकपा ने अपने अधिवेशन में विपक्षी वोटों के नही बंटने और उन्हें एकजुट करने की जरूरत और इसके लिए माकपा द्वारा प्रयास किये जाने को तो माना है परंतु साथ ही कांग्रेस के साथ किसी भी राजनीतिक गठबंधन में नही जाने की भी लाइन ली है। अब यह किस प्रकार का राजनीतिक फैसला है कि आप वोटों का बिखराव रोकने के लिए चुनावी तालमेल तो कर सकते हैं परंतु राजनीतिक गठबंधन से दूर रहेंगे।

क्या संसददीय लोकतंत्र में चुनावी गठजोड़ से बड़ा कोई राजनीतिक गठजोड़ हो सकता है। असल में यह उस गैर कांग्रेसवाद की ग्रंथि को पोषित करने की कवायद से अधिक कुछ भी नही है जिस गैर कांग्रेसवाद के गर्भ से माकपा पैदा हुई है। भाकपा से माकपा के अलग होने का एक यही प्रमुख कारण था। हालांकि उसका आधार माक्र्सवादी दर्शन की गलत व्याख्या और माक्र्सवादी दर्शन का बेहद मैकेनिकल विश्लेषण रहा है। यह विश्लेषण केवल दो वर्ग की अवधारणा पर विश्वास करता है और परस्पर विरोधियों में एकता और संघर्ष के सिद्धांत को सिद्धांत नही एक विरोधाभास मानकार विरोधी वर्ग को शत्रु मानकर उससे किसी भी प्रकार की एकता को नकारता है। यही कारण है कि यूपीए 1 को भी प्रकाश करात ने उस समय पार्टी महासचिव रहते केवल एक टेक्टिकल गठजोड़ माना था। यही सैद्धांतिक गलत व्याख्या ही देश की राजनीति में तीसरे मोर्चे की हिमायती और जनक भी रही है। यह केवल प्रकाश करात नही बल्कि दुनिया भर में सिमटते अति वामपंथ की समस्या है। दूसरी तरफ ण्कता और संघर्ष को सिद्धांत मानने वाले पी सी जोशी थे जिन्होंने इसी लाइन पर चलकर भाकपा को और पूरे कम्युनिस्ट आंदोलन को कुछ लोगों के समूह से निकालकर देश की एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बना दिया था। इसी लाइन पर भाकपा लंबे समय तक चलती रही परंतु एक समय में आकर वह भी तीसरे मोर्चे की राजनीति की गिरफ्त में आकर लगातर गिरावट का शिकार हो गयी।

अब बदले हालात में भी माकपा वोटों का बंटवारा तो नही चाहती परंतु कांग्रेस से राजनीतिक गठजोड़ नही करेगी। जब देश के सामने फासीवाद का भयावह खतरा खड़ा है और देश में उन्मादी, सांप्रदायिक ताकते हर लोकतांत्रिक संस्थान को तबाह और बर्बाद करने पर आमादा हैं। ऐसे समय में भी माकपा फासीवाद के खिलाफ एक लंबी लड़ाई की व्यूह रचना करने और लंबी लड़ाई की रणनीति बनाने और लोकतंत्र को पुनसर््थापित करने की अपेक्षा इस संघर्ष को केवल 2019 का संघर्ष ही मानकर रणनीति बनाने में जुटी है। यह एक तरह का ऐसा राजनीतिक पाखंड अथवा कहें कि ऐसा राजनीतिक दिवालियापन है जो पूरे की एकता अखण्ड़ता और देश वजूद पर भी सवाल खड़े कर सकता है।

माकपा के बुद्धिमान नेतृत्व का जब यह हाल है तो उसके कैडर के बारे में सोचकर हैरानी होती है। क्या वामपंथी दलों के कैडर और मोदी के भक्तों में कोई अंतर नही है कि यदि मोदी भक्तों को जुमलेबाजी से मूर्ख बनाया जा सकता है तो लगता है प्रकाश करात एण्ड़ कंपनी भी अपने कैडर के साथ यही कर रही है। वो देश पर मंडराते फासीवाद के खतरे को नजर अंदाज करके जिस तरह की सीख अपने कैडर को दे रहे हैं उनका कैडर उसे सीख भी रहा है। कम से कम वामपंथी कैडर को इतना राजनीतिक अशिक्षित तो नही होना चाहिए था। परंतु ऐसा होना स्वाभाविक ही था क्योंकि प्रकाश करात सरीखे नेताओं ने उसे धर्म रहने दिया, जाति बनने दिया और क्षेत्र और केवल राज्य भी बनने दिया। इसीलिए बात देश और लोकतंत्र बचाने की हो तो भी माकपा का फैसला केवल केरल बचाने तक ही सीमित है। यही भारतीय राजनीति के पाखंडवाद का शिकार, माकपाई राजनीतिक पाखंड है। जो चुनावी गठजोड़ करके सीटें हासिल तो करेगा परंतु 2004 की तरह जिम्मेदारियों से भागेगा और एकबार फिर धर्मनिरपेक्ष-जनवादी सरकार से समर्थन वापस लेकर संघी फासीवादी को और अधिक मजबूती से सत्तासीन करने में मदद करेगा।