चीफ जस्टिस के बचाव में भाजपा, उप-राष्ट्रपति ने खारिज किया महाभियोग, विपक्ष के आरोपों को मिला बल  

आईएनएन भारत डेस्क
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और मोदी सरकार के आपसी तालमेल से जाहिर था कि चीफ जस्टिस के खिलाफ लाए गये महाभियोग को पूर्व भाजपा अध्यक्ष और मौजूदा उप राष्ट्रपति वैंकेया नायडू खारिज कर देंगे। हुआ भी ठीक वही उप राष्ट्रपति ने आशानुरूप महाभियोग नाटिस को अनुपयुक्त बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने इसे खारिज करने के कारण गिनाते हुए कहा कि चीफ जस्टिस पर कदाचार के आरोप सिद्ध नही होते और रोस्टर का मामला सुप्रीम कोर्ट का अंदरूनी मामला है। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि सांसदों को अपन लगाये गये आरोपों पर विश्वास ही नही है।

वहीं इस पर प्र्रतिक्रिया देते हुए सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि महाभियोग के नोटिस को रद्द करना और उप राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर का मामला है और उन्हें केवल 50 से अधिक सांसदो के हस्ताक्षर की अनिवार्यता को देखना है। बाकी काम तीन जजों की कमेटी का है कि आरोप ठीक है कि नही। केवल वह तीन जजों की कमेटी ही इस पर निर्णय ले सकती है कि आरोप ठीक हैं कि नही। उप राष्ट्रपति का काम मामले को तीन जजों की कमेटी को देना है, स्वयं निर्णय लेना नही।

राजनीतिक हलकों में इस महाभियोग को लेकर कयास लगाये जा रहे थे कि भाजपा सरकार किसी भी सूरत में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा का बचाव करेगी और उनके खिलाफ महाभियोग को खारिज कर दिया जायेगा। मौजूदा सरकार और चीफ जस्टिस के बीच तालमेल पर जिस प्रकार के सवाल उठ रहे हैं उसके मद्देनजर इस फैसले को लगभग तय माना जा रहा था। इसी कारण से कांग्रेस ने पहले से ही घोषणा कर दी थी कि उसका अगला कदम इस मामले को कोर्ट में ले जाना होगा।

हालांकि चीफ जस्टिस के खिलाफ जो आरोप लगाये गये हैं वह इतने आधारहीन नही हैं जितने भाजपा और उसके नेता दिखाने की कोशिश में लगे हैं।

1. प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट में चीफ जस्टिस एक पक्ष थे और उन पर लखनउ के मेडिकल कालेज मामले में हुए भ्रष्टाचार में संलिप्तता के आरोप लगे थे। उन्होंने इस मामले की सुनवाई करने वाली बेंच की स्वयं अध्यक्षता करने का निर्णय लिया। ऐसा उन्होंने तब किया जबकि जस्टिस चेलमेश्वर इस मामले पर कामिनी जयसवाल की याचिका की सुनवाई करने के लिए तैयार हो गये थे। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने उनकी कोर्ट से यह मामला अपनी बेंच में मंगा लिया और इस पर सुप्रीम कोर्ट में एक ऐतिहासिक तकरार वकील प्रशांत भूषण और चीफ जस्टिस के बीच देखने को मिली। विधि विशेषज्ञों के अनुसार इस मामले में जब चीफ  जस्टिस का नाम लिप्त था तो उन्हें इसकी सुनवाई से बचना चाहिए था। परंतु उन पर बाद में इस मामले में पक्षपात के आरोप लगे और चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के कईं वरिष्ठ वकीलों के बीच इस पर तीखी नोक झोंक भी देखने को मिली।

2. दूसरा एक गंभीर मामला जस्टिस दीपक मिश्रा पर अवैध तरीके से जमीन आंवटन करा लेने का था। उन्होंने वकालत करते समय एक झूठा एफेडेविट देकर एक जमीन आंवटित कराई थी। जिसे एडीएम ने 1985 में कैंसिल करने का आदेश जारी किया गया था जिसे जस्टिस दीपक मिश्रा ने 2012 में सरेंडर किया।

3. रहा मामला रोस्टर तय करने का तो सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम के पांच में से चार जजों ने देश के सामने आकर और इतिहास बनाते हुए इस मामले को उठाया था। ऐसा भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों को देश के सामने आकर यह कहना पड़ा कि वह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बचाने के लिए सामने आये हैं।

4. इसी दौरान चीफ जस्टिस के दुर्व्यवहार पर भी उन वरिष्ठ जजों ने सवाल उठाते हुए कहा था कि यदि उनसे इस मामले पर बात की जाये तो वह किसी की सुनते नही हैं। और जजों ने उनके व्यवहार पर सवाल खड़े किये थे।

इस सारे घटनाक्रम के बावजूद उप राष्ट्रपति द्वारा महाभियोग के नोटिस को अपने स्तर पर खारिज कर देना इस बात को रेखांकित करता है कि मोदी सरकार किसी भी सूरत में चीफ जस्टिस को बचाना चाहती है और इस घटना से महाभियोग पर हस्ताक्षर करने वाले सात दलों के नेताओं के आरोपों को बल मिलता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में है। जिसे सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जज पहले ही रेखांकित कर चुके हैं।