मोदी सरकार के बैंकिंग सुधारों ने पैदा किया करेंसी संकट, अर्थव्यवस्था गहरे संकट में

हिंदी भाषी क्षेत्रों विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में एक कहावत मशहूर है ‘‘जिसका काम उसी को साझे, और करे तो जूता बाजे‘‘। मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरूण जेटली ने जब से वित्त मंत्रालय संभाला है वह रोजाना इसी कहावत को चरितार्थ करते नजर आते हैं। वो देश के एक जाने माने वकील रहे हैं और इतने जाने माने और काबिल वकील रहे हैं कि उन्होंने भोपाल गैस काण्ड के लिए जिम्मेदार और हजारों लोगों की कत्ल की गुनहगार यूनियन कारबाईड तक को बचाने के लिए मांगने पर कंपनी के वकीलों को 12 पेज के सुझाव दिये थे। दरअसल उनका काम संकट के बाद अथवा कहें कि अपराध के बाद आकर अपने मुवक्किल को बचाने का रहा है। परंतु ना जाने उन्हें कैसे गुमान हो गया कि वह देश के वित्त को संभाल सकते हैं और इसी धुन में वह वकील से आर्थिक संकट खड़ा करने वाले बन गये हैं।

 

अभी जिस करेंसी संकट का सामना देश के अधिकतर बड़े राज्य कर रहे हैं, वह असल में उससे भी बड़ा संकट है। यह उस नोटबंदी और तथाकथित बैंकिंग सुधारों का असर है जिन्हें विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के इशारे पर अन्तर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी के हितों को साधने के लिए लागू किया गया था। डिजिटलीकरण के नाम पर सरकार जो तुगलकी फरमान पिछले सालों से जारी कर रही है उसी का नतीजा है कि आज देश एक गहरे आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। पहले कालेधन, नकली करेंसी से निपटने के नाम पर नोटबंदी को लागू किया गया। फिर उसे डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने का कदम बताया गया। नोटबंदी के नतीजे में लाईन में खड़े सैंकड़ों लोगों की मौत से अधिक कुछ हासिल नही हुआ।

 

सरकार 500 और हजार के नोट बंद करके उसकी जगह 2 हजार का नोट ले आयी और कालेधन को खत्म करने की जुमलेबाजी करने वाले प्रधानसेवक और सरकार ने नकद कालाधन जमा करने वालों को और अधिक सहूलियतें दे डाली। अब यही 2 हजार का नोट नकद कालाधन जमा करने का सबसे बड़ा स्रोत बन हुआ है। और इसी जमाखोरी के कारण 2 हजार का नोट बाजार से गायब है। सबसे बड़ा नोट होने के कारण यह बजार में चलन में रहने वाली हमारी करेंसी का सबसे बड़ा हिस्सा भी है। कुल 20 लाख करोड़ की हमारी करेंसी का एक चैथाई हिस्सा बाजार में है और उस 2 हजार के नोट का बाजार से बड़ी संख्या में गायब होने का अर्थ है कि कम से कम कुल करेंसी के 20 या 25 प्रतिशत हिस्से पर फर्क पडना। अब मौजूदा वित्त मंत्री और प्रधानसेवक को देश को बचाना चाहिए कि किसकी सलाह पर वह 2 हजार का नोट बाजार में ले आये थे और नकद कालाधान के जमाखोरों को उन्होंने यह जमाखारी की सुविधा क्यों दी।

 

इसके अलावा नोटबंदी और तथाकथित डिजिटलीकरण के बाद बैंकों की मनमानी लूट ने भी बाजार से करेंसी को गायब किया है। बैंक नकद जमा से लेकर निकासी और न्यनतम बैंलेंस नही रखने तक उपभोक्ता से चैतरफा लूट कर रहे हैं। वित्त वर्ष 2018 में ही देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक आॅफ इण्ड़िया ने ग्राहकों से ऐसा चार्ज लगाकर कुल 2320.96 करोड़ रूपये की कमाई की है। बैंक की यह आमदनी उसकी कुल आय का लगभग आधा भाग है। इसका अर्थ है कि आप बैंक में जो पैसा जमा करायेंगे उसे बैंक नीरव मोदी, विजय माल्या अथवा मेहुल चैकसी पर लूटा देंगे और फिर मुनाफे के लिए ग्राहकों की अंधी लूट करेंगे। इसी कारण बैंक उपभोक्ता अब पहले से ज्यादा नकइ लेन देन और नकदी जमाखोरी की तरफ लौट रहे हैं।

 

मौजूदा दौर में करेंसी संकट का एक अन्य बड़ा कारण सरकार द्वारा प्रस्तावित एफआरडीआई 2017 बिल है। असल में इस बिल का विचार अमेरिका में 2008 की मंदी के बाद से आया था। जब दुनिया के कई जाने माने अमेरिकी बैंक डूब गये और सरकार ने उन्हें बैल आउट पैकेज देकर उबारने की कोशिश की तो इसके खिलाफ अमेरिका में जबरदस्त जन उभार दिखाई पड़ा था। यहीं पर विश्व पंूजीवाद ने वह दांव खेला जिससे कहते हैं चित भी मेरी पट भी मेरी और अट्टा मेरे बाबा जी का। अर्थात यदि बैंक जनता का पैसा लेकर डूबेंगे तो फिर से मार जनता के उपर ही पड़ेगी और कहा ऐसा गया कि बैंक के डूबने पर बैंक ही उससे निकलने की राह बनायेंगे। परंतु यह राह सरकार ने एफआरडीआई के रूप में बना दी। इसके अनुसार बैंक में रखे जनता के पैसे की कोई सुरक्षा नही होगी और बैंक डूबने के बाद एक निश्चित सीमा से ज्यादा ग्राहक बैंक से पैसे की वापसी का दावा नही कर सकता है। मान लिजिए आपके बैंक में 50 लाख रूपये जमा हैं तो बैंक डूबने पर आप 1 लाख से ज्यादा का दावा नही कर सकते हैं। यही बिल एफआरडीआई जब भारत में लाया गया और कहा गया तो बैंक ग्राहकों में एक तरह का डर और आक्रोश पैदा हो गया और लोगों ने पैसा निकालकर अपने घर में रखना ज्यादा ठीक समझा।

 

इसके अतिरिक्त नोटबंदी, जीएसटी और दिल्ली में सीलिंग ने भी देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डाला है। कई उद्योग तो नोटबंदी और जीएसटी की मार से अभी तक नही उभरें हैं और इसका असर यह हुआ कि अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार हो गयी है। जिस कारण से लोगों की आय पर असर पड़ा है और उनके पास पैसे की कमी हो रही है।

 

बहरहाल, आज के इस करेंसी संकट और आर्थिक संकट के लिए सरकार स्वयं ही जिम्मेदार है और अभी भी उससे निकलने के काई प्रयास सरकार करती नही दिखाई दे रही है। वास्तव में हमारी अर्थव्यवस्था का असली संकट अरूण जेटली और प्रधानसेवक हैं। वित्त मंत्री को जब वकील होना चाहिए था तो वह वित्त मंत्री बन गये और अब जब उन्हें वित्त मंत्री बनकर संकट से निपटना चाहिए था तो वह वकील बनकर सरकार के बचाव के वकीली तर्क दे रहे हैं। और प्रधानसेवक का क्या, वह तो सनातनी विपक्षी नेता हैं, जिन्हें जन्म से लेकर अभी तक सत्ता को गाली देना का ही प्रशिक्षण मिला है और अब आर्थिक संकट के समय भी वह वही कर रहे हैं जो एक विपक्षी नेता करता है। आलोचना और सिर्फ आलोचना।