खलनायकों, शैतानों के नायक बन जाने की राजनीति

निर्भया काण्ड़ पर जिस तरह से पूरा देश आंदोलन में उतरा दिखाई पड़ रहा था और जो आवाजें अपराधियों के खिलाफ उठ रही थी, उन आवाजों ने महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर पूरे देश में एक उम्मीद सी पैदा की थी। परंतु कठुआ की आठ साल की मासूम आसिफा और उन्नाव की बलात्कार पीड़िता और उसके परिवार की बर्बादी पर ना वो आवाजें हैं ना विरोध बल्कि सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले तथाकथित राष्ट्रवादियों का खेमा और उनके हिमायती ना सिर्फ खामोश हैं बल्कि बलात्कारियों के पक्ष में सड़कों पर हैं।

देश को यह शर्मनाक दिन भी देखना था कि हमारी राजनीति इतने निचले स्तर पर उतर आयेगी कि वो बलात्कारियों के पक्ष में लामबंदी पर उतर आयेगी।

कठुआ में आठ साल की बच्ची एक मंदिर में चीखती रही और आठ दिनों तक उसका रोज बलात्कार होता रहा और ना मंदिर की दिवारें दहली और ना मंदिर में बसने वाला भगवान शर्मसार हुआ। आठ साल की एक बच्ची जो धर्म और जाति के सवालों से अच्छी वाकिफ भी नही होती उसको धार्मिक उन्माद के नाम पर कई लोगों ने मिलकर अपनी हवस का शिकार बना लिया। यह घटना इतनी दर्दनाक है कि इसका पूरा ब्यौरा पढ़कर और उसके बारे में सोचकर ही किसी इंसान का दिल दहल जाता है। मगर लानत है उस राजनीति को इस भयावह कुकर्म के पक्ष में खड़ा होने का अमानवीय दुःसाहस दिखाती है। ना केवल इसके पक्ष में खड़ा होने का दुःसाहस करती है बल्कि बेशर्मी से इस हैवानियत की हिमायत भी करती है। भाजपा के दो मंत्री बलात्कारियों के समर्थन में जारी विरोध प्रदशनों में शामिल होते है और यह राष्ट्रवादी पार्टी उनके खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नही करती है। अभी भी भाजपा के एक नेता ने विवादास्पद बयान देते हुए कहा कि आसिफा की हत्या पाकिस्तान का काम है।

भाजपा के लिए सबसे आसन है इन सबसे पल्ला झाड़ लेना, इनके व्यक्तिगत कृत्य कहकर इनसे दूरी बनाना जो अक्सर वह करती भी है। यह राजनीति में एक खास तरह का रूझान है। परंतु फिर भी सवाल यह है कि भाजपा ऐसे गलत बयान और कृत्य करने वाले लोगों को जिम्मेदारी और जवाबदेही के पद पर रखती क्यों हैं। क्यों नही उन्हें मंत्री से पद से हटाया जाता है, क्यों नही उनकी विधायकी और सांसदी छीनी जाती है। वास्तव में भाजपा ऐसा दल है जो बलात्कार और हत्या पर भी राजनीति करके ध्रुवीकरण से गुरेज नही करती है। इसीलिए विवादास्पद लोगों के बयानों से फायदा भी लेना है और उनसे दूरी बनाकर चेहरा भी बचाना है।

दरअसल, यह भाजपा के ब्राहमणवादी संघी प्रशिक्षण का हिस्सा है। यदि ऐसा नही होता तो अल्पसंख्यक औरतों को कब्र से निकालकर बलात्कार करने का आहवान जिस आदमी के मंच से होता हो उस आदमी को भाजपा कम से कम अपना मुख्यमंत्री बनाने की सोचती भी नही। कब्र से निकालकर अल्पसंख्यक औरतों की लाश के साथ बलात्कार करने का आहवान करने वाला व्यक्ति ऐसे ही किसी भीड़ का नायक नही बन जाता है। वह उस भीड़ का नायक उस संगठन का नायक तभी बनता है ज बवह भीड़ उसी प्रकार के कुंठित और उन्मादी लोगों की भीड़ होती है। उनके लिए आठ साल की बच्ची का बलात्कार करना अथवा उन्नाव की एक लड़की से बलात्कार करके पीट पीटकर उसके पिता का कत्ल कर देना उनके नफरत, उन्माद पर बने जीवन दर्शन का स्वाभविक हिस्सा है। इसीलिए उडीसा के ग्राहम स्टेंस से लेकर गुजरात की सड़कों पर बिखरे मासूमों के लहू और सैंकडों औरतों की तार तार हो गई अस्मत की हजारों कहानियों के खलनायक ही संघी नायक हैं। शैतानों को नायक बनाना ही तो इनकी राजनीति है। और कायरों की यह ऐसी राजनीति है जो समाज के सबसे कमजोर हिस्सों को निशाना बनाती है। इसीलिए आज इनके निशाने पर औरतें, आनुसूचित जातियां, जन जातियां और अल्पसंख्यक ही है।