सुपर फ्लाप हुआ आरक्षण विरोधियों का भारत बंद, केवल बिहार में हिंसा आगजनी

आईएनएन भारत डेस्क
दो अप्रैल के भारत बंद के खिलाफ 10 अप्रैल का ‘‘बदले का भारत बंद‘‘ सुपर फ्लाप सिद्ध हुआ। आरक्षण विरोधी ब्राहमणवादियों ने एक साजिश के तहत इस बंद को सामान्य वर्गो और ओबीसी का भारत बंद बताने की कोशिश की थी। परंतु केवल बिहार को छोड़ दे तो पूरे देश में इस आरक्षण बंद का असर देखने को नही मिला। बावजूद इसके कि भाजपा शासित राज्यों में ब्राहमणवादियों की सुरक्षा के पूरे इंतजाम किये गये थे। धारा 114 लगाने से लेकर अतिरिक्त पुलिस बल नियुक्त करने तक भाजपा सरकारों ने आरक्षण विरोधियों की सुरक्षा के तमाम इंतजाम किये थे। यहां तक कि बंद सफल बनाने के लिए राजस्थान में तो स्कूल भी बंद कर दिये गये थे। परंतु तमाम सरकारी समर्थन के बावजूद भारत बंद सुपर डुपर फ्लाप साबित हुआ।

वास्तव में इस बंद की विफलता ने साबित कर दिया है कि बहुजन तबका अब कितना जागरूक हो चुका है और अपने हित और अहित को समझने के अलावा अपने असली दुश्मन को भी सही से पहचानने लगा है। इसीलिए अबकी बार वह बा्रहमणवादी झांसे और झूठ में नही फंसा। दरअसल इस बंद को सफल बनाने के लिए ही आरक्षण विरोधियों ने एक साजिश के तहत इस बंद में ओबीसी का नाम भी घसीटा था। परंतु ओबीसी की पुरानी मजबूत जातियों अबकी बार ब्राहमणवाद का लठैत बनने से इंकार कर दिया और ब्राहमणवाद का भारत बंद फ्लाॅप हो गया।

केवल बिहार में ही कुछ संगठित गिरोहों के दम पर आरा, मुज्जफ्फरपुर और गया जैसी जगहों पर संघी गिरोह उत्पात मचाने और आगजनी करने में कामयाब हुए। अब देखना यह है कि भाजपा और नीतीश की सरकार कितने अगडे लोगों पर रासुका और आगजनी एंव 307 के मुकदमें दर्ज करती है अथवा यह मुकदमें सिर्फ बहुजनों के लिए ही आरक्षित हैं।

बिहार के अलावा मध्य प्रदेश, पंजाब, उप्र और अन्य राज्यों में कुछ भगवा संगठनों के धरने प्रदर्शनों के अलावा बंद का असर नाममात्र को देखने को मिला। जिस प्रकार से 10 अप्रैल के भारत बंद के पोस्टरों पर अमित शाह और मोदी के फोटो छापे गये थे उससे साफ जाहिर है कि इस भारत बंद के पीछे कौन सी ताकतें काम कर रही थी।

बंद का असर बिहार में भी इसलिए देखने को मिला क्योंकि पिछले दिनों से बिहार संघी दंगाईयों के कब्जे में है और दुःशासन बाबू नीतीश कुमार का भी उन्हें भरपूर समर्थन हासिल हो रहा है। बिहार के उत्पात को उसी हिंसा के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है। वैसे भी संघी गिरोह 2015 की अपनी हार के मद्देनजर बिहार का पूरी तरह से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने पर उतारू है और एक खास डिजायन के तहत वह अपनी इस मुहिम को अंजाम भी दे रहा है। नीतीश कुमार और उनकी अवसरवादिता इस संघी साजिश का एक प्रभावी औजार बन रहे हैं।