एससी/एसटी कानून में बदलाव, पुनर्विचार याचिका और राजभर का बयान बड़ी संघी साजिश

आईएनएन भारत डेस्क:

देश में ब्राहमणवाद के पोषक और नेतृत्वकारी संगठन आरएसएस और भाजपा ने अपने जाने पहचाने अंदाज में एक नई चाल चल दी है।  एससी/एसटी कानून पर बनी बहुजन एकता से घबराये संघी टोले ने पिछड़ा वर्ग से आने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश में राजभरों के नेता होने का दावा करने वाले सुहेलदेव पार्टी के नेता और राज्य में  पिछड़ा वर्ग के मंत्री ओम प्रकाश राजभर से सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करवा दिया है।

ध्यान रहे यह वही पिछड़ा नेता हैं जो राज्यसभा चुनावों में सार्वजनिक तौर पर भाजपा से नाराजगी जाहिर कर चुके थे और उसके बाद अमित शाह से बातचीत होने के बाद अपने चारो वोट भाजपा के पक्ष में देने का वादा किया था। हालांकि उनके एक विधायक ने क्रास वोटिंग करके बसपा को अपना वोट दिया था। जिसके बाद माना जा रहा था कि राजभर की योगी सरकार में बारगेनिंग पावर कम हुई है। अब ओमप्रकाश राजभर को मौका मिला और उन्होंने संघी जरूरत के हिसाब से बयान देकर भाजपा की नजरों में अपने भाव बढ़ाने का काम किया है।

असल में 2 अप्रेल का आंदोलन और उसमें दिखाई दी बहुजन एकता भाजपा और संघ के लिए गले की हड्डी बन रही थी और संघ चाहता है कि इसे किसी भी तरह पिछड़ा बनाम दलित का रंग दिया जाये और दोनों समुदायों को लड़ाकर हमेश की तरह हिंदू अगड़े विशेषकर ब्राहमणवादी अपना वर्चस्व बनाये रखें। इसी रणनीति के तहत राजभर का इस्तेमाल संघ ने किया है और हो सकता है कि आने वाले दिनों में कोई और भी संघी टोले का पिछड़ा नेता इस प्रकार का बयान दे डाले।

अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति अत्याचार निरोधक अधिनियम (एससीएसटी एक्ट) से सम्बन्धित उच्चतम न्यायालय की ताजा व्यवस्था का उत्तर प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने समर्थन करते हुए कहा कि एससी-एसटी एक्ट को लेकर कोर्ट का फैसला बिल्कुल सही है। गौरतलब है कि एक तरफ तो केंद्र सरकार ने एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की है और दूसरी तरफ उसी का एक सहयोगी इसका समर्थन कर रहा है। इससे सरकार की असली मंशा का पता चल जाता है। एक कि सरकार इस पुनर्विचार याचिका के माध्यम से पूरे मामले को लटकाये रखना चाहती है और दूसरे कि यह सारा खेल संघ के निर्देशन में चलने वाली सरकार के इशारे पर हो रहा है और अब वह अपनी इस करतूत का फायदा पिछडे और अनुसूचित जातियों के लड़ाकर उठाना चाहती है।

बहरहाल इस पूरे मामले पर सरकार की नीयत साफ हो रही है। वह अब न्यायपालिका में बैठे अपने लोगों के माध्यम से देश पर हिंदू राष्ट्र के ब्राहमणवादी एजेंडे को थोपना चाहती है। एससी/एसटी कानून में बदलाव करने वाले दोनों जजों का संबंध भाजपा-संघ से रहा है। आदर्श कुमार गोयल आरएसएस से जुड़े अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के महासचिव रहे हैं और उनकी नियुक्ति पर 2001 में आईबी की रिपोर्ट में उनके राजनीतिक और संघीय संबंधों का हवाला था। जिस पर उस समय के राष्ट्रपति के आर नारायणन ने आपति करते हुए उनकी नियुक्ति की फाइल को वापस अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को भेज दिया था। यूयू ललित का तो ताजा ही मामला है कि वह साहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के वकील थे। अब उन दोनों जजों के द्वारा दिया गया इस प्रकार का निर्णय और सरकार की पुनर्विचार याचिका और उसके बाद पिछड़ों और दलितों में फूट डालने की नीयत से दिया गया राजभर का बयान पूरी संघी योजना को साफ कर रहा है।