लाठी गोली की सरकार, ना रोक सकी बहुजन की हुंकार

आईएनएन भारत डेस्क
एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून को कमजोर करने के खिलाफ 2 अप्रेल को ऐतिहासिक भारत बंद का आयोजन विभिन्न बहुजन संगठनों द्वारा किया गया। भारत बंद के दौरान 9 लोगों की जान चली गई और पूरा देश सुलग उठा। मारे गये नौ लोगों में छह भाजपा शासित मध्य प्रदेश और दो योगीराज उप्र और एक वसुंधरा राजे के राज में मारे गये।

मध्य प्रदेश में बंद के दौरान हिंसा बंद समर्थकों के खिलाफ ग्वालियर में सवर्ण बंद समर्थकों के हमले के बाद शुरू हुई। फिर धीरे धीरे इस प्रकार की घटनाएं अन्य शहरों में भी घटित होना शुरू हुई।

उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में भारी संख्या में पुलिस बल और दंगा निरोधक बलों को नियुक्त किया गया था। और अधिकतर राज्यों में बहुजन समाज पर भारी पुलिस बल का प्रयोग किया गया। परंतु आज का दिन देश के वंचित तबकों देश के बहुजनों का था। हालांकि यह भारत बंद बगैर किसी नेता और बगैर किसी अधिक पूर्व तैयारी के आयोजित किया गया था। लेकिन इस भारत बंद ने आज बहुजन की ताकत और उनकी नाराजगी का अहसास ना केवल देश की जनता को करा दिया बल्कि सभी राजनीतिक दलों विशेषकर ब्राहमणवादी दलों को करा दिया।

इस भारत बंद और बहुजन समाज के आक्रोश का ही नतीजा था कि 20 मार्च के फैसले के खिलाफ इस बंद की ताकत को देखते हुए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पूनर्विचार याचिका दाखिल करने का निर्णय लिया और याचिका दाखिल भी कर दी गई।

हालांकि संघ की फितरत और भाजपाई राजनीति को समझने वालों का मानना है कि यह सरकार का चालाकी भरा कदम है और भाजपा सरकार इस याचिका से आंदोलन की हवा निकालकर मामले को लंबे समय तक लंबित रखने की राजनीति पर काम करेगी। यदि भाजपा में जरा भी ईमानदारी होती तो वह संसद के चालू सत्र में इस मामले का स्थायी हल कर सकती थी। जिससे कि कोई सवर्ण जज अपने पद का बेजा इस्तेमाल ना कर सके। दरअसल दोनों जजों के संबंध संघ और भाजपा से रहे हैं और इस निर्णय के पीछे वही ब्राहमणवादी मानसिकता काम करती दिखाई पड़ रही है। क्योंकि दोनों जजों का इस निर्णय के पीछे दिया गया तर्क बेहद अजीबो गरीब और पक्षपाती जान पड़ता है। उनके अनुसार दर्ज मामलों में बहुत कम में आरोप सिद्ध हुए हैं। बजाये इसके कि दोनों जज आरोप सिद्ध नही किये जाने और अभियोग पक्ष की नकामी और पक्षपात पर कार्रवाई करते उन्होंने उत्पीड़न की शिकार जातियों और समुदाय को ही इसके लिए दोषी ठहरा दिया और सजा की घोषणा भी कर दी। पंरतु 2 अप्रेल को जिस प्रकार का आक्रोश दलितों ने जाहिर किया उससे साफ है कि इस प्रकार के ब्राहमणवादी छल प्रपंच अब बर्दाश्त नही किये जा सकते हैं।

यह विरोध की एक ऐतिहासिक झांकी भर है और इसका संदेश साफ है कि अब एक सामाजिक बदलाव का दौर शुरू हो चुका है। कोई लाठी गोली का डर और पुलिस बल की मार इस बदलाव को रोक नही पायेगी। यह बहुजन हुंकार निर्णायक और सामाजिक रूपांतरण को नई दिशा देने वाली है!