शिक्षा और लोकतंत्र पर हमले के खिलाफ जेएनयू का ऐतिहासिक संसद मार्च

वो फिर से सड़कों पर हैं, ढ़पली बजाते, नाचते गाते, नारे लगाते और नारों को गीत और गीतों को नारे बनाते। वो बताने आ रहे हैं समाज विकास में विरोधाभासों की अनिवार्यता को, वो बतायेंगे कि असहमतियों का दर्ज होेते रहना ही लोकतंत्र के जीवन का मूल है, उसकी जिंदगी है, वो देश के लोकतंत्र की अगली सीढ़ी और अगली पीढ़ी का दर्शन गढ़ने वाले हैं, वो जेएनयू हैं। वो आ रहे हैं संसद की ओर।

जेएनयू जब विरोध करता है तो देश के आम लोग यहां तक कि समाचारों और सूचनाओं की रिपोर्टिंग करने वाला तथाकथित जागरूक मीड़िया भी हैरान होता है कहता है कि यह कैसा विरोध जिसमें ढ़पली की थाप पर नाच है, गीत हैं, बुलंद नारे हैं और विरोध केवल विरोध नही जश्न है, उत्सव है। अपने आपको ठेठ भारतीय संस्कृति और संस्कारों के ठेकेदार समझने वाले और ठेकेदारी के शिकार आमजन दोनों ही इस संस्कृति को समझने और सीखने में नाकाम रहते हैं। वो नही समझ पाते कि यही लोकतंत्र है। यही सही लोकतंत्र की संस्कृति है। विरोध जिसकी अनिवार्यता और असहमति का जिंदा रहना और अभिव्यक्त होना लोकतंत्र के जिंदा होने का साक्ष्य है। उनके लिए समझना मुश्किल है कि लोकतांत्रिक विरोध दुश्मनी नही सहमति के नये बिंदूओं की तलाश और अच्छे को बेहतर बनाने की प्रक्रिया है। वह विरोध का अर्थ दुश्मनी और मिटा देना जानते हैं, वह विरोध का अर्थ एक की हार और एक जीत जानते हैं। वह ऐसी किसी प्रणाली ऐसे किसी तंत्र से अनभिज्ञ हैं जिसमें लड़ने वाले दोनों जीतते हैं कोई कम और कोई ज्यादा या दोनों हारते हैं कोई कम कोई ज्यादा। इसीलिए किसी कार, बस या आॅटो में बैठा व्यक्ति जब नाचते गाते जेएनयू के छात्र छात्राओं का विरोध देखता है तो हैरान होता है कि यह कैसा विरोध।

लोकतांत्रिक विरोध के सौंदर्य की इस अनुभूति का अहसास आपको जेएनयू होकर अथवा जेएनयू के साथ जीकर ही होता है। जेएनयू के रूप में आपका रूपांतरण ही आपको जेएनयू को समझने की क्षमता देता है। जेएनयू किसी एक खास रंग की पहचान नही है। वह सामाजिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विविधता का ऐसा रंग है, जो सभी रंगों को बढ़ने की संभावनाओं वाले एक नये जनवादी रंग का प्रतीक है। एक ऐसा रंग जिसमें सभी रंग हैं और सभी रंगों में वो है। लोग कह सकते हैं कि यह जेएनयू के वाम होने से है। कुछ ठीक भी हो सकता है परंतु यह थोड़ा सतही और सरलीकृत आंकलन और विश्लेषण है। वाम तो दुनिया के कई देशों में है और इस संस्कृति के ठीक विपरीत भी है। वाम तो देश के कई हिस्सों में है परंतु पूरी तरह से जेएनयू की संस्कृति को साकार नही करता है। कुछ समानताएं उनमें हो सकती हैं परंतु पूरी तरह से वाम जेएनयू नही है। वह वाम से अगला पड़ाव है, वास्तव में यह वाम का पूरी तरह जनवादी हो जाना है। यही वह रंग है, जो किसी भी आम आदमी को हैरत से भर देता है। दरअसल, जेएनयू की जनवादी संस्कृति सभी रंगों में समाहित जनवाद को फैलने और बढ़ने का अवसर देती है। पिछले कुछ सालों में जेएनयू वंचित तबकों की नई राजनीति को गढ़ रहा है। सामाजिक न्याय के संघर्षो को नये आयाम और नये अर्थ दे रहा है। यह भी ठीक है कि इस नये रंग पर जेएनयू के जनवाद में समाहित वाम के प्रशिक्षण का प्रभाव है। हालांकि यह बात दीगर है कि खुद वाम सतही नारेबाजी से आगे इसमें कितना पारंगत हुआ है।

जेएनयू का जनवाद अब भीतरी विशेषता से आगे बाहरी रोशनी बनने की राह पर है। जेएनयू फिर से शिक्षा और जनवाद पर भगवा हमले के खिलाफ सड़कों पर है। अबकी बार वो लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रतीक संसद तक पैदल मार्च करने की ठान रहे हैं। यह मार्च कारपोरेट और भगवा जुगलबंदी के खिलाफ शिक्षा और जनवाद के लिए संघर्ष का नया पड़ाव, नई पहल बन सकता है। क्योंकि यह शिक्षा की चिंताओं के साथ भविष्य के लोकतंत्र की राजनीति की सीख देने वाला मार्च बन सकता है। इन्हीं अर्थों में जेएनयू का यह संसद मार्च एक ऐतिहासिक संसद मार्च होगा।