जेएनयू प्रोफेसर को बचाने में सामने आया केन्द्र सरकार के ‘‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ‘‘ जुमले का सच

आईएनएन भारत डेस्क
जेएनयू के यौन उत्पीड़न के आरोपी प्रोफेसर को बचाने के लिए संघ और भाजपा प्रत्येक हथकंडे का इस्तेमाल कर रही है। प्रोफेसर पर नौ छात्राओं द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने के बाद भी आरोपी प्रोफेसर की ना अभी तक गिरफ्तारी हुई है और ना ही प्रोफेसर को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निलंबित किया गया है। प्रोफेसर अतुल जौहरी के खिलाफ कोई कार्रवाई नही होते देख उन्हें गिरफ्तार करने और सस्पेंड करने की मांग को लेकर जेएनयू छात्र लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। सोमवार 19 मार्च को शाम 5 बजे जेएनयू छात्रसंघ ने आरोपी प्रोफेसर की गिरफ्तारी की मांग को लेकर वसंत कुंज थाने के सामने विरोध-प्रदर्शन किया। विरोध-प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने नेल्सन मंडेला मार्ग को भी जाम कर दिया गया और प्रदर्शन में छात्रों का साथ देने के लिए काफी संख्या में शिक्षक भी शामिल थे। इस दौरान पुलिस की छात्रों से झड़प और धक्का मुक्की भी हुई।

 

पुलिस ने इस मामले में पहले ही एफआईआर दर्ज कर ली थी और कथित रूप से सोमवार को आरोपी प्रोफेसर को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन भी बुलाया था। जेएनयू के छात्रों का कहना है कि पुलिस मामले में कार्रवाई करने से बच रही है। छात्रों का कहना था कि एफआईआर दर्ज करने के बावजूद भी शिकायतकर्ताओं से पूछताछ नहीं की गई है।

 

थाने पर प्रदर्शन से पहले जेएनयू छात्रसंघ और जेएनयू शिक्षक संघ ने आरोपी प्रोफेसर अतुल जौहरी को सस्पेंड करने समेत कई मांगों को लेकर जेएनयू में हड़ताल भी की थी।

 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज के प्रोफेसर अतुल जौहरी पर छात्राओं का यौन उत्पीड़न करने का आरोप है। छात्राओं के आरोप के जवाब में पहले प्रोफेसर ने इसे वाम बनाम दक्षिण का रंग देने की कोशिश की थी परंतु जब यह तथ्य सामने आया कि प्रोफेसर पर आरोप लगाने वाली छात्राओं में तीन एबीवीपी से संबद्ध हैं तो उन्होंने पैतरा बदलते हुए इसे अब 75 प्रतिशत हाजिरी की अनिवार्यता से जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है। दूसरी तरफ उनके नये तर्क पर छात्रों का कहना था कि यही तो उनका असली संघी रंग है जो अपनी करतूतों के लिए छात्रों को ही दोषी ठहराना चाहते हैं।

 

बहरहाल, दक्षिण पश्चिमी दिल्ली के वसंत कुंज पुलिस थाना में आरोपी प्रोफेसर के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बावजूद भी पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया एकदम टालू किस्म का और प्रोफेसर को सरासर बचाने वाला ही है।

 

आरोपी प्रोफेसर ने शुक्रवार को यूनिवर्सिटी के दो प्रशासनिक पदों- मानव संसाधन विकास केंद्र (एचआरडीसी) और इंटरनल क्वालिटी एश्योरेंस सेल (आईक्यूएसी) से ‘नैतिक आधार‘ पर इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, वह दावा कर रहे हैं कि उनके खिलाफ आरोप बेबुनियाद हैं। दूसरी तरफ छात्रों का कहना है कि जब आरोप बेबुनियाद हैं तो यह इस्तीफे क्यों। असल में वह अपनी करतूत को बेहद मामूली और रूटीन मानकर चल रहे हैं और इसे अपने काम कम करने के तोहफे की तरह ले रहे हैं। छात्रों का कहना था कि अतुल जौहरी मामले से केन्द्र सरकार के ‘‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ‘‘ के जुमले का सच सामने आ गया है।