Film Review: Raid: दमदार रेड डालने आए हैं अजय देवगन

Film Reviewer: Smriti Mala
फ़िल्म: रेड
निर्देशक: राजकुमार गुप्ता
लेखक: राजकुमार गुप्ता, रितेश शाह
अभिनय: अजय देवगन, इलियाना डिक्रूज, सौरभ शुक्ला, पुष्पा जोशी
संगीत: अमित त्रिवेदी, तनिष्क बागची
रनिंग समय: 2 घंटा 8 मिनट
शैली: ड्रामा

राजकुमार गुप्ता, 80 के दशक के लखनऊ में सबसे लंबी चलने वाली रेड पर आधारित फिल्म लेकर आए हैं। “आमिर” और “नो वन किल्ड जेसिका” की तरह राजकुमार गुप्ता ने  “रेड” में भी अच्छा निर्देशन किया है, और रितेश शाह के साथ मिलकर अच्छा स्क्रीन प्ले लिखा है, जो दर्शकों को ऊबने नहीं देती।

कहानी: फिल्म की कहानी  1981 की है जिसमें अमेय पटनायक एक सच्चे ईमानदार इनकम टैक्स ऑफिसर है, जो अपनी ईमानदारी के कारण 49वें ट्रांसफर में लखनऊ (उत्तर प्रदेश) आते हैं। यहां उन्हें एक भ्रष्ट नेता रामेश्वर सिंह उर्फ ताऊ जी (सौरव शुक्ला) के बारे में पता चलता है कि उसने अपने घर में बहुत सारा नाज़यज़ पैसा छुपा कर रखा है। अमेय पटनायक ताऊ जी के घर रेड मारते हैं। इसके बाद नए-नए खुलासे होना शुरू होता है।

फिल्म की कहानी वास्तविक घटना पर आधारित है, इसलिए राजकुमार गुप्ता ने इस फिल्म को बहुत ही सरल और वास्तविक तरीके से पेश  किया है। फिल्म की कहानी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग पर राजकुमार गुप्ता और रितेश शाह की मेहनत दिखती है जितनी वास्तविक तरीके से फिल्म को पेश किया है इस के डायलॉग उतने ही कमर्शियल और फिल्मी लगते हैं। लेकिन जब प्रोटागोनिस्ट और एंटागोनिस्ट डायलॉगबाजी करते हैं, तो देखते ही बनता हैं। जैसे “मैं सिर्फ अपनी शादी के दिन ससुराल से खाली हाथ वापस आया था”,  “अमेय पटनायक ना कभी खाली हाथ आते हैं और ना कभी खाली हाथ जाते हैं”,  “बहादुर अफसर का नहीं अफसर के प्रेमियों का होना जरूरी है” इत्यादि।

अभिनय: इस फिल्म में हर अभिनेता ने अपने रोल को खूबसूरती से निभाया है। अजय देवगन बिना मुस्कुराए और एक्शन के आंखों से सब कहते हैं। एक सच्चे ईमानदार इनकम टैक्स ऑफिसर के रोल को संजीदा तरीके से जीवंत किया है। सौरभ शुक्ला ने बखूबी अजय देवगन को टक्कर दिया है। अपने अभिनय की अदाकारी का बेहतरीन नमूना पेश किया है। अमित शर्मा ने भी अजय देवगन के सहायक के रूप में बखूबी निभाया है। इस फिल्म में एक नई कलाकार पुष्पा जोशी डेब्यू किया है जो 85 साल की है और  सौरभ शुक्ला की मां का रोल निभाया है। इस फिल्म में सबसे बेहतरीन और मनोरंजक लगती हैं। हर दिल जीत लेती हैं।

इलियाना डिक्रूज इस फिल्म में होती या ना होती इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन फिर भी अपने छोटे से रोल को उन्होंने अच्छे से निभाया है।

संगीत: फिल्म का संगीत बहुत खास नहीं है। “सानू एक पल चैन ना आवे” किस हिसाब से पंजाबी गाने इस में डाले गए हैं इसका कोई लॉजिक समझ नहीं आता इसके अलावा  “ब्लैक जमा है”, “तेरी यादें’  और “मेरी दुआ तू” बहुत लुभा नहीं पाते। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को सपोर्ट करते हैं।

सकारात्मक पक्ष: कहानी, स्क्रीन प्ले, डायलॉग, अभिनय, निर्देशन

नकारात्मक पक्ष: गाने

निष्कर्ष: फिल्म पूरी तरीके से पैसा वसूल है, और आपको जरूर देखनी चाहिए।

रेटिंग: 3/5