तीसरे मोर्चे की तेज होती कवायद भाजपाई रणनीति

काफी समय से केवल चर्चाओं में रह रही तीसरे मोर्चे के गठन की राजनीति ने यूपी उप चुनावों के बाद अचानक रफ्तार पकड़ ली है। दक्षिण में चन्द्रबाबू नायडू से लेकर चन्द्रशेखर राव और पूर्व में ममता बनर्जी से लेकर चन्द्र बाबू का समर्थन करने वाले नीतीश कुमार तक प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से इस कवायद का हिस्सा हैं।

 

तीसरे मोर्चे की इस कवायद को सबसे ज्यादा गति आंध्र के मुख्यमंत्री और टीडीपी प्रमुख चन्द्रबाबू के एनडीए से बाहर आने से मिली है। परंतु देखा जाए तो यह तीसरे मोर्चे के किसी विकल्प से अधिक यूपी उप चुनाव के बाद की भाजपाई रणनीति अधिक नजर आती है। दरअसल, अभी तक तीसरे मोर्चे का गठन महज एक अखबारी चर्चा के विषय से बढ़कर कुछ भी नही था। मगर चन्द्रबाबू नायडू के एनडीए से बाहर निकलने और टीडीपी और ममता बैनर्जी के सांसदों के संयुक्त रूप से बैठक करने के बाद से तीसरे मोर्चे की चर्चा अखबारी चर्चा से हटकर एक सक्रिय प्रयास बनती दिखाई देने लगी है। हालांकि टीडीपी के नेता जिस तरह से इस पूरे मसले को आगे बढ़ा रहे हैं उससे साफ जाहिर है कि यह भाजपा की सोची समझी रणनीति का हिस्सा भर है।

 

वास्तव में चन्द्रबाबू नायडू विशेष राज्य के दर्जे के सवाल को लेकर आंध्र में अपना जनाधार खो रहे थे और यदि वह भाजपा के साथ बने रहते तो जाहिर है कि वह अगले आम चुनाव में शर्तिया अपनी कुर्सी गंवा देते। दरअसल, उनके राज्य में विशेष राज्य के दर्जे की मांग को लेकर विपक्ष आंदोलन चलाकर एकजुट होता दिखाई पड़ रहा था। वाम दलों विशेषकर भाकपा ने इस सवाल पर राज्य में दो महीने ते एक बस जत्था चलाया और उसमेें केवल वाम दल ही शामिल नही थे बल्कि भाकपा के इस आंदोलन ने कांग्रेस, वायएसआर कांग्रेस से लेकर सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने और उन्हें एकजुट करने का काम किया। बजट सत्र के चालू सत्र में भी 6 मार्च से लगातार भाकपा का यह आंदोलन संसद के सामने जारी है जिसमें भाजपा के अलावा आंध्र के सभी विपक्षी दल शामिल हो रहे हैं। यह आंदोलन बेशक नेशनल मीड़िया में जगह नही बना पा रहा हो परंतु तेलगू मीड़िया इसे ठीक से कवर कर रहा था। विशेष दर्जे की इसी मांग को लेकर टीडीपी आंध्र में पिछडती दिखाई पड़ रही थी। इसी पिछडेपन को कवर करने के लिए टीडीपी ने पहले मंत्रीमंडल से बाहर जाने का फैसला लिया और बाद में एनडीए का दामन छोड़ने का दिखावा किया।

 

वास्तव में एनडीए से बाहर निकलकर ही टीडीपी भाजपा को सही लाभ करा पा रही है। अभी तक आंध्र में मुकाबला टीडीपी-भाजपा गठजोड़ और बाकी विपक्ष के बीच था तो वहीं बाहर होकर टीडीपी और भाजपा इसे अपनी नूराकुश्ती के जरिये टीडीपी बनाम भाजपा बनाने पर तुली हुई है। दोनों ऐसा जाहिर कर रहे हैं कि मानो आंध्र प्रदेश की पूरी राजनीति टीडीपी और भाजपा के बीच की आपसी राजनीतिक जंग से ज्यादा कुछ भी नही है और पूरा नेशनल मीड़िया इस पूरे मामले को दोनों दलों की इसी रणनीति के मुताबिक पेश कर रहा है। यह नूराकुश्ती कितने सुरक्षित तरीके से खेली जा रही है उसे इसमें भाजपा की कमान संभालने वाले नेताओं के कद काठी से ही समझा जा सकता है। भाजपा की तरह से इस लड़ाई की कमान जी वी एल नरसिम्हाराव और एनटीआर की बेटी पुरंदरेश्वरी को सौंपी है। जाहिर है दोनों भाजपा के कोई बड़े और दिग्गज नेता नही हैं और बदली स्थितियों में भाजपा दोनों को किनारे करने में देर नही करेगी। टीडीपी और भाजपा की इस रणनीति से जहां आंध्र में असली विपक्ष को हाशिये पर धकेलने की कोशिशे हो रही हैं तो वहीं नेशनल लेवल पर कांग्रेस को छोड़कर एक तीसरे मोर्चे के गठन की कोशिशे भी भाजपा को ही मजबूत करने की कवायद का हिस्सा है।

 

तीसरे मोर्चे की इस कवायद में चन्द्रबाबू, ममता और चन्द्रशेखर राव खासे सक्रिय हैं। जाहिर है यह पूरी सक्रियता आगामी आम चुनावों के मद्देनजर ही की जा रही है। पिछले चार सालों में उपरोक्त सभी नेताओं ने अपने अपने राज्य में भाजपा के खिलाफ ऐसा कोई मोर्चा नही खोला जिससे इन्हें भाजपा का स्वाभाविक विरोधी माना जाए बल्कि कभी ना कभी यह सभी भाजपा के सहयोगी रहे हैं। भाजपा बार बार जिस रणनीति बदलने की बातें कर रही है जाहिर है यही भाजपा की वह रणनीति है जिसे वोट बांटकर सत्ता में वापसी का फार्मूला भाजपा समझ रही है। क्योंकि कोई भी त्रिकोणीय मुकाबला भाजपा के राजनीतिक फायदे के विपक्षी फार्मूले के अलावा कुछ नही हो सकता है। दो दिन पहले तक एक दूसरे के सहयोगी रहे टीडीपी-भाजपा जिस तरह की आक्रमकता एक दूसरे के खिलाफ दिखा रहे हैं। उससे साफ जाहिर हो रहा है कि यह लिखी हुई और पहले से तैयार पटकथा की संवाद अदायगी से अधिक कुछ भी नही है जिसे भाजपा और टीडीपी अपने संभावित नुकसान को लाभ में बदलने की कवायद के तहत आगे बढ़ा रहीं हैं।

 

कमोबेश यही स्थिति ममता बैनर्जी की भी है। ममता जानती है कि भाजपा को अपना स्वाभाविक दुश्मन दिखाकर वह माकपा और वाम को हाशिये पर धकेल सकती हैं। वह इस कारनामें को पश्चिमी बंगाल में कर भी चुकी हैं। जहां उन्होंने इस तरकीब से माकपा और वामदलों को कई जगहों पर विगत चुनावों में तीसरे स्थान पर धकेल दिया है। इसके अलावा विगत दिनों त्रिपुरा चुनावों में उनकी अनुपस्थिति ने भी भाजपा को खासा फायदा पहुंचाया। ममता की पार्टी त्रिपुरा में चुनाव लड़ रही थी और ममता खुद एक दिन भी चुनाव प्रचार के लिए नही गई क्योंकि वह जानती थी कि त्रिपुरा में वोटों का बंटवारा सीधे भाजपा को नुकसान करेगा। इसीलिए उन्होंने त्रिपुरा चुनावों से दूरी बनाये रखी और आखिरकार भाजपा को इसका भरपूर लाभ मिला। यह तीसरे मोर्चे के वकील नेता भली भांति जानते हैं कि कहां वोट काटकर भाजपा को फायदा किया जा सकता है। इसीलिए यूपी चुनावों के बाद यह कांग्रेस रहित तीसरे मोर्चे की कवायद तेज हो रही है और दूसरी तरफ भाजपा के नेता दावे कर रहे हैं कि उन्होंने अब अपनी रणनीति बदली है। यही तीसरे मोर्चे की तेज होती कवायद और भाजपा की बदली रणनीति का अन्तर्संबंध है।