योगी के बौखलाये बोल लोकतंत्र विरोधी भाजपा का रंग

आईएनएन भारत:
यूपी उप चुनाव में भाजपा की हार के बड़े राजनीतिक संकेत हैं तो वहीं योगी के लगातार जारी बेतुके बोल योगी और उनकी पार्टी की अलोकतान्त्रिक और ब्राहमणवादी निरंकुशता का प्रतीक हैं। जहां चुनावों से पहले योगी ने सपा-बसपा के गठजोड़ को सांप-छंछून्दर का गठजोड़ कहा तो वह और उनकी पार्टी के नेता इस मेल को चोर चोर मौसेर भाई तक कहने से नही चुके। योगी और उनकी पार्टी के यह दंभपूूर्ण बेतुके बोल चुनावों में करारी हार और उनका सबसे सुरक्षित गोरखपुर किला ढ़ह जाने के बाद भी जारी हैं। चुनाव परिणामों के बाद अपनी हार को स्वीकार करने और जीते हुए पक्ष को लोकतांत्रिक तरीके से बधाई देने की परंपरा को तो जाने ही दें यूपी के मुख्यमंत्री हार के बाद भी विपक्ष पर तंज कसने से बाज नही आये। उन्होंने इस हार को सपा-बसपा की सौदेबाजी का नाम देकर ना केवल जनवादी परंपराओं को ठेंगा दिखाया है बल्कि सपा-बसपा गठजोड़ को जीत दिलानेे वाली जनता का भी अपमान किया है।

वास्तव में यह उनका व्यक्तिगत मामला नही बल्कि उनकी पार्टी और उनकी राजनीतिक विरासत का ब्राहमणवादी दंभ है जिसमें उनका प्रशिक्षण हुआ है। यह कोई पहला मौका भी नही है कि उन्होंने इस प्रकार के बोल बोले हैं। दरअसल योगी अपने इसी प्रकार के कड़वे और सांप्रदायिक सद्भाव को नष्ट करने वाले बोलों के लिए कुख्यात रहे हैं। अपने इसी प्रकार के बोलों के कारण उन पर दंगा भडकाने और हिंसा करवाने जैसे आरोपों में केस भी दर्ज हुए जिससे उन्होंने स्वयं ही जांच नही करने का आदेश पारित कर मुक्ति पाने की कोशिश भी की है। अभी मामला कोर्ट में विचाराधीन है। परंतु इस पूरे प्रकरण के बाद भी वह नही समझना चाहते हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के नाते उन्होंने थोड़ा गंभीर होने और संजीदगी से बयानबाजी करने की जरूरत है। उन्हें समझना चाहिए वह केवल एक पार्टी के नेता नही और केवल किसी एक धर्म के उन्मादी नेता नही बल्कि पूरे सूबे की जनता के नेता हैं और एक बेहद जिम्मेदार पद पर आसीन हैं। उनका पद और उसका दायित्व बेहद संजीदगी और संतुलन की मांग करता है। वैसे भी उन्हें समझना होगा कि सपा-बसपा का गठबंधन तो समाज के बहुजनों का स्वाभाविक गठजोड़ है।

वहीं दूसरी तरफ वे अपनी पार्टी पर नजर ड़ालें तो पायेंगे कि उनके सहयोगियों में तो रामविलास पासवन जैसे नेता हैं जो 2002 के गुजरात दंगे के बाद अटल सरकार से विदा होकर कह रहे थे कि भाजपा से उनका गठजोड़ जीवन की सबसे बड़ी भूल है और अब कभी भी भाजपा से गठजोड़ नही करेंगे। इसके अलावा सौ से ज्यादा सांसद तो उनके दल में ऐसे हैं जो कांग्रेस से पाला बदलकर आये हैं। उनके गृह राज्य उतराखंड़ की सरकार के आधे से ज्यादा मंत्री तो पुराने कांग्रेसी हैं। इसके अलावा हाल ही त्रिपुरा राज्य में जहां उन्होंने वाममोर्चे से सता छीनी है। उस राज्य में भी उनके कुल 50 उम्मीदवारों में से केवल 6 उम्मीदवार ही ऐसे थे जो पहले भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे बाकी सभी 44 उम्मीदवार विभिन्न दलों से पाला बदलकर आये थे। अवसरवाद और समझौतापरस्ती के तमाम कीर्तिमान बनाने वाली पार्टी का नेता मुख्यमंत्री एक स्वाभाविक बहुजन गठजोड़ पर समझौते का आरोप लगाये तो आश्चर्यजनक बात है। जिसमें जगदंबिका प्रसाद जैसे नेता भी शामिल हैं जिन्होंने मोदी को एक समय में राक्षस और शैतान तक की संज्ञा दे डाली थी। ऐसे सैंकड़ों दल बदलुओं के नेता का सपा-बसपा की स्वाभाविक बहुजन एकता पर सवाल खड़ा करना और इसे समझौते का नाम देना ना केवल उनके बेतुके बोल हैं बल्कि उनके ब्राहमणवादी भगवा संस्कार हैं। वैसे मोह माया त्याग कर संयासी होने का प्रतीक एक योगी गद्दी पाने और राजनीतिक सत्ता के लिए जब उन्मादी सांप्रदायिक बोल बोलता है तो उससे बड़ा और अपवित्र समझौता क्या हो सकता है।

असल में उनके ब्राहमणवादी भगवा संस्कार ही हैं जो उनके भीतर इस गुमान और अभिममान को भर देते हैं कि वह और उनके जैेसी अगड़ी जातियां के लोग ही शासक होने का गुण रखते हैं और पिछड़े और दलितों का कोई भी गठजोड़ समझौता है और नापाक भी है। यही कारण है कि किसी पिछड़े नेता के द्वारा मुख्यमंत्री आवास को खाली किये जाने के बाद वे उसमें प्रवेश से पहले उस आवास का शुद्धीकरण तक करवाने से बाज नही आते हैं। उन्हें यह भी समझ नही आता है कि वे उस आवास के अस्थायी निवासी हैं यह कोई उनका स्थायी घर नही है। वे यहां कुछ सालों के किरायेदार भर हैं। परंतु उनके ब्राहमणवादी संस्कार ही उन्हें गैर जनवादी बल्कि जनवाद विरोधी बनाते हैं। जिसमें दलित पिछड़ों को शासक के रूप में सहन करने का कोई स्थान और संभावना नही होती है। अब उप चुनावों में उनकी हार के बाद की बौखलाहट और उनके बेतुके बोलों को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए कि यही है असली ब्राहमणवादी भगवा रंग।