सरकार से मन्त्रियों का इस्तीफा करवाना चन्द्र बाबू नायडू की चालाक रणनीति

आईएनएन भारत डेस्क:
नई दिल्ली: भाजपा नीत एनडीए सरकार से अपने मन्त्रियों अशोक गजपति राजू और वाई एस चैधरी का इस्तीफा करवाना टीडीपी मुखिया चन्द्रबाबू की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। चन्द्र बाबू ने मन्त्रियों का इस्तीफा तो दिलवाया है परंतु अभी वे एनडीए से अलग नही हुए हैं। यह उनकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। चन्द्रबाबू नायडू जानते हैं कि आंध्र में भाजपा को कोई निर्णायक जनाधार नही है और राज्य का बंटवारा करने के कारण और वायएसआर के बेटे जगन रेड्डी के अलग दल बना लेने के कारण सूबे में कांग्रेस भी कमजोर हो गयी है। इसके अलावा उन्हें मालूम है कि यदि अभी वे भाजपा नीत एनडीए से अलग जाते हैं तो भाजपा वाएसआर कांग्रेस जैसे नये सहयोगी बनाकर राज्य में नये गठजोड़ की नींव रख सकती है।

इसके अलावा हाल ही में वामदलों विशेषकर भाकपा की पहल पर आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा दिलवाने का आंदोलन भी जोर पकड़ रहा है और इस आंदोलन में वामदलों के अलावा कांग्रेस, वायएसआर कांग्रेस सहित सूबे के सभी छोटे बड़े दल भागीदारी कर रहे हैं। अभी भी संसद का सत्र शुरू होने के साथ ही भाकपा के नेतृत्व में सैंकड़ों लोग संसद के सामने रोजाना प्रदर्शन कर रहे हैं और भाजपा-टीडीपी के अलावा आंध्र के सभी राजनीतिक दल इस आंदोलन का हिस्सा बनने आ रहे हैं। इससे पहले भी भाकपा ने पूरे राज्य में विशेष दर्जे के सवाल पर 60 दिनों तक एक बस जत्था चलाया था जिसे पूरे राज्य में भरपूर समर्थन मिला और सबसे बड़ी बात यह कि राज्य में सभी विपक्षी दल इस सवाल पर करीब आये हैं। यदि यह आंदोलन इसी प्रकार चलता रहा तो टीडीपी के खिलाफ राज्य में एक नया गठजोड़ बन सकता है। इसी दौरान कांग्रेस भी एक सीमा तक राज्य में वापसी करती दिख रही है और आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने को लेकर जारी आंदोलन में उसकी शिरकत जिस तरह से बढ़ रही है उससे जाहिर है िकवह इस आंदोलन में संभावनाएं देख रही है। अभी बेशक कांग्रेस को राज्य में बंटवारे का खलनायक समझा जा रहा हो परंतु वह नया गठजोड़ बनाकर सूबे में वापसी कर सकती है।

वैसे भी चन्द्रबाबू नायडू राजनीति के बेहद तेज तर्रार खिलाड़ी हैं। किसे कब और कैसे इस्तेमाल करना है उनसे बेहतर आंध्र में कोई नही जानता है। अपने ससुर एन टी रामाराव से लेकर वामदलों और हाल ही में मोदी तक को इस्तेमाल करके सता में काबिज आने का हुनर चन्द्रबाबू जानते हैं। 2014 के आम चुनावों में वे मोदी लहर को देखकर भाजपा की तरफ चले गये थे और उससे पहले तक वे वामदलों के साथ गलबहियंा करते रहे थे। उन्हें जब लगा कि भाजपा को साथ लेकर वे सता में आ सकते हैं तो उन्होंने फौरन पाला बदल लिया। अभी भी वो इंतजार में हैं कि भाजपा से मोल भाव करके विशेष राज्य का दर्जा हासिल करे तो आंध्र विपक्ष द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन की वे हवा निकाल सकते हैं। और ऐेसा करने में यदि वो सफल नही रहे तो भाजपा और बाकी विपक्ष में वोट बंटवारे का फायदा लेकर वे सता में बने रह सकते हैं। इसीलिए वो एनडीए में रहकर भाजपा के साथ विशेष दर्जे को लेकर भोलभाव कर रहे हैं। इसी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने की राह देख रहे बिहार के मुख्यमंत्री बीच और भाजपा के एक और सहयोगी नीतीश कुमार नेे भी चन्द्रबाबू नायडू का समर्थन किया है हो सकता है आगामी दिनों में वह भी चन्द्रबाबू की राह चुने।

बहरहाल, चन्द्रबाबू नायडू हमेशा की तरह इस एक दांव से भाजपा और आंध्र की जनता दोनों का ही साधने का प्रयास कर रहे हैं और घटते भाजपा के जनाधार को समझते हुए अपने जनाधार को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि वो ऐसा नही करते हैं तो भविष्य में कांग्रेस, वायएसआर कांग्रेस और वामदल उनके लिए खतरा बन सकते हैं और ऐसे में भाजपा से उनका गठजोड़ उन्हें फायदे की जगह नुकसान ही पहंुचायेगा।