उप चुनाव में सपा को बसपा का समर्थन बन सकता है नये गठजोड़ की नींव

आईएनएन भारत डेस्क:
उ. प्र. के उप चुनावों में जिस प्रकार बसपा ने सपा उम्मीदवारों के समर्थन की घोषणा की है वह आगामी दिनों में सूबे में नये गठजोड़ की नींव बन सकता है। बताया जा रहा है कि सपा और बसपा के कई प्रमुख नेता और रणनीतिकार इस पिछड़े-दलित गठजोड़ के लिए प्रयासरत थे। उप चुनावों में बसपा सुप्रीमों द्वारा सपा उम्मीदवारों के समर्थन की घोषणा के साथ ही इस महागठजोड़ की राह खुलती नजर आ रही है। बेशक यूपी के मुख्यमंत्री योगी इस पर चुटकी ले रहे हों परंतु यह तय माना जा रहा है कि आने वाले समय में यह गठजोड़ भाजपा के लिए भारी सिर दर्द बनने वाला है।

गोरखपुर और फूलपुर के उप चुनावों में बेशक यह सपा और बसपा के बीच गठजोड़ दिखाई पड़ता हो परंतु यह एक बड़े महागठजोड़ का आगाज है। इस गठजोड़ में केवल सपा और बसपा नही बल्कि प्रत्यक्ष रूप से निषाद पार्टी और अपना दल का कृष्णा पटेल ग्रुप भी शामिल है। इसके अलावा कांग्रेस ने जिस प्रकार से दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार देकर अगड़े वोटों में सेंध लगाने और अगड़े वोटों को भाजपा के पक्ष में एकजुट होने से रोकने का इंतजाम किया है तो कांग्रेस भी अप्रत्यक्ष रूप से इस महागठजोड़ की रणनीतिक हिस्सेदार बन गई है।

इसके अलावा राज्यसभा के लिए यदि मायावती उम्मीदवार बनती हैं तो जाहिर है कि रालोद भी मायावती का समर्थन करते हुए इस आगामी महागठबंधन का हिस्सा बनना चाहेगी।

यूपी से 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं और अभी की सीटों की संख्या को देखते हुए 8 भाजपा के राज्यसभा सदस्य और 1 सपा के सदस्य का चुना जाना तय है। ऐसे स्थिति में यदि बसपा और सपा दोनों अपने अपने उम्मीदवार मैदान में उतारती हैं तो जाहिर है कि उसका लाभ सीधे भाजपा को मिलेगा और वह अपना 9वां उम्मीदवार आसानी से राज्यसभा में भेज सकेगी। परंतु इस गणित को समझते हुए सपा और बसपा ने आपस में हाथ मिलाना उचित समझा और राज्यसभा, उप चुनावों और विधानपरिषद चुनावों के लिए समझौता कर लिया है। मौजूदा गणित के हिसाब से एक उम्मीदवार को राज्यसभा में जाने के लिए लगभग 38 वोटों की आवश्यकता है। सपा के पास 47 विधायक हैं और एक सीट जीतने के बाद उसके पास बचते हैं 9 वोट जिसमें यदि बसपा के 19 वोट और कांग्रेस के 7 वोट जोड़ दिये जाये ंतो हो जाते हैं 35 वोट। अब बसपा को महज दो वोटों की कमी है जिसमें एक निषाद पार्टी का वोट और एक रालोद]एक निर्दलीय का वोट जोड़ दे तो उसका पूरे 38 वोटों का आंकड़ा पूरा हो जाता है। ध्यान रहे कि गोरखपुर से सपा उम्मीदवार निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद का बेटा ही उम्मीदवार है और एक प्रकार से यह निषाद पार्टी और सपा के बीच अप्रत्यक्ष गठजोड़ के तहत ही उम्मीदवार है। रालोद प्रमुख अजीत सिंह की मायावती से नजदीकी के चलते उनके दल के वोट को भी बसपा के खाते में मानकर चला जा रहा है।

इस प्रकार गोरखपुर और फूलपुर उप चुनाव जहां सपा की जीत और बसपा सुप्रीमों के लिए एकबार फिर से राज्यसभा की राह खोलते नजर आ रहे हैं तो वहीं यह आगामी दिनों में इसे दोनों दलों के बीच एक नये रिश्ते की नींव की तरह भी देखा जा सकता है। वैसे भी मायावती की नाराजगी सपा के मौजूदा मुखिया से अखिलेश यादव से नही उनके पिता और चाचा से ही मानी जाती थी। जिनका मौजूदा सपा में कोई प्रभाव और दखल नही है। ऐसे में नये गठजोड़ होने और यूपी में नये सियासी गणित बनने में कोई रूकावट नजर नही आती है। इस गठजोड़ की आहट से भाजपा कितनी तकलीफ में इसे मुख्यमंत्री योगी की जुमलेबाजी और बाकी भाजपा नेताओं के बयानों से समझा जा सकता है। मायावती से ज्यादा भाजपा को पुराने गेस्ट हाउस काण्ड की याद सता रही है। गेस्ट हाउस काण्ड़ वाली सपा तो बदल चुकी है परंतु बसपा को तोड़ने वाली भाजपा और सीबीआई जांच शुरू करवाने वाली भाजपा को शायद बसपा प्रमुख मायावती अभी भी भूली नही होंगी। यूपीए 2 के समय राज्यसभा में भाजपा द्वारा बार बार कांग्रेस पर सीबीआई के इस्तेमाल करने के आरोपों पर मायावती ने एकबार साफ साफ कह भी दिया था कि मेरे खिलाफ तो सीबीआई के सारे झूठे मामले भाजपा ने ही शुरू किये थे।

बहरहाल, उप चुनावों के नतीजे कुछ भी हों उ. प्र. से एक नये राजनीतिक महागठबंधन की उम्मीद तो जगी है और त्रिपुरा चुनावों में हार के बाद जिस तरह से वाम राजनीति विशेषकर माकपा नेताओं के सुर बदले हैं वह इस महागठबंधन की आस को और मजबूत कर रहा है।