बौखलायी सरकार को पिंजरे के तोते का सहारा

आईएनएन भारत डेस्क:
ललित मोदी, निशाल-नीरव मोदी, मेहुल चोकसी जैसे भगौडों ने मोदी सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया है और सोमवार से शुरू होने वाला बजट का शेष सत्र मोदी सरकार और भाजपा के लिए परेशानियां लेकर आने वाला था। परंतु भारतीय राजनीति में जुमलेबाजी और नकारात्मकता का प्रतीक बन रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र की टोली ने फिर से एकबार घोटाले का जवाब देने के लिए घोटाला ही चुना है। कार्ति चिदंबरम की गिरफ्तारी भाजपा की संसद में विपक्षी हमले का जवाब देने की योजना से अधि कुछ भी नही है।

कार्ति मामले में ऐसा कोई भी नया खुलासा नही हुआ अथवा ऐसा कोई नया मोड़ नही आया था कि उन्हें इस प्रकार विदेश से लोटते ही गिरफ्तार करना पड़ता। कार्ति पर लंबे समय से मामला लंबित है और यदि विदेश भी गये थे तो कोर्ट की इजाजत से ही विदेश गये थे और वापस भी लोट आये लेकिन जिस प्रकार एयरपोर्ट से उन्हें गिरफ्तार किया गया वह सीबीआई की मंशा पर सवाल खड़े करता है।

असल में सीबीआई ने इन्द्राणी और पीटर मुखर्जी के बयानों का हवाला देकर कार्ति की गिरफ्तारी की है। याद रहे इन्द्राणी जहां अपनी बेटी शीना की हत्या के मामले में कैद है और पीटर मुखर्जी धोखाधड़ी और धन शोधन के मामले में जेल में हैं। अभी यह परखा जाना बाकी है कि इन दोनों गंभीर मामलों के आरोपियों के बयान कितने विश्वसनीय हैं। इन गंभीर मामलों के बयानों की विश्वसनीयता अदालत में परखी जायेगी विशेषकर बार बार बयान बदलने और लगातार पुलिस को गुमराह करने में माहिर इन्द्राणी मुखर्जी के बयानों की।

वैसे भी कार्ति का मामला बेहद कम रकम की तथाकथित घूस लेने का मामला है। उन पर 4 करोड़ की कथित घूस लेने का आरोप सीबीआई ने मढ़ा है परंतु अभी त कवह केवल 10 लाख के कुछ सबूत ही इस मामले में जुटा पायी है। कानून के जानकारों का मानना है कि यह मामला बेहद कमजोर है और ज्यादा लंबे समय तक बचाव पक्ष के वकीलों के सामने इसका ठहर पाना संदिग्ध जान पड़ता है। ऐसे मामले में कार्ति की गिरफ्तारी साफतौर पर सरकार की सोमवार से शुरू हो रहे संसद में बचाव की रणनीति से अधिक कुछ भी नही है।

वास्तव में सरकार की नीयत किसी घपले घोटाले की जांच करके दोषियों को सजा दिलवाने और जनता का पैसा वापस लाने से अधिक पूरे मामले को आरोप प्रत्यारोप की बहस में फंसाने में अधिक है। सीबीआई का यह काम कई निशाने एक साधने का प्रयास है। एक इससे नीरव, माल्या और मेहुल जैसे भगौडों पर केन्द्रित होने के बजाय बहस अब कांग्रेस का भ्रष्टाचार बनाम भाजपा का भ्रष्टाचार बनकर रह जायेगी। दूसरे इस आरोप प्रतयारोप की राजनीति में एनपीए के दोषी ओर मोदी के करीबी अंबानी और अडाणी जैसे जनता के पैसे के लुटेरों से जनता का ध्यान हटाने में आसानी रहेगी। तीसरा और सबसे अहम बजट के शेष बचे सत्र में संसदीय कार्य में गतिरोध पैदा करके बजट के अवांछित और जन विरोधी पहलूओं पर बहस से बचा जा सकता है। पिछले सालों में यह सत्ताधारी दल की रणनीति रही है कि जब कभी भी किसी विकट परिस्थिति का सामना करे तो कोई विवाद खड़ा करके संसद में गतिरोध पैदा कर दें। यही संसद के गतिरोध की पटकथा रचने का भाजपा नीत एनडीए का इस बार भी प्रयास है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लंबे लंबे जुमले छोड़ने वाले मोदी के बारे में देश की जनता जान चुकी है कि उनकी बातें जुमलेबाजी से अधिक कुछ भी नही है। और इस बार मोदी ने फिर से अपनी जुमलेबाजी को आधार देने के लिए सीबीआई नामक तोते का सहारा लिया है।