पैडमैन : पैड के बारे में सोचने पर मजबूर करती पैडमैन

Film Reviewer: Smriti Mala
फ़िल्म: पैडमैन
निर्देशन: आर बाल्की
अभिनय: अक्षय कुमार, राधिका आप्टे, सोनम कपूर
लेखक: आर बाल्की स्वानंद किरकिरे
संगीत: अमित त्रिवेदी
रिलीज डेट:  9 फरवरी 2018
रनिंग टाइम: 2 घंटे 20 मिनट

शैली: बायोपिक सोशल  ड्रामा

अरुणाचलम  मुरुगनंथम के जीवनी से प्रेरित, अक्षय कुमार की पैडमैन महिलाओं के लिए सस्ते सैनिटरी पैड बनाने के इर्द-गिर्द घूमती है। इस बायोपिक को कल्पनिकता के साथ जोड़कर एक सोशल ड्रामा का रूप देकर अच्छे से बनाया गया है। इस फिल्म के द्वारा सिनेमा का एक आयाम पूरा होता दिखता है। जिस मुद्दे पर लोग बात नहीं करना करते थे। आज उस पर पूरे देश में चर्चा हो रही है। एक तरह का सामाजिक जागरुकता का मुद्दा बन गया है।

कहानी: पैडमैन फ़िल्म की कहानी मध्य प्रदेश के एक गांव के एक सीधे-साधे लक्ष्मीकांत चौहाण की है, जो अपनी पत्नी गायत्री से बहुत प्रेम करते हैं और उनको महावारी के दौरान गंदा कपड़ा उपयोग करने से होने वाले बीमारियों से बचाना चाहते हैं। इसके लिए वह दुकान से सेनेटरी पैड खरीद कर लाते हैं। जो महंगा होता है। महंगा होने के कारण उसे गायत्री उपयोग करने से मना कर देती है। लक्ष्मी चौहाण सस्ता पैड बनाना चाहते हैं, ताकि वह उनकी पत्नी, बहन और गांव की अन्य महिलाएं उसका उपयोग कर सके। लेकिन हर बार असफल होते हैं। इस दौरान लोग उन्हें मानसिक रूप से विकृत समझने लगते हैं। उनके परिवार और पूरे गांव को उन पर शर्मिंदगी महसूस होती है। गांव में पंचायत लगाई जाती है। जिसके बाद अक्षय कुमार गांव छोड़ कर चले जाते हैं और दूसरी जगह दूसरे गांव जाकर फिर से  पैड बनाने की कोशिश में लग जाते हैं। इस कोशिश में सोनम कपूर उनकी पहली ग्राहक बनती है और उनका साथ देती है। लक्ष्मी चौहाण सस्ता सेनेटरी पैड मेकिंग मशीन बनाने में सफल होते हैं। उन्हें यूएनओ बुलाया जाता है और लेक्चर देने के लिए उन्हें पद्मश्री भी मिलता है। उनके गांव वाले उनको सम्मानित करते हैं। उनके परिवार और पूरे गांव को उन पर गर्व महसूस होती है।

कहानी को अक्षय कुमार और राधिका आप्टे पूरा कर सकते थे। अक्षय को इतना जुनूनी दिखाया गया है कि वह अकेले ही सस्ता सैनिटरी पैड बनाने की मशीन बना लेते है और पूरी कहानी को अकेले ही अंजाम दे सकते थे। यहां सोनम कपूर की जरूरत बहुत थोड़ी सी थी लेकिन सोनम के किरदार को जबरदस्ती लंबा करने के कारण कहानी   का यह एंगल बहुत फिल्मी लगता है। दूसरी बात कहानी को और भी कम समय में कहा जा सकता था।

संवाद: संवाद फिल्म के अनुसार साधारण बोलचाल की भाषा में अच्छे लगते हैं। कुछ जगहों पर सीरियस संवाद है जो कॉमिक लगते हैं, जैसे “चरस गांजा दे रहे हो क्या ”  और कुछ संवाद को मर्मिक दशाने मे बकवाश लगते है जैसे “मर्द होने का मजा अंदर की औरत को जगाने से आता है”।

अभिनय: अक्षय कुमार ने अपने रोल को ठीक-ठाक निभाया है। सोनम और राधिका आप्टे  के साथ-साथ बाकी कलाकार भी अपनी जगह पर सही निभाते हैं।

संगीत: “आज से तेरी” गाना का धुन सुना सुना लगता है, लेकिन  शब्द नए लगते हैं और कहानी को आगे बढ़ाते हैं। पैडमैन हूबहू भी अच्छे है।

सकारात्मक पक्ष : फिल्म का मुद्दा,  निर्देशन

नकारात्मक पक्ष : फिल्म की लंबाई

निष्कर्ष : महिलाओं की महावारी के दौरान होने वाले समस्याओं को लेकर बनायी गयी फिल्म है, जो प्रशंसनीय है। ये पूरे परिवार के साथ देखने लायक हैं।

रेटिंग : 3/5