आम आदमी की आंखों में धूल झौंकता ‘जुमला सरकार‘ का ‘जुमला बजट‘

महेश राठी
मोदी सरकार में वितमंत्री अरूण जेटली ने 1 फरवरी को बजट पेश करते हुए इस किसानों के लिए हितकारी बजट बताया और कहा कि सरकार का पूरा ध्यान गांवों और ग्रामीणों के ईज आॅफ लिविंग अर्थात रहन सहन को अच्छा बनाने पर है। इसके अलावा सरकार ने बजट में घोषित स्वास्थ्य बीमा योजना को भी दुनिया की सबसे बड़ी बीमा योजना बताया। बजट में ऐसी ढ़ेरों बाते हैं जो बजट को खुशनुमा बातों वाला बजट बनाती हैं। परंतु वास्तव में बजट का तर्कसंगत ठोस विश्लेषण खुशी को खुशफहमी बना जाता है।

बजट दावा करता है कि किसानों को डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया गया है। परंतु देश में किसानों की बढ़ती बदहाली और उनकी आत्महत्याओं का ना रूकने वाला सिलसिला सरकार के इस दावे को गलत और झूठा साबित करता है। यदि हम कृषि के विकास और बेहतर प्रदर्शन के लिए मध्य प्रदेश को उदाहरण लें तो जेटली के किसान पक्षीय बजट को समझना आसान हो सकता है। मध्य प्रदेश ने 2012 से 2017 तक कृषि क्षेत्र के जीडीपी में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाई है और मध्य प्रदेश का यह बेहतरीन प्रदर्शन एक विश्व रिकाॅर्ड बन गया है। अब इस विश्व रिकाॅर्ड बनाने वाले मध्य प्रदेश में ही दूसरे आंकड़ों पर निगाह डाले तो इस आंकड़ेबाजी पर टिके प्रदर्शन की वास्तविकता सामने आ जाती है। जहां एक तरफ कृषि क्षेत्र में अपने प्रदर्शन से मध्य प्रदेश विश्व रिकाॅर्ड बना रहा था तो वहीं दूसरी तरफ किसान लगातार आत्महत्या कर रहे थे। इसी मध्य प्रदेश में पिछले दस सालों में 16 हजार किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। केवल इतना ही नही फरवरी 2016 से फरवरी 2017 के बीच 1982 किसान आपनी जान देने के लिए मजबूर हुए और यह वो साल था जिसमें प्रदेश में प्याज का बंपर उत्पादन हुआ और उसी प्याज उत्पादन करने वाले क्षेत्र में किसानों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया जिसमें मंदसौर में पांच किसान पुलिस की गोली से मारे गये। जिस साल प्याज का बंपर उत्पादन हुआ उसी साल सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की अर्थात आत्महत्याओं में बंपर बढ़ोतरी।

मोदी सरकार के वितमंत्री 2022 तक किसानों का लाभ दोगुना करने की बात कर रहे हैं। परंतु यह किस प्रकार होगा उसकी पूरी प्रणाली और रोडमेप उनके पास नही है। सरकार यदि किसानों को लाभदायक न्यूनतम समर्थन मूल्य देना तय भी करती है तो उसके पास उस मूल्य पर खरीद की कोई व्यवस्था नही है। अभी सरकार के पास देशभर में कुल 8 हजार मण्डियां हैं जबकि किसानों के उत्पादों की खरीद के लिए उसे 42 हजार से अधिक मण्ड़ियों की आवश्यकता है। इस बजट में सरकार 22 हजार हाटों को कृषि बजारों में बदलने की बात कह रही है। इसके अलावा किसानो के उत्पादों की खरीद को स्थायी बनाना और खरीद को श्रेणियों में बांटकर खरीदना भी किसानों से सुगम खरीद की राह की एक बड़ी रूकावट है। सरकार उससे कैसे निपटेेगी अभी सरकार को यह भी समझाना है। इसके अलावा जेटली ने दावा किया कि अभी भी सरकार किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप उनकी लागत में 50 प्रतिशत जोड़कर लाभ दे रही है। जबकि यह सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कह चुकी हैं कि वे स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार कीमत देने में असमर्थ हैं। ऐसा ही बयान सरकार संसद में भी दे चुकी है और कह चुकी है कि इससे बाजार पर नाकारात्मक असर पडेगा। दरअसल यदि सरकार किसानों का सारे उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार खरीदना तय करती है तो देश के कारपोरेट घरानों को भी किसानों से प्रतिस्पर्धी दामों पर उनके उत्पादन को खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और उनके लिए यह एक भारी घाटे का सौदा होगा। यहां तक कि किसानों के उत्पादों का दाम कम करने और कारपोरेट घरानों को फायदा देने के लिए ही आयात निर्यात नीतियां भी तय की जाती हैं। नासिक के प्याज को ही हम उदाहरण लें तो किसान की फसल के समय प्याज का दाम 1 से 2 रूपये किलो तक ही बाजार में रहता है परंतु सीजन निकलने पर वही प्याज 40-50 से लेकर कभी कभी 80-100 रूपये किलो तक भी पहंुचती है। इसीलिए किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार लाभकारी मूल्य देना और उस मूल्य पर किसानों से खरीद सुनिश्चित करना एक चुनावी जुमला भर है और जिसे 2014 में भाजपा के सत्ता में आने से पहले से ही दोहरायाा जा रहा है और अब 2019 की आहट के कारण इसे अधिक जोर से दोहराया जाने लगा है।

इसके अलावा बजट भाषण में जेटली ने किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से 11 लाख करोड़ रूपये के कर्ज देने का वादा भी किया है। हालांकि यह कर्ज ही भारतीय किसान की आत्महत्या करने की असली वजह बना हुआ है। उसे और कर्ज से ज्यादा पुराने कर्ज की माफी और अपने उत्पाद के लाभकारी मूल्य की अधिक जरूरत है। वैसे देश की संसद में मोदी सरकार मान चुकी है कि किसानों पर 14.5 लाख करोड के कर्ज का बोझ है। सरकार को चाहिए कि बजट में किसानों को इस कर्ज से मुक्त करने का प्रावधान करे। उसके लिए सबसे पहले कर्ज माफी और फिर उसकी लागत पर डेढ़ गुना लाभ देना सुनिश्चित करे। जहां तक कर्ज माफी का सवाल है किसानों के सर पर कर्ज की भी कई श्रेणियां है। परंतु सरकार जब भी कर्ज माफी की बात करती है तो वह सरकारी बैंकों और सहकारी बैंकों के कर्ज की माफी की बात करती है। लेकिन किसानों के लिए सबसे खराब कर्ज और कहें तो जानलेवा कर्ज महाजनी कर्ज और प्राइवेट वित्तीय संस्थानों का कर्ज होता है। उसका आंकलन सरकार कभी करती ही नही है।

वित्तमंत्री ने इस बजट में राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और सभी सांसदों के वेतन में वास्तविक बढ़ोतरी की है परंतु देश के अन्नदाताओं को यह सुख नसीब नही हो पाया है। वास्तव में किसानों को भी पिछले चार साल से जारी खुशनुमा बातों की जगह वीआईपी लोगों के जैसे वास्तविक खुशी दी जाती तो ज्यादा बेहतर था। परंतु अफसोस इस बात का है कि इन नीति निर्धारक वीआईपी लोगों के चेहरों की चमक और खुशनुमा बातें ही अन्नदाता के घरों को अंधेरे से भर रही है।

स्वास्थ्य बीमा योजनाः दुनिया की सबसे अधिक विफलता की संभावना वाली योजना
ओबामा केयर की तर्ज पर जेटली ने एक स्वास्थ्य बीमा योजना की घोषणा बजट में की है। सरकार इसे दुनिया की सबसे बड़ी बीमा याोजना के तौर पर पेश कर रही है। हालांकि 2008 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की पहली बार शुरूआत की गई थी जिसमें गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों को 30 हजार रूपये के कवर का प्रावधान था। मौजूदा मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 2016-17 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना के तहत इस कवर राशि को बढ़ाकर 1 लाख रूपये तक कर दिया गया था। उस समय भी इसे दुनिया की सबसे बड़ी बीमा योजना के रूप में पेश किया गया था। अभी इसमें बदलाव केवल राशि और कवर किये जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ाने भर का है। परंतु सरकार जब दुनिया की तथाकथित सबसे बड़ी योजना की बात करती है तो यह बताना भूल जाती है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना की विफलता की कहानी का विस्तार भर है। अबकी बार जैसी योजना वितमंत्री ने घाोषित की है वह दुनिया की सबसे अधिक विफलता की संभावना वाली योजना है। पिछली स्वास्थ्य बीमा योजना गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों पर केन्द्रित थी तो उसमें कवर किये जाने वाले तबकों की पहचान आसान थी और उसके बावजूद भी वह योजना 2014 तक लक्षित तबके के केवल 10 प्रतिशत तक ही पहंुच बना पायी थी। परंतु मौजूदा योजना में 10 करोड़ परिवारों के 50 करोड़ लोगों की पहचान का क्या फार्मूला होगा। इसके अलावा कौन से अस्पताल होंगे, उनकी सूची लक्षित लोगों तक कैसेे पंहुचेगी। कौन सी कंपनिया होंगी जिन्हें सरकार प्रीमियम देगी और उसके बदले में वह लोगों के इलाज खर्च को किस प्रकार वहन करेंगी।

वास्तव में हमारे देशा में स्वास्थ्य बीमा, विशेषकर सरकार द्वारा मुहैया कराये जाने वाले फ्री स्वास्थ्य बीमा को लेकर कई तरह की परेशानियां हैं। जिन पर सरकार कभी चर्चा ही नही करना चाहती है। एक तो इस बीमा में कवर किये जाने वाले लोगों को अक्सर इसकी पूरी जानकारी ही नही होती है। दूसरे सूचीबद्ध अस्पताल इसे मुहैया कराने में आनाकानी करते हैं जिससे निपटने के लिए सरकारों के पास कोई प्रभावी व्यवस्था ही नही है अथवा सरकारें जानबूझकर ऐसी व्यवस्था बनाना ही नही चाहती हैं। तीसरे इस योजना कवर में आने वाले लोगों को विशेष पहचान पत्र और सूचीबद्ध अस्पतालों की सूची अथवा उसकी जानकारी होनी चाहिए। जिसकी कोई व्यवस्था सरकार करती ही नही है। इसके अलावा इस योजना की विफलता का सबसे बड़ा कारण इसका अस्पतालों के बाहरी रोगी विभाग अथवा ओपीडी में लागू नही होना है। यह बीमा योजना व्यक्ति के बीमार होने की नही बल्कि केवल अस्पताल में दाखिल होने की स्थिति में प्रभावी होती है। असल में सरकार इन योजनाओं को विफल होने और राजनीतिक जुमलेबाजी के लिए ही बनाती है। इसे 50 करोड़ लोगों के इलाज के लिए आवंटित धनराशि में पढ़ा जा सकता है। सरकार डेढ़ लाख हैल्थ एण्ड वेलनैस सेंटर खोलने की बात कह रही है और केवल 20 हजार करोड़ इसके लिए आवंटित किया है। दरअसल इस योजना का हश्र भी 2016-17 में मोदी सरकार की 1 लाख कवर वाली स्वास्थ्य संरक्षण योजना के जैसा ही होने वाला है जो आज तक लागू नही हुई। सरकार की मौजूदा योजना की घोषणा भी जुमलेबाजी ही बनकर रह जाने वाली है। ऐसा नही है कि इस प्रकार की स्वास्थ्य योजना कहीं प्रभावी तरीके से लागू नही हुई हो। वियतनाम ऐसी योजना को प्रभावी तरीके से लागू करने का एक अच्छा उदाहरण है तो वहीं पड़ोसी देश श्रीलंका और थाईलैण्ड़ ने भी इसे तुलनात्मक रूप से प्रभावी तरीके से अजमाया है। यदि सरकार की मंशा ठीक हो तो इस योजना को घोषणा और जुमलेबाजी से आगे बढ़ाया जा सकता है।

सुक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को बजट में कर में छूट देते हुए 250 करोड तक का कारोबार करने वाली कंपनियों को कर में 5 प्रतिशत की छूट दी गई है। परंतु सवाल नोटबंदी और जीएसटी के कारण ठप हो गये उनके कारोबार की है। जब कारोबार कर तो सेकेंडरी चीज है पहला सवाल तो उनके कारोबार को शुरू करवाने का है कि बंद हो गई यूनिटों को कैसे शुरू करवाया जाये।

ठीक यही स्थिति महिलाओं को लेकर भी है। वैसे महिलाओ की हमेशा अनदेखी बजट में की जाती रही है और भारत सरकार का बजट हमेशा उसके समाज की तरह पुरूष वर्चस्व वाला ही होता है। परंतु इस बजट में महिलाओं के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि उज्ज्वला गैस सिलेंडर योजना को बताया गया है। मानों कि समाज मे महिलाओं की हिस्सेदारी रसोई तक ही सीमित है। महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का सवाल लंबे समय से लटका हुआ है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने उसके बारे में बडी़ बड़ी बाते की थी परंतु सत्ता में आने के बाद उस सवाल पर वह खामोश है। रही उज्जवला याोजना की बात तो वह गरीबों और महिलाओं के लिए एक भुलावे वाली योजना है। ग्रामीण क्षेत्रों में और गरीबों को गैस कनैक्शन योजना एक अच्छी पहल हो सकती थी परंतु बुनियादी तौर पर जुमला सरकार ने इसे एक ‘खाली सिलेंडर योजना‘ बनाकर रख दिया है। 2017 तक गैस कनैक्शनों में 16.26 प्रतिशत की दर से बढ़ातरी दर्ज की गई थी परंतु वहीं गैस उपयोग में यह बढ़ोतरी महज 9.83 प्रतिशत ही दर्ज की गई जो कि 2014-15 की दर्ज बढ़ोतरी से भी कम है। इसके अलावा परिवारों के सिलेंडर उपयोग में भी औसतन गिरावट दर्ज की गई है। उज्ज्वला योजना के प्रारंभ होने से पहले जहां प्रति परिवार औसतन 6.67 सिलेंडर उपयोग होते थे अब यह औसत गिरकर 5.6 सिलेंडर प्रति परिवार रह गई है।

शिक्षा और शिक्षा के डिजिटलीकरण की भी यही स्थिति है। जबकि देश में अनेकों गांवों में बिजली नही है और यदि है भी तो उसकी आपूर्ति सुचारू नही है और ऐसी स्थिति में अरूण जेटली शिक्षा के डिजिटलीकरण की बात कर रहे हैं। वास्तव में यह दावा और लक्ष्य अव्यवहारिक और तुगलकी अधिक जान पड़ता है।

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना प्रधानमंत्री की एक अति महत्वकांक्षी झण्ड़ाबरदार योजना थी और जितने बड़े बड़े दावे और बाते इस योजना को लेकर किये गये थे उसकी विफलता उन बातों से भी बड़ी है। जुलाई 2017 तक इस योजना के तहत 30.36 लाख युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया जिसमें से केवल 2.9 लाख को ही रोजगार की पेशकश मिली। इस सरकार और मौजूदा बजट की विशेषता यही है िकवह पिछली भयावह विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए ही नये बड़े बड़े दावे और जुमलेबाजी करती है। मौजूदा कौशल विकास की भी यही हालत है कि बल्कि कई जानकार तो यह तक भी कह रहे हैं कि ऐसे कौशल विकास के कईं केन्द्र तो केवल कागजोें पर ही चल रहे हैं। असल में यह देश में कुशलतापूर्वक नये बेरोजगार निर्माण की सकुशल योजना है।

वास्तव में मोदी सरकार और बजट का जोर ढ़ांचागत विकास और मंहगाई को कायम रखने पर ही है। दरअसल जिस तरह का तमाशा एफडीआई लाने के लिए मोदी सरकार द्वारा किया जाता रहा है उसके अनुपात में आने वाला एफडीआई ना के बराबर ही है ऐसी स्थिति में विनिर्माण को गति देने के लिए सरकार लगातार ढ़ांचागत विकास पर भारी खर्च कर रही है। यहां तक कि इसके लिए राजकोषीय घाटे को कम करने के लक्ष्य को अनदेखा कर रही है। ढ़ाचागत विकास पर इस भारी खर्च से कम से कम विनिर्माण के क्षेत्र में एक उछाल दिखाने में सरकार कामयाब हो पा रही है। इसके अलावा सीमेंट और स्टील उद्योग कोे भी इससे फायदा मिल रहा है। साथ ही नये आर्थिक सुधारों पर टिके विकास में मंहगाई का भी एक विशेष योगदान है। मसलन कि हम प्याज अथवा टमाटर को एक उदाहरण के तौर पर लें तो इस मंहगाई के योगदान को समझा जा सकता है। जब किसान प्याज का उत्पादन करता है तो सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण और खरीद एवं आयात नीतियों तक को मिलाकर ऐसे प्रयत्न करती है कि किसान को मिलने वाला वास्तविक दाम अपने न्यूनतम स्तर पर चला जाता है। कई बार तो किसान के यातायात का खर्च भी उसे मिलने वाले दाम से कम होता है और किसान अपने उत्पाद को सड़कों पर फेंकने के लिए मजबूर होता है। ऐसे समय में कारपोरेट घराने किसानों के उत्पाद को मनचाहे दाम पर खरीदकर उसका भण्डारण करते हैं। इसके बाद सीजन निकलने पर बाजार में एक कृत्रिम कमी पैदा करके किसानों के खरीदे गये उत्पाद को मनमाने दामों पर बेचकर खुदरा व्यापार में एक उछाल दिखाया जाता है। अनिवार्य वस्तुओं के दामों में इसी रणनीति के तहत मंहगाई के सहारे खुदरा व्यापार कंपनियां उपभोक्ताओं और किसानों की बदहाली की कीमत पर जीडीपी की वृद्धि दर में उछाल की वाहक बनती हैं और सरकार एक बदहाल अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे तेज विकास करती अर्थव्यवस्था होने की जुमलेबाजी करती है। इस तरह से यह विकास और अर्थव्यवस्था का तेजी से दौड़ता इंजन देश के आम आदमी, मजदूरों किसानों और मध्य वर्ग की लूट की शर्त पर दौड़ता है और अपनी रोजाना की ऐतिहासिक जुमलेबाजी से देश के आम आदमी की आंखों में धूल झौंकता जाता है।