कासगंज प्रकरण में अधिकारियों पर कार्रवाई और भगवा राजनीति की भूमिका

आईएनएन भारत डेस्क:

कासगंज में 26 जनवरी को हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद यूपी के राज्यपाल द्वारा इस घटना को शर्मनाक बताये जाने के बाद प्रदेश सरकार ने कार्रवाई करते हुए तुरंत जिले के एसपी का तबादला कर दिया था। बेशक यह तबादला कासगंज में हिंसा को नही रोक पाने के नाम पर हुआ हो परंतु इस तबादले के अपने निहितार्थ हैं। इस तबादले के अर्थ उस समय और उल्लेखनीय और अहम हो जाते हैं जब विगत बृहस्पतिवार को यूपी के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डीजी होमगार्ड सूर्य कुमार शुक्ला द्वारा राम भक्तों के साथ राम जन्मभूमि निर्माण की शपथ ली गई। इस कार्यक्रम का आयोजन प्रदेश की राजधानी में राम भक्तों द्वारा किया गया था। जिसमें शामिल होकर डीजी सूर्य कुमार शुक्ला ने राम मंदिर निर्माण की शपथ ली और जब इस मसले पर विवाद गहराया तो मुुख्यमंत्री ने उनसे जवाब तलब किया और फोन पर बातचीत करके पूरे मामले की जानकारी भर ली।

वहीं दूसरी तरफ कासगंज मामले को लेकर जिले के एसपी का तबादला कर दिया गया। उनका दोष यह नही था कि वह सांप्रदायिक हिंसा को रोकने में कामयाब नही हुए। यदि दोष यही होता तो जाहिर है कई पुलिसकर्मी इस कार्रवाई की चपेट में आते। असल में उनका पहला दोष यह था कि उन्होंने तिरंगे की आड़ में भगवा यात्रा निकाल रहे भगवा गिरोह के झूठ को खारिज करते हुए कह दिया कि कासगंज में कोई ‘पाकिस्तान जिंदाबाद‘ के नारे नही लगे थे। इसके अलावा उन्होंने यह भी आशंका जाहिर की कि इस पूरी हिंसा का एक राजनीतिक ऐंगल भी है और हो सकता है कि राजनीतिक लाभ के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया हो। अब उनके ऐसे नजरिये ने 2018 में एक नये बनने वाले मुज्जफरनगर पर रोक लगा दी। किसी पुलिस अधिकारी का ऐसे कहने का वाजिब कारण और उनका अपना विश्लेषण और वाजिब विश्लेषण हो सकता है जिसे सरकार को समझकर ईमानदारी से काम करना चाहिए जिससे ऐसी घटना की पुनारावर्ती ना हो। परंतु शायद सरकार की ईमानदारी इस हिंसा के पूरे सूबे में फैलने की थी। वहीं दूसरी तरफ बरेली के जिलाधिकारी ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा कि यह एक नया अंदाज हो गया है कि कुछ लोग तिरंगा झण्ड़ा लेकर मुस्लिम आबादी में घुस जाते हैं और वहां पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। उन्होंने जायज सवाल उठाते हुए कहा कि आप जब ऐसा करते हैं तो उनकी देशभक्ति पर सवाल उठा देते हैं। अब इतनी साफ और जरूरी राय को सोशल मीड़िया पर साझा करना किस तरह से अनुशासन भंग करना हो सकता है। परंतु यूपी सरकार को बरेली के डीएम राघवेन्द्र विक्रम सिंह की यह साफगोई सहन नही हो रही है और डीएम बरेली के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश बरेली कमिश्नर पीवी जगनमोहन ने एक जांच के बाद कर डाली है।

उपरोक्त तीन अलग घटनाएं यूपी सरकार और सूबे की सताधारी भगवा ब्रिगेड की मानसिकता को जाहिर कर देती है कि दो नौकरशाहों का हिंसा के खिलाफ और बुनियादी तौर हिंसा को रोकने का नजरिया सहन नही है। परंतु सरकार अनुशासन भंग करके गैर कानूनी तरीके से राम जन्म भूमि निर्माण करने की शपथ लेने वाले पुलिस अधिकारी पर दयालू है। तीन अधिकारियों पर अलग अलग कार्रवाई यूपी सरकार की मंशा का पता दे देती है कि उसका मकसद क्या और कासगंज की घटना के पीछे का प्रेरक मानस कौन सा है। ध्यान रहे पिछले आम चुनाव 2014 से पहले 2013 में एक मुज्जफरनगर हुआ था और अबकी बार 2019 से पहले 2018 में कासगंज के रूप में एक और मुज्जफरनगर की तैयारी थी। वैसे यह साल की शुरूआत भर है, 2019 आगे आने वाला है और अभी समर शेष है और कई कासगंज बाकी हैं।