उन्मादी भगवा ब्रिगेड और 68 साल बाद भी गणतंत्र पर उठते सवाल

इस गणतंत्र दिवस पर देश के जागरूक नागरिकों की चिंता जहां गणतंत्र और स्वतंत्रता को बचाने और नागरिक अधिकारों को और विस्तार देने की है तो वहीं भाजपा-आरएसएस सहित पूरे भगवा गिरोह की फिक्र राजस्थान और मध्य प्रदेश के चुनाव हैं। भगवा गिरोह के एजेंडें में ऐसी जीत का लक्ष्य है जिससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को हराने की पटकथा और मजबूत और निर्णायक हो जायेगी। वो लगातार जीत रहे हैं और देश लगातार हार रहा है।

पद्मावती के नाम पर देश में फैलाया जा रहा उत्पात लोगों के लिए कुछ संगठनों द्वारा किया जा रहा असमाजिक तत्वों का हुडदंग हो सकता है परंतु इन असमाजिक संगठनों के हुडदंग में ही देश की हार की पटकथा और उसके लिखने वालों के नाम और चेहरे देखे जा सकते हैं। अफसोस इस बात का है कि देश की बर्बादी की इस पटकथा को लिखने वाले ही आज देश की सत्ता पर काबिज हैं। वो कानून व्यवस्था की बात करते हैं और चुपचाप कानून टूटते देखते हैं और देखते ही नही अपनी खामोशी से कानून हाथ में लेने वाले अपने वैचारिक रिश्तेदारों के जोश को आसमान की उंचाईयां छूने का हौसला भी देते हैं। सरकारी बसों को आग लगाने वाले, स्कूल जाते बच्चों की बस पर हमला करने वाले और इन हमलों का आहवान करने वाले नेशनल टीवी चैनल्स पर आकर बयान देते हैं और आजाद भारत के इतिहास की सबसे निकम्मी सरकार हाथ पर हाथ धरे अपने उन्मादी वैचारिक रिश्तेदारों की करतूतों पर इतराती इठलाती खामोश रहती है। यह वो सरकारें हैं जो पहलू खान की मौत पर मुकदमा तो दर्ज करती है परंतु पहलू खान के परिवार पर भी मुकदमा दर्ज करने से बाज नही आती है। यह वो सरकारें हैं जो रोहित वेमुला की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने की अपेक्षा रोहित वेमुला के जाति प्रमाणपत्रों की जांच में ज्यादा दिलचस्पी लेती है। यह वो सरकारें हैं जो राजपूत गौरव के नाम पर फूलन देवी के हत्यारे को खामोशी के साथ राजपूत नायक बनने का अवसर देती है और सरेआम सहारनपुर में उसके इशारे पर दलितों पर संगठित हमले करवाती है। इन सरकारों को अपने भगवा गिरोह की हाथों की तलवारें खिलौने दिखते हैं तो वहीं दलित, पिछड़ों या मजदूरों के झण्ड़ों के डण्ड़े भी हथियार नजर आते हैं। देश में जो भी उत्पात हो रहा है वह उसी भगवा गिरोह के इशारे पर है जिसके नागपुरी सरगना पर्दे के पीछे से सरकार चला रहे हैं। वही हैं जो पर्दे के पीछे से सरकार भी चलाते हैं और उत्पात भी फैलाते हैं। इस पूरे उत्पात से कईं महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं, जिनके जवाब सरकार को देने चाहिए।
केवल भाजपा शासित राज्य ही इन उत्पातों का केन्द्र बने हुए हैं। सहारनपुर के शब्बीरपुर में दलित आबादी को निशाना बनाये जाने के बावजूद दलितों को ही कार्रवाई का निशाना बनाया गया। इन उत्पातियों को छूट सहारनपुर में भी थी और अब पूरे देश में भी उत्पात फैलाने की छूट क्यों? दलित संगठन भीम आर्मी के नेता चन्द्रशेखर आजाद को बेवजह जेल में डाला गया रासुका के तहत कार्रवाई की गई। फिर करणी सेना क्या सेना नही है उसके नेताओं पर रासुका क्यों नही? करणी सेना के साथ मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारें फिल्म पर रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट में गई। क्या यह इन उत्पातियों के साथ भाजपा की मिलीभगत को नही दर्शाता है। पहलू खान, इखलाक जैसे जितने भी अल्पसंख्यकों पर हमले हुए वे अपनी जान से गये, फिर भी उनके खिलाफ कभी गौ मांस और कभी जानवरों की तस्करी के मुकदमें दर्ज करना क्या इन सरकारों की ऐसे भगवा गिरोहों के साथ संलिप्तता को रेखांकित नही करता है। ऐसे अनेकों सवाल हैं जो दंगे और उत्पात की इस पूरी राजनीति में भाजपा और संघ की भूमिका को रेखांकित करते हैं।
वास्तव में यह भाजपा और भगवा गिरोह की मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनावी तैयारी है। 1984 में संसद में दो की संख्या पर पहुंची भाजपा ने राम रथ पर चढकर देख लिया कि भारत जैसे धर्म और जातियों में बंटे देश में सत्ता तक पहुंचने की आसान राह क्या है। अब जब वे देश की सत्ता में हैं और अधिकतर राज्यों की सत्ता भी उनके पास है तो देश को दंगे और उत्पात की आग में धकेलकर सत्ता में बने रहना उनके लिए आसान है और वही संघी भगवा गिरोह कर भी रहा है। यह सत्ता के भूखे कुठिंत लोगों की भीड़ है जिसका दोहन अन्तर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी अपने हितों को पूरा करने के लिए कर रही है। पद्मावती की कल्पनिक कहानी पर मचा बवाल दरअसल मध्य प्रदेश और राजस्थान की वास्तविक सत्ता को पाने की राह है। इसीलिए चाहे कोर्ट कुछ कहे नागरिक समाज कुछ सोचे मगर इससे भी फायदे वाला अगला मुद्दा मिलने तक बवाल चलता रहेगा और सरकार खमोश अपनी जीत की तैयारियों पर इतराती रहेगी, इठलाती रहेगी और बेचारा दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र उम्र के 67 साल पूरे होने के बाद भी लाचार बेबस बस देखता रहेगा और सांप्रदायिक और जातिवादी तंत्र मंत्र का शिकार होता रहेगा।