पहली बार नही बने संसदीय सचिव फिर भी चुनाव आयोग के निशाने पर ‘‘आप‘‘

आईएनएन भारत डेस्क

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार फिर से विरोधियों के निशाने पर है। अबकी बार यह विधायकों के लाभ के पद का मामला है। चुनाव आयोग ने 20 विधायकों की सदस्यता खत्म करने की सिफारिश राष्ट्रपति से कर डाली है। अधिक संभावना राष्ट्रपति द्वारा इसे मान लेने की ही है। परंतु सवाल इस निर्णय के समय और इसमें झलक रहे पक्षपात को लेकर है। समय इसलिए कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले इस काम जिस प्रकार अंजाम दिया है उससे चुनाय आयुक्त की निष्ठा और कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।

वास्तव में चुनाव आयुक्त के कई निर्णय हमेशा सवालों के घेरे में रहे हैं। जिन्हें देखकर पहली नजर में ही उनकी निष्ठा पर सवाल उठते हैं और उन निर्णयों से पक्षपात साफ जाहिर होता है। हाल ही में गुजरात और हिमाचल चुनावों की तारीखों का ऐलान इसका सबसे ताजातरीन नमूना रहा है। यह साफ था कि इससे मोदी सरकार और भाजपा को फायदा पहंुचा था। वैसे एके जोती की मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति पर भी इसी प्रकार के सावल उठे थे और कहा गया था कि वे मोदी के चहेते अधिकारी रहे हैं।

ऐसा नही है कि आप के 20 विधायकों की सदस्यता पर मचे इस बवाल में केवल भाजपा की बयानबाजी कर रही है। दिल्ली कांग्रेस विशेषकर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने भी इस मामले में भाजपा नेताओं से अधिक तत्परता दिखाते हुए बयानबाजी की है। हालांकि कांग्रेस गुजरात चुनावों के समय चुनाव आयुक्त की निष्ठा और ईमानादारी पर सवाल उठाते हुए कह रही थी कि एके जोती ने चुनाव आयोग की साख को गिराया है और पद की गरिमा को कमजोर कर दिया है। ठीक भी है जहां गुजरात चुनावों में राहुल गांधी को एक साक्षात्कार देने पर ही चुनाव आयेाग ने नोटिस दे दिया था वहीं इसी चुनाव आयोग ने वोट डालने के बाद मोदी के रोड शो पर ना केवल एकदम से आंखें मंूद ली थी बल्कि रोड शो का बचाव भी किया था। हालंाकि कांग्रेस द्वारा इसे मुद्दा बनाये जाने पर आयोग ने राहुल गांधी को दिया गया नोटिस भी वापस ले लिया था। अचल कुमार जोती के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते ऐसे साफ दिखने वाले पक्षपातों की कई घटनाएं हैं।

इसके अलावा भी ईवीएम पर एके जोती के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग के रूख पर लगभग सभी राजनीतिक दल सवाल उठा चुके हैं। आप ने ईवीएम को हैक करने का दावा किया और विधानसभा में इसका डेमो भी दिया। चुनाव आयोग ने इस चुनौती को स्वीकार तो कर लिया परंतु इसके लिए एक अति हास्यास्पद शर्त रख दी कि मशीन को खोला नही जायेगा और उसके साथ कोई छेड़छाड़ नही होगी। अब मशीन को खेले बगैर कोई हैंकिंग को कैसे साबित कर सकता है। यह आश्चर्यजनक शर्त थी। राजनीतिक हलको में अचल कुमार जोती के गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड का चैयरमेन रहते 20000 करोड़ के घोटाले की भी काफी चर्चा रही है। प्रशांत भूषण जैसे कई प्रख्यात कानूनविदों और राजनेताओं ने तो जनता का रिपोर्टर नामक एक वेबसाइट का हवाला देकर यह भी दावा किया कि 20 हजार करोड़ के घोटाले वाले लोग और ईवीएम की मशीन के चिप निर्माता एक ही लोग हैं। अब इतने गंभीर सवालों के घेरे में घिरे व्यक्ति के रिटायरमेंट से ठीक पहले लिये गये इस निर्णय पर सवाल उठने तो लाजिमी हैं।

हालांकि इसके अलावा भी ऐसे ढ़ेरों कारण हैं जिनके कारण चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। दिल्ली सरकार द्वारा संसदीय सचिवों की नियुक्ति कोई पहला और अकेला उदाहरण नही है। हां इसे नैतिकता और आदर्शों का सवाल जरूर बनाया जा सकता है। परंतु जिस प्रकार दिल्ली सरकार को लगातार निशाना बनाया जा रहा है वह चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर सवाल तो खड़े करता ही है। संसदीय सचिव नियुक्त करने के अनेक उदाहरण हैं और कांग्रेस और भाजपा ने अपने अपने राज्यों में यह कई बार किया है। कुछ उदाहरण देखें जा सकते हैंः

 

-कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने 11 विधायकों और विधान परिषद सदस्यों (एमएलसी) को संसदीय सचिव बनाया। पदों को राज्यमंत्री के बराबर लाभ दिये गये। इन्हंे मंत्रियों को सहायता करने के लिए नियुक्ति बताया गया। मामला उच्च न्यायालय में लंबित है। एमएलए और एमएलसी सुरक्षित हैं।

-ममता बेनर्जी सरकार ने सरकार और विभागों के बीच प्रभावी तालमेल के लिए 24 संसदीय सचिव नियुक्त किये। कलकत्ता उच्च न्यायलय ने इसे अवैध बताया। मामल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। विधायकों की सदस्यता बरकरार है।

-राजस्थान सरकार ने 10 संसदीय सचिव नियुक्त किये। सभी को राज्यमंत्री का दर्जा हासिल है। अक्टूबर 2017 में एक बिल पारित कर उन्हें संवैधानिक दर्जा दिया गया। जिसका मामला उच्च न्यायलय में लंबित है।

-कांता कथुरिया, राजस्थान के कांग्रेस विधायक थे। लाभ के पद पर नियुक्ति हुई। हाईकोर्ट ने अवैध ठहरा दिया। राज्य सरकार कानून ले आई, उस पद को लाभ के पद से बाहर कर दिया। तब तक सुप्रीम कोर्ट में अपील हो गई, सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया। विधायक की सदस्यता नहीं गई।

-2006 में शीला दीक्षित ने 19 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया। लाभ के पद का मामला आया तो कानून बनाकर 14 पदों को लाभ के पद की सूची से बाहर कर दिया। केजरीवाल ने भी यही किया। शीला के विधेयक को राष्ट्रपति को मंजूरी मिल गई, केजरीवाल के विधेयक को मंजूरी नहीं दी गई। अजय माकन 2004 में लोकसभा में चुने जाने से पहले तक दिल्ली सरकार में मंत्री थे और उससे पहले वह 1999 में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के संसदीय सचिव भी रहे हैं।

-मार्च 2015 में दिल्ली में 21 विधायक संसदीय सचिव नियुक्त किए जाते हैं। जून 2015 में छत्तीसगढ़ में भी 11 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया जाता है। इनकी भी नियुक्ति हाईकोर्ट से अवैध ठहराई जा चुकी है, जैसे दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली के विधायकों की नियुक्ति को अवैध ठहरा दिया। एके जोती को मामले का स्वतः संज्ञान लेकर इनकी सदस्यता भी खत्म कर देनी चाहिए।

-हरियाणा में भी लाभ के पद का मामला आया। खट्टर सरकार में ही। पांच विधायक पचास हजार वेतन और लाख रुपये से अधिक भत्ता लेते रहे। पंजाब हरियाणा कोर्ट ने इनकी नियुक्ति अवैध ठहरा दी। पर इनकी सदस्यता तो नहीं गई।

-मध्य प्रदेश में भी लाभ के पद का मामला चल रहा है। वहां तो 118 विधायकों पर लाभ के पद लेने का आरोप है। 20 विधायक के लिए इतनी जल्दी और 118 विधायकों के बारे में कोई फैसला नहीं? 118 विधायकों के बारे में खबर पिछले साल 27 जून 2017 के टेलिग्राफ और टाइम्स आफ इंडिया में छपी थी कि 9 मंत्री आफिस आफ प्रोफिट के दायरे में आते हैं।

-2016 में अरुणाचल प्रदेश में जोड़ तोड़ से भाजपा की सरकार बनी। सितंबर 2016 में मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू 26 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर देते हैं। उसके बाद अगले साल मई 2017 में 5 और विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर देते हैं।

-अरुणाचल प्रदेश में 31 संसदीय सचिव। वह भी एक छोटे से राज्य में। वहां भी तो कोटा होगा कि कितने मंत्री होंगे। फिर 31 विधायकों को संसदीय सचिव क्यों बनाया गया? क्या लाभ का पद नहीं है? क्या अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अपराध किया है, भ्रष्टाचार किया है? क्या 31 संसदीय सचिव होने चाहिए? क्या 21 संसदीय सचिव होने चाहिए? जो भी जवाब होगा, उसका पैमाना तो एक ही होगा या अलग अलग होगा।