समाज को आईना दिखाने की कोशिश में सफ़ल रहा “मुक्काBAAZ”

Film Reviewer: Smriti Mala

फ़िल्म : मुक्काबाज़

निर्देशक : अनुराग कश्यप

अभिनय : विनीत कुमार सिंह, जो़या हुस़ैन, जिम्मी शेरगिल, रवि किशन, श्रीधर दुबे

लेखक : अनुराग कश्यप, विनीत कुमार सिंह, मुक्ती सिंह श्रीनेत, के डी सत्यम, रंजन चंदेल, प्रसून मिश्रा

संगीत :

फिल्म स्कोर : प्रशांत पिल्लैई

गाने : रचिता अरोरा, न्यूक्लिया

रिलीज़ डेट : 12 जनवरी 2018

रनिग टाइम: 2 घंटे 25 मिनट

शैली : ड्रामा

मारधाड़, गाली-गलौज और आपराधिक कहानियों पर आधारित फिल्में बनाने वाले अनुराग कश्यप इस बार साफ-सुथरी फैमिली ड्रामा फिल्म “मुक्काबाज” लेकर आए हैं, जो कि भारत में खिलाड़ियों की दुर्गति, जातिवाद, और प्रेम के लिए संघर्ष के ताने-बाने के साथ बुनी है।

फिल्म के शुरुआत में गौरक्षा पर होने वाले हत्याओं के ऊपर कटाक्ष किया है। उसके बाद भारत में खिलाड़ियों की दुखद स्थिति को भी गंभीरता से दिखाया है। देश में खिलाड़ियों में काबिलियत होते हुए भी वह नेशनल लेवल पर नहीं पहुंच पाते हैं। इस फिल्म का एक संवाद “ध्यानचंद हॉकी खेल करके अपना घर नहीं चला पाए” और रवि किशन का संवाद ” टैलेंट से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि सही व्यक्तित्व के सामने दांत निपोरना सीखो, कौन तुमको जानता है, कौन तुमको नहीं जानता है, कौन तुमको मानता है” , हमारे देश के खिलाड़ियों की स्थिति बयान करती है। साथ ही हमारे समाज के जातीवाद  पर कटाक्ष  करते हुए  ऊंची जाति और नीची जाति के बीच हो रहे संघर्ष को दिखाता है। अपने नाम की तरह ही भगवान दास मिश्रा (जिमी शेरगिल) ऊंची जात और ब्राह्मण होने के कारण खुद को भगवान समझता है। वह कहता है कि “हम बह्मन हैं सिर्फ आदेश देते हैं”। वहीं दूसरी तरफ श्रवण इसका विरोध करते हुए दिखाता है कि कोई ब्राह्मण है या नाम भगवानदास रहने से कोई भगवान नहीं हो जाता।  इसका एक और अंश है जब एक OBC कहे जाने वाले यादव जी  अपने से ऊंची जाति वाले से चाय कप उठवाते हैं और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग करते हैं दिखाने के लिए की  इतने सालो तक इन लोगों ने हमे दबा के रखा, अब मैं इसे काम करवाऊंगा।

भारत में  पुरुष प्रधान समाज में औरतों की स्थिति  सुनैना के पात्र में झलकती है।  जैसे औरतों के अंदर बदलने की आग होती है लेकिन उन्हें बोलने नहीं दिया जाता है, वैसे ही सुनैना को प्रतिनिधात्मक रूप में सुन तो सकती है लेकिन बोल नहीं सकती। उसके बाद भी उसके अंदर समाज को बदलने की और समाज के खिलाफ जाने की शक्ति है। इन सब सच्ची घटनाओं  के साथ देसी बोली में  मुक्केबाज को अनुराग कश्यप ने वास्तविक रुप देने की कोशिश की है।

कहानी : मुक्काबाज़ फिल्म की कहानी बरेली के  एक अभिलाषी मुक्केबाज श्रवण कुमार सिंह (विनीत कुमार सिंह) की पेम कहानी और मुक्केबाज बनने के सफ़र पर आधारित है। अपने इस सफर में श्रवण सिंह एक लोकल कोच भगवानदास मिश्रा (जिमी शेरगिल) के पास जाता है, जो पूर्व मुक्केबाज और वहां का नेता होने के साथ ही उसका बक्सर एसोसिएशन पर कब्जा है। मिश्रा की चाकरी  नहीं करने से  श्रवण सिंह झगड़ा मोल ले लेता है साथ ही मिश्रा की भतीजी सुनैना (जो़या हुसैन)से प्यार करने लगता है जो  सुन सकती है पर बोल नही सकती है।  मिश्रा इन दोनों ही बातों को अपना अपमान समझता है और श्रवण सिंह को मुक्केबाजी़ में आगे बढ़ने से हर कीमत पर रोकना शुरू कर देता है। जब श्रवण बरेली से नहीं खेल पाता तो वह बनारस जाता है, जहां  उसे  रवि किशन ट्रेनिंग देते हैं। वहां से स्टेट लेवल चैंपियनशिप जीतने पर रेलवे मे नैकरी लगती है, जिसके बाद मिश्रा की मर्जी के खिलाफ सुनैना से शादी कर लेता है। अब श्रवण सिंह बरेली में हो रहे नेशनल लेवल चैंपियनशिप खेलना चाहता है, जिसे भगवानदास हर कीमत पर हराने के लिए श्रवण की पत्नी सुनैना का अपहरण कर लेता है। अब श्रवण के पास चुनोती हैं, या तो सुनैना को बचाए या नेशनल चैंपियनशिप जीते।

कहानी को बहुत सारे लेखकों ने मिलकर लिखा है। बहुत सारी समस्याओं को लेकर एक साथ बढ़ने की कोशिश की है, जो इस को कमजोर बनाती है। परंतु इसके संवाद  फिल्म में जान डालते हैंl

अभिनय :  एक अभिलाषी, महत्वकांक्षी  मुक्केबाज और  नीची जाति के  समाज विद्रोही के रोल में विनीत कुमार सिंह ने बहुत ही बेहतरीन अभिनय किया है इस रोल के लिए विनीत ने 1 साल तक मुक्केबाजी़ सीखी है, जो पर्दे पर दिखती है। साथ ही भावनात्मक पहलू को भी अच्छे से निभाया है। एक मुक्काबाज़, मुक्केबाज़ और प्रेमी की भूमिका  को जिया है। सुनैना के रोल में जो़या हुसैन का  एक भी डायलॉग नहीं है, परंतु इशारों में ही वह बहुत कुछ कहती हैं। जिम्मी शेरगिल भगवानदास मिश्रा के  नकारात्मक भूमिका को बहुत अच्छे से निभाया है। उनके अभिनय में तनु वेड्स मनु  की झलक दिखाई पड़ती है। रवि किशन अपने कोच के छोटे से रोल में अपनी छाप छोड़ जाते हैं। बाकी सारे  अभिनेताओं ने भी अच्छा काम किया है।

संगीत  :फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म को काफी संजीदा बना देती है। फिल्म के गाने टे्डिशनल टच के साथ लाऊड  हैं। गाना ” अधूरा मैं ”  सबसे अच्छा लगता है इसके अलावा फिल्म में बाकी गाने “बहुत हुआ सम्मान”, ” पैंतरा”, और “मुश्किल है अपना  मेल प्रिय” फिल्म  के थीम के अनुसार ठीक है।

सकारात्मक पक्ष : फिल्म का संवाद, उसके गाने और देसी बोली बोलते हुए विनीत कुमार सिंह और बाकी कलाकारों का अभिनयl

नकारात्मक पक्ष : कहानी के हिसाब से फिल्म थोड़ी लंबी है।  एक फिल्म में इतने सारे समाज की समस्यांए को लेने से कहानी थोड़ी कमजोर दिखाई पड़ती है।

निष्कर्ष : मुक्काबाज़ परिवार के साथ देखने वाली फिल्म है। यह गंभीर विषयों को मनोरंजक तरीके से  प्रस्तुत करने की कोशिश  करता है।

रेटिंग : 3/5