झारखण्ड की कोयला खदानों में 4 लाख बाल मजदूर

आईएनएन भारतः
रांचीः कुछ बच्चों की जिन्दगी आलिशान महलों में गुजरती है तो कुछ बच्चों की बचपन कोयले की धूल में मिल जाती है। यूनिसेफ के एक सर्वे के मुताबिक झारखण्ड में लगभग 15,000 कोयला खदान हैं, जहाँ पर 5 से 14 साल के बीच के 4 लाख बच्चे अपने परिवार का पेट भरने के लिए काम करते हैं।
घातक गुफा, नाजुक खानों में भी यह बच्चे अपने जान की बाजी लगाकर काम करते दिखाई देते हैं क्योंकि इन बच्चों के पास कोई और विकल्प नहीं होता है अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए इन बच्चों को कोयले की खानों में मजदूरी करनी पड़ती हैं।
भारतीय कोयला खान अधिनियम, 1952 के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को खदानों में काम करने की अनुमति नहीं दी जाती है, लेकिन सच्चाई यह है की खनन कार्यों में बड़ी संख्या में बच्चे ही काम करते हैं। क्योंकि उनके पास उनके परिवार के लिए आजीविका अर्जित करने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं है।

                       

अगर हम हाल के कुछ महीनों में नजर डालें तो पता चलता है कि खनन क्षेत्रों में बच्चों सहित लगभग 20 कर्मचारी, कोयला के गुफा में और अन्य दुर्घटनाओं में मारे जा चुके हैं। झारखण्ड में कम से कम 10,000 परिवार, खनन काम करके अपना पेट भरते हैं।
राज्य में खानों के काम के लिए भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल), सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) और पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) जैसी सरकारी कंपनियों को पट्टे पर दिया गया है।
अगर अवैध खनन की बात करें तो यह अपने चरम पर है। अपने परिवार के लिए लोग अवैध रूप से कोयले निकालने के इन अवैध और असुरक्षित खानों में काम करते हैं। कभी-कभी, वे उन खानों में प्रवेश करते हैं जहाँ पर जाने पर पाबंदी होती है। अगर कोई दुर्घटना हो जाती है तो लोगों को अपनी जान गवानी पड़ती है।
सरकारी आंकड़े भी अवैध खनन के गहरे संकट को दर्शाते हैं। कोयला मंत्रालय के अनुसार, झारखण्ड राज्य में 2006 और 2010 के बीच अवैध खनन के 583 मामले दर्ज किए गए थे। हालांकि एक भी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया गया था। सितंबर 2009 तक अधिकारियों ने 21,702 टन अवैध रूप से खनन किया गया कोयला जब्त किया था।