दगाबाज को बदले में वफादारी नही मिला करती है

By नवनीत यादव 
भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन में भारी संकट का सामना कर रहे थे, ऐसे में राजद प्रमुख लालू यादव उनके तारणहार बने थे। संकट से निपटने के बाद नीतश कुमार ने लालू यादव को अपना बड़ा भाई कहा था। उसके बाद बिहार के दोनों दिग्गज नेताओं के बीच आपसी सौहार्द का माहौल बन रहा था। परंतु जिस छोटे भाई को लालू यादव ने मांझी जी के समय भाजपा की साजिश से बचाया (उसके लिए राजभवन से राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया), 2015 के विधानसभा चुनाव में दही का टीका लगा कर अपने हार्ट के ऑपरेशन होने के बावजूद एक दिन में 8 से 9 रैली कर भाजपा को हराया और छोटे भाई को सीएम बनने में अपनी भूमिका निभाई। सरकार बनने के बाद इसी छोटे भाई को बिना कांग्रेस से मसविरा किये पीएम उम्मीदवार बताया। जब पीएम मोदी जी ने छोटे भाई का डीएनए खराब बोला तो लालू यादव ने उसी भाषा में पीएम मोदी को करारा जवाब दिया। लालू यादव के अंदाज पर अभिभूत होकर छोटे भाई खुद बोले थे भाजपा के इलाज के लिए लालू जी अकेले ही काफी हैं।
भाजपा के एक नेता ने जब छोटे भाई की छाती तोड़ने की बात कही तो यही बड़े भाई थे जिन्होंने छाती तोड़ने वाले को याद दिलाया था कि यह 90 के पहले वाला बिहार नही है ये 90 के बाद वाला बिहार है और कहा कि नीतीश के साथ लालू खड़ा है। परंतु लालू की इतनी कोशिशों के बाद भी और इतने हमलों और इतना सब होने के बाद आज छोटे भाई ने क्या किया है? तथाकथित छोटे भाई ने सिद्ध कर दिया है कि उनकी राजनीतिक शैली यही है और सत्ता और सत्ता का मौका पाने के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं।
अपनी इसी अवसरवादिता को जग जाहिर करते हुए कथित छोटा भाई भाजपा से मिल गया उसके बाद बड़े भाई को सत्ता से धकेल दिया। और बात यही खत्म नही हुई यह छोटाा भाई फिर आरएसएस से मिल गया और बड़े भाई को सजा करवाकर जेल में डालवा दिया। अब अपने ही लोगों से बड़े भाई को गाली दिलवा रहा है। इस छोटे भाई की करतूत का असर यह हुआ कि उसने भाजपा आरएसएस के साथ मिल कर सामाजिक न्याय की उपजाउ जमीन पर आरएसएस का राज थोप दिया। छोटे भाई और इनके समर्थक को लग रहा है कि आरएसएस का राज ला देने से हम बच जाएंगे तो ये इनकी भूल है। आरएसएस इनकी भी कब्र खोदेगी पहले छोटे भाई से ही बड़े भाई को खत्म करवा दे फिर छोटे भाई से आसानी से निपट लेगी याद रखें। यह आरएसएस के प्रशिक्षण का हिस्सा है, आरएसएस की कार्यशैली है।
इसीलिए महागठबंधन से निकलने और भाजपा के साथ गलबहियां करने के बाद भी छोटे भाई को लगातार बेइज्जत होते रहना पड़ रहा है। लालू यादव जी ने इस पर तंज कसते हुए कहा भी था कि जो अपने लोगों से दगा करता है उसके साथ यही होता है। भाजपा के साथ नया गठजोड़ बनने के बाद पीएम मोदी पहली बार बिहार गये तो सीएम ने उनके लिए दावत का आयोजन किया। परंतु छोटे भाई पलक पावड़े बिछाये बैठे रहे और उनके मेहमान उनकी दावत ठुकराकर दिल्ली फुर्र हो गये। इसके बाद छोटे भाई ने पटना विश्वविद्यालय के लिए केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मांगा तो सार्वजनिक तौर पर उनके नये बने पुराने सहयोगी ने सरेआम ठेंगा दिखा दिया। इसी तरह राजगीर में 10 नवंबर को राज्यों के बिजली मंत्रियों का सम्मेलन होना था। दिल्ली से कई मंत्री फ्लाईट पकडने की तैयारी में थे। परंतु केन्द्र ने बगैर किसी खबर अचानक सम्मेलन राजधानी से बैठकर ही रद्द कर दिया। अक्टूबर में सीएम ने पीएम की मौजूदगी में गंदा पानी साफ करने के बाद गंगा की बजाए पुनपुन नदी में डाले जाने का मसला उठाया तो साहेब ने साफ कह दिया नमामी गंगे परियोजना जैसे चल रही है वैसे ही चलेगी कोई इसे बदल नही सकता है। इसके अलावा सितंबर में केन्द्र में मंत्रीमण्ड़ल का विस्तार हुआ तो मंत्री परिषद में नौ नये मंत्री शामिल किये गये और बिहार से दो परंतु छोटे भाई के सांसद अपनी बारी के लिए इंतजार ही करते रह गये। इस प्रकार की शर्मिन्दगी उठाकर भी छोटे भाई को सत्ता प्यारी है। वैसे भी जो अपने बड़े भाई को सत्ता से बेदखल करके जेल भिजवा सकता है उसके साथ यही तो होेना है। जो अपनो का नही हुआ उसे गैर क्यों सम्मान देंगे। उन्हें तो मालूम है कि कुर्सी के लिए छोटे भाई कहां तक जा सकते हैं।