कोई यूं ही लालू यादव नहीं बन जाता है

Byलाल बाबू ललित 
गया के किसी इलाके से लाल बत्तियाँ लगी गाड़ियाँ सांय सांय करती गुजर रही थी। आगे गाड़ी पीछे गाड़ी। गाड़ियों का काफिला। चमचमाती गाड़ियाँ।
 मुख्य सड़क से निकलता काफिला देहाती पगडंडियों की ओर पहुँचा। जून की वह तप्त दुपहरी।
काफिला जैसे ही पहाड़ी की तलहटी से गुजरा, 300 मीटर दूर से एक अधेड़ , काली कलूटी, धूल से सनी हुई , पसीने से तर-बतर खुरदुरे हाथों से पत्थर तोड़ती और दूसरे हाथ से चेहरे पर बार-बार टपकते पसीनों को पोछती दिखी।
कपड़े भी क्या पहने थे, चिथड़ा मात्र था।
उन गाड़ियों के काफिले के मध्य से एक गाड़ी का शीशा खुला और पूरे काफिले को रुकने का आदेश हुआ।
गाड़ी के शीशा से हाथ निकाल उस व्यक्ति ने उक्त महिला को नजदीक आने का संकेत दिया। वह महिला डरी। पुलिस, बंदूक, बड़ी- बड़ी गाड़ियाँ। उसमें बैठे किसी व्यक्ति को भला उस बूढ़ी औरत से क्या काम और नाता हो सकता था।
एक चौकीदार को भी देखकर घर के ताले बंद कर लेने वाले व्यक्ति के सामने 6 फ़ीट वाले लंबे तगड़े पुलिसियों की बंदूक तने देख वह महिला सचमुच डर गई होगी।
लेकिन किसी तरह गार्ड ने उसे बुलाया। उसे साहब के सामने लाया गया। उसे उसका नाम पता पूछा गया।
अगले लोकसभा चुनाव में वह बूढ़ी महिला देश के लोकतंत्र के मंदिर लोकसभा में सांसद बनकर लोगों के सामने थी।
जी, वह महिला थी गया की पूर्व सांसद भगवतिया देवी। मुसहर समुदाय की एक गरीब महिला और वह व्यक्ति जिसने अपनी गाड़ी के शीशे से हाथ निकालकर उस महिला को अपनी तरफ आने का इशारा किया था वह कोई और नहीं बल्कि लालू यादव थे।
कोई यूँ ही नहीं मसीहा बन जाता और जिसकी रिहाई और खैरियत पूछने राँची में जगहें कम पड़ जाती हैं।
कोई यूँ ही लालू यादव नहीं हो जाताl