सरकार डरा रही स्वतंत्र पत्रकारिता को, पत्रकार पर एफआईआर

आईएनएन भारत:
नई दिल्ली। पत्रकारिता अब दो ग्रुप में बंट गई है। एक पत्रकारिता जो सरकार के साथ है, दूसरी पत्रकारिता जो आवाम के साथ है। दूसरी वाली पत्रकारिता में गिने चुने लोग हैं,जबकि सरकार की दलाली करने वाले पत्रकारों की लम्बी लाईन लगी हुई है।
कुछ दिन पहले एक खबर आपने पढ़ी होगी, उस खबर से केंद्र सरकार घबरा गई थी। 3 जनवरी को ट्रिब्यून ने आधार डेटा बिकने की खबर छापी थी, रिपोर्ट में दावा किया गया था कि 500 रुपये में आधारा डेटा को खरीदा जाता है। इस खबर के प्रकाशित होते ही कोहराम मच गया था, वही अब खबर आ रही है कि ट्रिब्यून की पत्रकार रचना कालरा के साथ-साथ संस्थान के मालिक के ख़िलाफ़ भी एफआईआर दर्ज की गई है।
इस घटना के बाद अब सवाल उठने लगा हैं कि सरकार का काला चिट्टा अगर कोई पत्रकार खोलता हैं या जनता के सामने लाता है तो उसे डराने के लिए एफआईआर करा दी जाएगी। ये कहाँ का न्याय है? अगर उस खबर से आपको डर लगता है तो उसकी सच्चाई बताएं और सुधारने की कोशिश करें।
वही एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एफआईआर  की कड़े शब्दों में निंदा की है और कहा है कि अगर पत्रकार सच्चाई दिखाएं तो उस पर एफ़ाईआर करना कहाँ तक उचित है। ऐसे तो पत्रकारों को प्रताड़ित किया जा रहा है। ये तो उनकी आजादी पर हमला है।