लालू यादव को समझने के लिए मीडिया से दूर जनता में जाना होगा

आईएनएन भारत डेस्क:
यह आज के दौर के एक नौजवान साथी सुनील यादव का व्यक्तिगत अनुभव है जो मीडिया से इतर लालू यादव का एक चेहरा सामने लता है। एक ऐसे लालू यादव से साक्षात्कार कराता है जो लोगो के नायक हैं, ऐसे नायक जिसने उन्हें सम्मान से जीना सिखाया।इस एक छोटी घटना के बड़े मायने हैं।

बिहार और झारखण्ड के सुदूरवर्ती इलाको में घूमते हुए तमाम कमियों के बावजूद लालू यादव को समझने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है।

मुझे किसी नैतिकता की परखनली का कोई मोह नहीं है, जिसमें लाल या भगवा के द्वारा कोई लिटमस टेस्ट रिपोर्ट जारी हो जाय।

आज गया से नालन्दा के रास्ते में एक 70 साल के यात्री ने बहुत भावुक होकर कहा ‘बाबू तनी मोबईलियाँ में देखा लालू जी क सजा हो गइल का? और वह फफक कर रो पड़ा।”

मुझे न जाने क्यों लगा कि लालू को अभी हम कितना कम समझ पाएं हैं। हम अक्सर चुनावी समीकरण और मीडिया की नजरों से लालू को देखते रहे हैं।

पर 70 साल की पनीली आंखों में लालू का जो अक्स था वह कम नेताओं को नसीब होता है।

हजार कमियों के बावजूद बिहार के दलित पिछड़ी और अल्पसंख्यक जमात में लालू के असर को आप करीब से महसूस करना चाहते हैं तो मीडिया की हरामखोरी से बाहर आकर लोगों के बीच घूमिए।

आपको बिहार के जंगलराज का सच समझ में आ जाएगा।