डाइवर्सिटी ने बदल दी दक्षिण अफ्रीका की शक्ल: एच एल दुसाध

अभी-अभी भारत-द.अफ्रीका के पहले टेस्ट की शुरुआत के पहले राष्ट्रीय -गीत का पर्व ख़त्म हुआ है। भुवनेश्वर ने एक ड्रीम शुरुआत भी कर दी है, लेकिन  सीरिज का रोमांच बाद में ।
 सबसे पहले कैपटाउन  में जो नस्लीय डायवर्सिटी दिखी, वह बिलकुल स्वनिल है। मैदान में बॉल बॉयज से लेकर दर्शक; प्रशासनिक अधिकारी से लेकर राष्ट्राध्यक्ष के रूप में मूलनिवासियों की भारी उपस्थिति, इस बात की गवाह है कि जिस कंट्री को हम अमेरिका से भी बढ़कर ‘डाइवर्सिटी’ का मॉडल मानते हैं, वह वास्तव में यहां विद्यमान है।
यह नजारा 1994 के पहले मुमकिन नहीं था।
ऐसा तब मुमकिन हुआ जब मंडेला के योग्य उत्तराधिकारी जुमा (ऐय्यासी- भ्रष्टाचार-हत्या  के लिए कुख्यात ) का उदय हुआ।
उन्होंने अफ़्रीकी संविधान की मूल आत्मा रेसियल डाइवर्सिटी को सम्मान अर्थात जिसकी जितनी संख्या भारी… उसकी उतनी भागीदारी को कठोरता से लागू किया।
उसके बाद तो उद्योग-व्यापर, शासन-प्रशासन की शक्ल ही आमूल रूप से बदल गयी, जिससे क्रिकेट भी अछूता नहीं रहा।
भारत में भी यह नजारा मुमकिन है यदि दुसाध के मॉडल जैकब जुमा जैसा कोई ‘इंडियन जुमा’ उभर जाये।
भारत में जैकब जुमा के उभार की परस्थितियाँ बिलकुल साउथ अफ्रीका जैसी है। लेकिन भारत के बहुजन नेताओं में न तो जुमा जैसा जिगर और न ही बड़ा सपना है।